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World Food day: यूपी के इन 10 स्वाद की दीवानी है दुनिया

16 अक्टूबर का दिन वर्ल्ड फूड डे के रूप में मनाया जाता है। इस मौके पर जानिए यूपी के दस लजीज फूड के बारे में।

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Oct 16, 2015

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सुजीत वर्मा, लखनऊ।
अच्छे और लजीज खाने की चाह सभी की होती है। स्वाद के मामले में यूपी भी किसी से पीछे नहीं है। यहां हर कोने में एक से बढ़कर एक लजीज व्यंजन मिलते हैं। इनका स्वाद भी ऐसा कि नाम लेते ही मुंह में पानी आ जाए। इसे यहां खानपान की संस्कृति की विरासत ही कहेंगे कि देश-विदेश के सैलानी यूपी के जिस भी हिस्से में जाते हैं, वहां के मशहूर व्यंजन का आनंद जी भर के लेते हैं। 16 अक्टूबर का दिन वर्ल्ड फूड डे के रूप में मनाया जाता है। इस मौके पर पत्रिका डॉट कॉम आपको यूपी के दस लजीज खाने के बारे में बताने जा रहा है।




लखनऊ की शान टुंडे कबाब

बात यदि नवाबों की नगरी लखनऊ की खासियत की हो और टुंडे कबाब का नाम नहीं लिया जाए तो बईमानी होगी। टुंडे कबाब का स्वाद सिर्फ देश में ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया में मशहूर है। टूंडे कबाब की रेसिपी ऐसी होती है कि इसे मुंह में डालते ही घुल जाता है। राजधानी में टुंडे कबाब की सबसे पुरानी दुकान चौक में अकबरी गेट के पास एक गली में है। दुकान पर बैठने वाले अबु बकर बताते हैं कि उनके पुरखे भोपाल से करीब 200 साल पहले आए थे। उनके नाना के वालिद हाजी मुराद अली भोपाल के नवाब के बावर्ची थे। नवाब को खाने-पीने का बहुत शौक था लेकिन बुढ़ापे की वजह से उनके दांत चले गए थे। इस वजह से वह नॉनवेज नहीं खा पाते थे। इस वजह से

नवाब ने उनके नाना से कुछ ऐसा बनाने की फरमाइश की, जिसे खाने में दांतों का इस्तेमाल न करना पड़े। बस फिर क्या था, बावर्ची ने मांस को बारीक पीसकर अच्छे-अच्छे मसालों और पपीता डालकर ऐसा कबाब बनाया गया जो मुंह में रखते ही घुल गया। कबाब में

बड़े यानी भैंस और छोटे यानी बकरे, दोनों के गोश्त का इस्तेमाल होता है। इसमें कई तरह की जड़ी-बूटियों के साथ 135 तरह के मसालों का इस्‍तेमाल होता है।इसे ही गिलावटी कबाब कहते हैं, जो आज 'टूंडे कबाब' के नाम से अवध की शान है।


मेरठ की घेवर

यूपी का मेरठ जिला घेवर मिठाई के लिए भी मशहूर है। सावन के मौसम में यह सबसे ज्यादा बिकने वाली मिठाई होती है। यह छोटे-बड़े साइज के ज्यादातर तीन तरह के घेवर मिलते हैं। सादा घेवर, मसाला घेवर और मावा वाला घेवर। इसमें मिलने वाली सभी सामग्री शुद्ध होती है। यह मिठाई जुलाई से बिकना शुरू हो जाती है और सितंबर के पहले हफ्ते तक बिकती है। यहां के घेवर का स्वाद ऐसा होता है कि जो भी एक बार चख ले, वो इसका दीवाना हो जाता है।




मक्खन मलाई

सर्दियों में राजधानी में मक्‍खन मलाई की भी अपनी अलग पहचान होती है। इस मिठाई का नाम भले ही मक्खन मलाई है लेकिन इसे सिर्फ दूध के झाग को अच्छे से फेंटकर बनाया जाता है। इसके बाद दबाकर इसे गाढ़ा किया जाता है। इसे बनाने के लिए दूध में में सबसे पहले थोड़ा ताजा सफेद मक्खन मिला देते हैं। इसके बाद इसे रात में खुले में रख देते हैं, ताकि मक्खन मलाई ठंडी हो सके। सुबह तड़के ही दूध-मक्खन के इस मिश्रण को मथना शुरू किया जाता है। धीरे-धीरे इसमें झाग उठने लगता है। इसे दबाया जाता है। इस प्रक्रिया को

कई बार दोहराया जाता है। जब काफी मात्रा में झाग जमा हो जाता है तो इसे ओस में रखा जाता है। ओस में नमी में पाकर झाग फूलने लगता है। इस तरह मक्खन मलाई तैयार हो जाती है। इसके बाद आखिर में इसमें केवड़ा, इलायची और चीनी डाली जाती है।




आगरा का पेठा

पूरी दुनिया में आगरा सिर्फ ताजमहल के लिए ही मशहूर नहीं है, बल्कि यहां का पेठा की भी अपनी खासियत है। बताया जाता है कि 1940 के दशक में दो तरह के पेठे बनते थे। अब 50 से ज्‍यादा तरह के पेठे बन रहे हैं। गर्मियों के दिनों में यह पेठा पानी के साथ खाया जाता है। इसका स्वाद भी लाजवाब होता है। आगरा में पेठे बनाने का शुरुआत ताजमहल निर्माण के दौरान हुई थी। उस समय जब काम करते-करते थक जाते थे तो वे पेठा खाने के बाद थोड़ा आराम करके अपनी थकान मिटाते थे।


