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बेवर थाने के सामने शहीद मंदिर, पढ़िए नन्हे शहीदों की रोमांचक गाथा 

अमर शहीद छात्र कृष्ण कुमार, सीताराम गुप्त, जमुना प्रसाद त्रिपाठी की याद में 23 जनवरी से मैनपुरी के बेवर में शहीद मेले का आयोजन किया जाएगा।

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Bhanu Pratap Singh

Jan 18, 2017

Beaver shaheed mandir

Beaver shaheed mandir

मैनपुरी। 15 अगस्त 1942 को जूनियर हाई स्कूल बेवर के उत्साही छात्रों का हाथों में तिरंगा थामे जूलुस आगे बढ़ा। नारे लगाते और झंडा गीत गाते हुए यह कारवाँ बेवर थाने आ डटा। छात्र झंडा फहराने की जिद पर अड़े थे कि पुलिस ने गोली चला दी। कक्षा 7 के विद्यार्थी कृष्ण कुमार, क्रांतिधर्मी सीताराम गुप्त और यमुना प्रसाद त्रिपाठी की शहादत से पूरा शहर उबल पड़ा।


बलिदान गाथा का बखान
इन शहीदों के शवों को परिवार को न सौंपकर जिला प्रशासन ने दूसरे दिन चुपके से सिंहपुर नहर के निकट बीहड़ जंगलो में गुप्त रुप से ले जाकर मिट्टी का तेल डाल कर जला दिया गया। इसके बाद तो शहर पर पुलिस का दमन टूट पड़ा, घर- घर से तलाशियां और गिरफ्तारी गुरु हो गयी। आज भी बेवर थाने के सामने शहीदों की समाधि और शहीद मंदिर बलिदान गाथा का बखान कर रहा है।

शहीद मेला का फाइल फोटो

हर साल लगता है शहीद मेला
अंग्रेजी हुकूमत की चूलें हिलाने वाले अमर शहीद छात्र कृष्ण कुमार, सीताराम गुप्त, जमुना प्रसाद त्रिपाठी एवं क्रांतिवीरों की याद में 23 जनवरी से मैनपुरी के बेवर में ऐतिहासिक शहीद मेले का आयोजन किया जाएगा। सन 1972 से लगातार चल रहे इस आयोजन का यह 45वां साल होगा। 19 दिन तक चलने वाले इस मेले में हर दिन विभिन्न लोक सांस्कृतिक- सामाजिक कार्यक्रम आयोजित होंगे। क्रांतिकारी जगदीश नारायण त्रिपाठी ने मेले की मार्फत शहीदों की यादों को जिन्दा रखने की शुरुआत की थी। तब से मेला यह मेला हर साल जंग ए आजादी के दिवानों की याद दिलाकर कर नौजवान पीढ़ी को रोमांचित करता रहा है।


23 जनवरी को होगा उद्घाटन
बेवर के रामलीला मैदान में शहीद मेला एवं प्रदर्शनी की तैयारियां जोरो पर चल रही हैं, रामलीला मैदान में बीचो-बीच शहीद मंच को सजाया जा रहा है। आगामी 23 जनवरी को नेताजी सुभाष चन्द्र बोस जयन्ती पर इस मेले का विधिवत उद्घाटन होगा। उद्घाटन से पहले शहर का विशाल जन समुदाय नेता जी सुभाष चंद्र बोस की प्रतिमा पर माल्यार्पण के बाद शहीदों की समाधि और शहीद मंदिर में पुष्पांजलि देगा। देश भक्ति के जज्बे से सराबोर मौसम में उसके बाद ऐतिहासिक शहीद मेले का विधिवत उद्घाटन होगा।


शहीदों के परिजन आएंगे
उद्घाटन समारोह को सरदार भगत सिंह के भतीजे किरनजीत सिंह, शहीद सुखदेव के पौत्र अशोक थापर, शहीद ए वतन अशफाक उल्लाह खां के पौत्र अशफाक उल्ला खां, स्वतन्त्रता संघर्ष शोध केन्द्र के निदेशक सरल कुमार शर्मा आदि क्रांतिकारियों के परिजन संबोधित करेंगे।


ये होंगे कार्यक्रम
शहीदों की याद में 23 जनवरी से लगने वाले मेले के प्रबंधक राज त्रिपाठी ने बताया कि 23 जनवरी से 10 फरवरी तक लगने वाले मेले का हर दिन खास तौर पर डिजाइन किया गया है। इस मेले में प्रमुख रुप से शहीद प्रदर्शनी, नाटक, विराट दंगल, पेंशनर्स सम्मेलन, स्वास्थ्य शिविर, कलम आज उनकी जय बोल, शहीद रज कलश यात्रा, शहीद परिजन सम्मान समारोह, रक्तदान शिविर, विधिक साक्षरता सम्मेलन, किसान पंचायत, स्वतंत्रता सेनानी सम्मेलन, शरीर सौष्ठव प्रतियोगिता, लोकनृत्य प्रतियोगिता, पत्रकार सम्मेलन, कवि सम्मेलन, राष्ट्रीय एकता सम्मेलन आदि प्रमुख कार्यक्रम आकर्षण का केन्द्र होंगे।

Beaver thana
राज त्रिपाठी

आजादी का नन्हा नायक
सातवीं कक्षा के छात्र कृष्णकुमार कुरावली के निकट बेलाहार, बसुरा गाँव के निवासी पुत्तूलाल के इकलौते बेटे थे जो ग्राम करपिया निवासी अपने बहनोई रहते और रोज 4 मील पैदल चलकर बेवर में पढ़ने आते थे। कृष्णकुमार ने अगुवाई करते हुए कहा ‘गोरी सरकार ने सभी हथियार तो छीन लिये हैं, अब लाठी ही शेष है; हम लाठी नहीं छोड़ सकते’। छात्रों की भीड़ ने ताली बजाकर और नारे लगाकर कृष्णकुमार का समर्थन किया।


