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भारत रत्न नानाजी देशमुख जिन्होंने अपनी इच्छा शक्ति से बदल दी बीहड़ की तस्वीर

प्रख्यात समाजसेवी राष्ट्र ऋषि और अब भारत रत्न नानाजी देशमुख जिन्होंने अपनी इच्छा शक्ति से बीहड़ की तस्वीर बदल दी।

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लखनऊ

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Akansha Singh

Aug 09, 2019

lucknow

भारत रत्न नानाजी देशमुख जिन्होंने अपनी इच्छा शक्ति से बदल दी बीहड़ की तस्वीर

चित्रकूट. प्रख्यात समाजसेवी राष्ट्र ऋषि और अब भारत रत्न नानाजी देशमुख जिन्होंने अपनी इच्छा शक्ति से बीहड़ की तस्वीर बदल दी। जिन्होंने वयोवृद्ध हो चुके अपने शरीर को भी अपने निधन के बाद एम्स को सौंप देने का संकल्प कर लिया था। नानाजी का सम्बन्ध भले ही आरएसएस से था लेकिन उनका सम्मान संघ की विचारधारा के विरोधी भी करते थे। बीहड़ों में बसे लगभग 500 गांवों में विकास की ऐसी इबारत लिखी नानाजी देशमुख ने कि उनके प्रकल्पों का अवलोकन अध्यन करने देश विदेश के कई समाजसेवी राजनैतिक दिग्गज चित्रकूट आए और उनके कार्यों को देखकर अचंभित रह गए कि घने जंगलों बीहड़ों में भी कोई इंसान इतना संघर्ष कर सकता है।

कुछ यूं रहा संघ से लेकर राजनीति तक का सफर

नानाजी देशमुख का जन्म महाराष्ट्र के हिंगोली जिले में सन 1916 में हुआ। 1934 में आरएसएस के सम्पर्क में आने के बाद संगठन विस्तार में वे लग गए। इस दौरान उन्होंने लगभग पूरे भारत में प्रवास किया लेकिन उत्तर प्रदेश में नानाजी का ज्यादा प्रवास रहा। गोरखपुर में संघ प्रचारक रहने के दौरान उन्होंने सरस्वती शिशु मन्दिर की स्थापना की। 1951 में भारतीय जनसंघ के सन्गठन मंत्री बने। 1974 के जेपी आंदोलन में शामिल हुए। 1977 में यूपी की बलरामपुर गोंडा लोकसभा सीट से सांसद निर्वाचित हुए लेकिन एक साल बाद 1978 में उन्होंने राजनीति से सन्यास लेते हुए गोंडा में ग्रामीण विकास से सम्बंधित प्रकल्प शुरू किया। नानाजी का कहना था कि 60 वर्ष से अधिक उम्र के लोग राजनीति छोड़ व सरकार से बाहर रहकर समाज के लिए कार्य करें। ये बात उन्होंने तब कही थी जब 1977 में मोरारजी देसाई मन्त्रीमण्डल में उन्हें शामिल किया जा रहा था।

राम की तपोभूमि को बनाया कर्मभूमि

नानाजी देशमुख भगवान राम के जीवन को अपना आदर्श मानते थे और उनमे उनकी गहरी आस्था थी। शायद यही कारण था कि उन्होंने सन 1990-91 में जब श्री राम की तपोभूमि कहे जाने वाले चित्रकूट में प्रवेश किया तो आजीवन यहीं के होकर रह गए। हर तरह से बेहद पिछड़े इस इलाके के घने जंगलों बीहड़ों के बीच बसे गांवों में उन्होंने कई विकासपरक प्रकल्प चलाए और इच्छाशक्ति के बल पर क्षेत्र में दीनदयाल शोध संस्थान ग्रामोदय विश्विद्यालय की स्थापना कर कई प्रकल्पों को शुरू कर दिया। नानाजी ने बीहड़ के लगभग 500 गांवों को गोद लेकर वहां के लोगों का जीवन बदल डाला गांवों की तस्वीर बदल गई। ग्रामीणों आदिवासियों में स्वावलंबन की धारणा विकसित की जिससे गांव के लोगों को एक नया दृष्टिकोण मिला।

देश दुनिया में पहुंची सामाजिक कार्य की गूंज

नानाजी के प्रकल्पों की गूंज सिर्फ चित्रकूट ही नहीं बल्कि देश के विभिन्न राज्यों इलाकों के आलावा विदेश तक भी पहुंची। समाजसेवा व राजनीतिक क्षेत्र से जुडी कई दिग्गज हस्तियों ने चित्रकूट आकर उनके कार्यों को देखा समझा और अचंभित हो गए कि घने जंगलों बीहड़ों के बीच सिमित संसाधन में कैसे शिक्षा से लेकर सामाजिक कार्यों से जुड़े संस्थानों की स्थापना हुई और गांवों की तस्वीर बदल गई।

अंतिम सांस तक समाज को समर्पित

नानाजी अंतिम सांस तक समाज के लिए समर्पित रहे। 1997 में उन्होंने अपना अंगदान करने की घोषणा की। 1999 में उन्हें पद्मविभूषण दिया गया। 1999- 2005 तक उन्हें राज्यसभा के लिए मनोनीत किया गया। 27 फरवरी 2010 को उन्होंने इस संसार को छोड़ दिया।