शीरमाल


टूंडे कबाब की तरह ही शीरमाल लखनऊ की पहचान से जुड़ा है। कहा जाता है कि साल 1830 में नवाब नसरुद्दीन के खानसामा (रसोईया) जानाशीन अली हुसैन थे। एक दिन नवाब ने उनसे कुछ खास बनाने को कहा, जिसकी स्वाद अब तक सबसे अलग

हो और जिसे नजराने में हिंदुओं को दिया जा सके। यह सुनकर जानाशीन अली हुसैन ने ईरान से एक तंदूर मंगाया। इसका नाम बाकरखानी (बड़ी गोल रोटी) था। इसे बनाने में मैदा, मेवे, जाफरान, देसी घी और दूध का इस्तेमाल हुआ था। नवाब ने जब बाकरखानी को तोड़कर चखा तो वो इसके मुरीद हो गए। उन्होंने कहा कि यह सबसे बेहतरीन है। नवाब द्वारा रोटी को चीरने के कारण इसे चीरमाल कहा जाने लगा, जो बाद में शीरमाल हो गया।




वाराणसी की लस्सी

वाराणसी की लस्सी की भी काफी मशहूर है। वाराणसी में लस्सी के कुल 75 फ्लेवर मिलते हैं। इसमें चॉकलेट, मिक्स फ्रूट, ऑरेंज, चटपटी लस्सी, मिर्ची वाली लस्सी और आम वाली लस्सी शामिल है। भारत यात्रा के दौरान विदेशी सैलानी बनारसी लस्सी का

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लुत्फ लेना नहीं भूलते। बनारसी खानपान पूरी दुनिया में मशहूर है। वाराणसी की हर गली में लस्सी की दुकानें हैं। यहां पर रोजाना लस्सी पीने वालों की भीड़ लगी रहती है। इसमें देशी विदेशी सैलानी भी होते हैं। इसके अलावा यहां की ठंडई भी काफी मशहूर है।




उरई के गुलाब जामुन

उरई रेलवे स्टेशन पर मिलने वाले गुलाब जामुन भी काफी मशहूर हैं। यहां रेलवे स्टेशन पर उतरने वाला यात्री उरई के रसगुल्ले का स्वाद लेना नहीं भूलता था। स्थानीय लोगों का कहना है कि उनके पूर्वजों के अनुसार उरई रेलवे स्टेशन पर आजादी से पहले गुलाब जामुन बिकते थे। उन्होंने बताया कि साल 1936-37 में हलवाई शंकर ठेकेदार ने उरई रेलवे स्टेशन पर गुलाब-जामुन बनाकर बेचने की शुरूआत की। अंग्रेजों के जमाने में झांसी से आने वाली ट्रेन उरई तक आती थी। फिर, यहीं से वापस झांसी लौट जाती थी। वहीं, कानपुर से आनी वाली टेन उरई तक होकर वापस लौट जाती थी।




बनारसी पान

खानपीन की बात चले और बनारसी पान का जिक्र न हो, ऐसा तो मुमकिन नहीं है। बनारसी पान काशी की पहचान है। इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि फिल्म डॉन का लोकप्रिय गाना खाइके पान बनारस वाला आज भी लोगों के जेहन में ताजा है। काशी में पान की दुकान हर नुक्कड़ मिल जाएगी। इसके अलावा वाराणसी के बाहर भी ज्यादातर पान की दुकानों पर बनारसी पान भंडार लिखा

हुआ मिला जाएगा।



मथुरा के पेड़े

मथुरा के पेड़े भी पूरी दुनिया में मशहूर है। जो स्वाद यहां के पेड़े में है, वह कहीं नहीं मिलेगा। मथुरा का एक पेड़ा भी चखते हैं तो कम से कम चार पेड़े खाए बिना नहीं रह पाएंगे। पारंपरिक मथुरा के पेड़े गाय के दूध से बनाए जाते थे। हालांकि, आजकल भैंस के दूध से भी पेड़े बनाए जाते हैं। इसे बनाने के लिए मावा और तगार का भी उपयोग किया जाता है।



ठग्गू के लड्डू

कानपुर के ठग्गू के लड्डू और बदनाम कुल्फी का स्वाद पूरे देश-दुनिया में मशहूर है। यह लड्डू शुद्ध खोये, रवा और काजू से बनते हैं। साथ ही कानपुर की इस दुकान का साइन बोर्ड भी काफी मजेदार है। इसमें ऐसा कोई सगा नहीं, जिसको हमने ठगा नहीं लिखा है। यह दुकान यूपी के साथ-साथ पूरे देश में मशहूर है। ठग्गू के लड्डू के अलावा बदनाम कुल्फी भी मिलती है। दुकान के मालिक प्रकाश पांडेय बताते हैं कि ठग्गू के लड्डू की कहानी करीब 50 साल पुरानी है। उनके पिता राम अवतार पांडेय घाटमपुर ब्लॉक के परौरी गांव रहने वाले थे। 1968 में उनके पिता ने कानपुर के फाइव स्टार होटल लैंडमार्क के सामने लड्डू की दुकान खोली। उन्होंने सोचा कि इन लड्डूओं के जरिए वह इंसान से स्वाद और पैसे दोनों ठगते हैं। इसके बाद उन्हें अपने में एक ठग नजर आया। इसके बाद उन्होंने दुकान का नाम रखा

ठग्गू के लड्डू दिया।

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