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पूर्व मुख्यमंत्रियों के बंगलों के बाद अब इन सरकारी भवनों को भी खाली कराने की तैयारी

उप्र के पूर्व मंत्री अम्मार रिजवी समेत करीब 50 ट्रस्टों ने भी सरकारी संपत्ति को कब्जा रखा है...

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लखनऊ

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Hariom Dwivedi

Jun 11, 2018

sarkari buildings of trust

पूर्व मुख्यमंत्रियों के बंगलों के बाद अब इन सरकारी भवनों को भी खाली कराने की तैयारी

लखनऊ. उप्र में पूर्व मुख्यमंत्रियों द्वारा हथियाए गये बेशकीमती बंगले तकरीबन खाली हो गए हैं। सिर्फ पूर्व मुख्यमंत्री नारायण दत्त तिवारी बंगला खाली होना बाकी है। राज्य विधि आयोग ने राज्य संपत्ति विभाग को परामर्श दिया है। सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के तहततिवारी को भी बंगला खाली करना होगा। लेकिन वे अचेत हैं। अस्पताल में भर्ती हैं। देर-सबेर उन्हें भी बंगला खाली करना होगा। लेकिन, सरकारी बंगलों को खाली कराने की लड़ाई अभी खत्म नहीं हुई है। उप्र के पूर्व मंत्री अम्मार रिजवी समेत करीब 50 ट्रस्टों ने भी सरकारी संपत्ति को कब्जा रखा है।

राजधानी लखनऊ में लोहिया ट्रस्ट, कांशीराम विश्राम स्थल जैसे कई ट्रस्ट हैं जिनके दफ्तर बेशकीमती सरकारी जमीनों पर बने हैं। बंगलों को खाली करवाने में महत्वपूर्ण निभाने वाली स्वयंसेवी संस्था लोक प्रहरी ने लखनऊ में तरह-तरह के ट्रस्टों के नाम पर कब्जाए गए 50 से अधिक सरकारी भवनों को खाली करवाने की लड़ाई शुरू करने की तैयारी करने में जुट गई है। इनमें से अधिकतर ट्रस्ट किसी न किसी राजनीतिक पार्टी से जुड़ा हुआ है। या किसी न किसी राजनीतिक पार्टी के प्रभाव के चलते उन पर कब्जा है। इसके अलावा बड़ी संख्या में लखनऊ में तमाम ऐसे पत्रकार भी सरकारी भवनों में काबिज हैं जो आज किसी भी मीडिया संस्थान में नहीं हैं।

पत्रकारों को भी सरकारी आवास
राजधानी लखनऊ में 100 से ज्यादा पत्रकारों को राज्य संपत्ति विभाग की कालोनियों में मामूली किराए पर मकान आवंटित हैं। नियमानुसार राज्य मुख्यालय पर मान्यता प्राप्त पत्रकारों को रियायती किराये पर आवास देने की व्यवस्था है। लेकिन, मौजूदा समय में आधे से ज्यादा मकानों में ऐसे पत्रकार काबिज हैं जो आवास आवंटन की प्रक्रिया को पूरा नहीं करते। लेकिन वे वर्षों से रह रहे हैं। अब इनसे भी मकान खाली कराने की बात उठ रही है।

लोक प्रहरी की एक याचिका यह भी
लोक प्रहरी संस्था की एक और महत्वपूर्ण याचिका पर अभी जवाब आना बाकी है। लोक प्रहरी ने पूर्व सांसदों और विधायकों को आजीवन दी जाने वाली पेंशन और अन्य भत्तों आदि को रद्द करने की मांग की है। इस याचिका में आरोप लगाया गया है कि पद छोड़ देने के बाद भी सांसदों और विधायकों को आजीवन पेंशन और अन्य भत्ते आदि दिया जाना संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) का उल्लंघन है। याचिका में कहा गया कि संसद के पास बिना कोई कानून बनाए सांसदों को पेंशन संबंधी लाभ देने का कोई अधिकार नहीं है। याचिका दायर करने वाले की तरफ से कहा गया है कि अगर एक दिन के लिए भी कोई सांसद बन जाता है तो वो जीवनभर पेंशन पाने का हकदार हो जाता है। यहां तक की उसकी पत्नी को भी पेंशन मिलती है। इसके साथ ही उसे आजीवन एक साथी के साथ मुफ्त ट्रेन यात्रा की सुविधा भी मिलती है। जबकि 80 फीसदी सांसद करोड़पति हैं और उन्हें पेंशन की जरूरत नहीं है। हालांकि, राज्यपाल को जीवनभर पेंशन नहीं दी जाती। याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र और भारत निर्वाचन आयोग से प्रतिक्रिया मांगी है।