उमड़ पड़ा जनसैलाब
छात्रों का विशाल जुलूस उमड़ता-घुमड़ता चल पड़ा था। हाथो में झण्डा थामे और झण्डागीत गाते चल रहे थे। जुलूस थाने के निकट पहुँचे, तब तक पाँच हजार से अधिक जनसमूह साथ हो चुका था। पुलिस थाने से पहले नाले की पुलिया के पास ही पुलिस ने एक बोर्ड लगा रखा था जिसमें आगे न बढ़ने की हिदायत दी गई थी। नाले की पुलिया पर खड़े होकर भाषण हुए। हिदायतनामे की धज्जियाँ उड़ाते सब आगे बढ़ने लगे। सैकड़ों पुलिस वाले थाने के मुहाने पर तैयार खड़े थे। लगभग 50 बन्दूकें आग उगलने को तैयार। सिपाही पोजीशन में जमे हुये। चैकीदारों की फौज भी भाले-बल्लमों से लैस, हमले के लिये पूरे तौर पर सुसज्जित। मौत से सीधा मुकाबला: धड़-धड़-धड़......... एक साथ पचास से अधिक बन्दूकें आग उगलने लगीं। बाहर से आई पुलिस ने तो पहले हवाई फायर की और बाद में सीधी-सीधी गोलीवर्षा करने लगी। वायुमण्ल इंकलाब- जिन्दाबाद के गगनभेदी नारे गूंज उठा। वीर कृष्णकुमार भीड़ को चीरकर आगे बढ़ गये। रिवाल्वर की एक गोली उसकी बाँह में लगी। बाँह झटक कर वीर और आगे बढ़े। दूसरी गोली उसकी जाँघ में लगी। बहादुर गिर पड़ा धरती पर। घायल शेर की भाँति रिवाल्वर छीन लेने के लिये अब उसने आखिरी झपट्टा मारा, किन्तु छलाँग से पहले ही रिवाल्वर की तीन जलती गोलियाँ उनके पेट में समा गईं। भारतमाता का प्यारा सपूत स्वाधीनता के अनगिन बहुमूल्य सपने अपने हृदय में संजाये वहीं ढेर हो गया। सीताराम गुप्त भी पेट में चार गोलियाँ खाकर पास ही पड़े थे। भोलानाथ दीक्षित, सुरजन सिंह वैद्य और लालताप्रसाद शाक्य भी पुलिस की बर्बर गोलीवर्षा में बुरी तरह घायल हुये थे। इनके शरीर छलनी हो गये थे। सभी गिरे हुये सेनानियों के मृत अथवा जख्मी जिस्म पुलिस ने सड़क पर से खींचकर थाने के अन्दर अहाते में डाल दिये थे। मृतकों और घायलों के बीच वहाँ कोई भेदभाव न था। चारों ओर आंदोलनकारियों के कपड़े और शरीर खून से लथपथ हो रहे थे। किसी के टांग में गोली लगी किसी का कान छर्रे से उड़ गया, किसी की बांह घायल हो गयी तो कोई छर्रा से छलनी।

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शहीद मंदिर में शहीदों की मूर्तियां

पानी के बदले मिली गालियाँ और बूटों की ठोकर
हर तरफ हाहाकार था, चीत्कार था। थाने के कम्पाउण्ड में हवालात के सामने मृत और घायल आजादी के लड़ाके पड़े थे। सबसे पहले शहीद यमुना प्रसाद त्रिपाठी के शव पर कम्बल डाल दिया गया था। सज्जनता की मूर्ति सीताराम गुप्त अभी जीवित थे, कृष्णकुमार भी अभी जीवित थे। गुप्ताजी बेहोशी से कभी-कभी जाग पड़ते पानी माँगते हुये कराहते, किन्तु पानी के बदले उन्हें सिपाहियों की गन्दी गालियाँ और बूटों की ठोकरें ही मिली। रात को दोनों शहीदों और घायल आजादी के दीवानों को लेकर पुलिस की गाड़ी मैनपुरी जेल के लिये चल पड़ी थी। क्या मनःस्थिति होगी उन बेबस बन्दियों की, जिनके पास ही उनके दो शहीद साथियों के शव पड़े थे और कुछ देशभक्त शहादत की राह पर तेजी से आगे बढ़ते जा रहे थे। मैनपुरी शहर के निकट ईसन नदी के पुल तक पहुँचते-पहुँचते वीर कृष्णकुमार की आखिरी हिचकियों के बीच इंकलाब जिंदाबाद का स्वर फूटा और इसके साथ ही भारत माता के तीसरे सपूत ने भी अपने खून से अनुकरणीय बलिदान की शूरता भरी कहानी पूरी कर दी।


क्रांतिकारी योगेश चन्द्र चटर्जी के रडार पर था बेवर
गोलीकाण्ड के दौरान एक दिन पहले से देश के महान क्रातिन्कारी दादा योगेशचन्द्र चटर्जी अपने कुछ क्रान्तिकारी साथियों के सहित बेवर में ही मौजूद थे। गोलीकाण्ड के समय भी वे मैनपुरी के ग्रामीण अंचल गये थे और प्रतिशोध कार्यवाही पर विचार भी किया गया था, किन्तु जनता की संभावित बर्बादी के खयाल तथा अन्य अनेक कारणों से फिलहाल कार्यवाही स्थगित रखी गयी। गोलीकाण्ड के बाद वे वापस लौटे थे और आन्दोलन के बाद के दिनों में आम्र्स एक्ट में गिरफ्तार किये गये थे।
प्रस्तुतिः शाह आलम

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