scriptArticle 370 and 35A how much attitude of local administration changed after end of special status? | Article 370 and 35A: स्पेशल स्टेटस समाप्त होने के बाद कितना बदला स्थानीय प्रशासन का क्या रुख? | Patrika News

Article 370 and 35A: स्पेशल स्टेटस समाप्त होने के बाद कितना बदला स्थानीय प्रशासन का क्या रुख?

Article 370 and 35A: दो साल पहले यानि 5 अगस्त, 2019 को राज्यसभा में केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह द्वारा 370 और 35A समाप्त करने को लेकर पेश प्रस्ताव पर अमल से कश्मीरियों की राजनीतिक और सामाजिक बुनावट पूरी तरह बदल गई। अब वहां शासन-प्रशासन, अलगाववादियों से लेकर आम लोग तक हालात के मुताबिक खुद को बदलने में लगे हैं।

नई दिल्ली

Updated: August 06, 2021 12:40:50 am

नई दिल्ली। संसदीय परंपराओं के मुताबिक दो साल पहले संविधान संशोधन और राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद की मंजूरी मिलने के बाद केंद्र सरकार ने धारा 370 और 35A ( Article 370 and 35A ) को समाप्त करने की घोषणा की थी। केंद्र सरकार के ऐतिहासिक फैसले के बाद जम्मू-कश्मीर और लद्दाख को अलग कर दो केंद्र शासित प्रदेश बना दिया गया। उसके बाद से मोदी सरकार का सबसे ज्यादा फोकस जम्मू-कश्मीर ( Jammu-Kashmir ) और लद्दाख केंद्र शासित राज्यों पर रहा है। अब चर्चा इस बात की है कि स्पेशल स्टेटस ( Special Status ) समाप्त होने के दो साल बाद भी केंद्रीय प्रावधानों अनुरूप स्थानीय प्रशासन ( Local Administration ) की कार्यशैली में बदलाव आया या नहीं।
Local administration and public
Jammu-Kashmir : कितने बदले हालात?

ये बात सही है कि अनुच्छेद 370 और 35ए ( Article 370 and 35A ) खत्म होने के दो साल की अवधि में हालात बदले हैं। इसी के साथ जम्मू-कश्मीर प्रशासन का मिजाज भी बदला है। ऐसा केंद्र सरकार के सख्त रवैये को देखते हुए स्थानीय आतंकी संगठनों का सफाया और उनके आकाओं का हुक्का-पानी पूरी तरह से बंद करने की वजह से हुआ है। अभी ये तो नहीं कहा जा सकता है की कश्मीर घाटी में आतंकी सक्रिय नहीं है, लेकिन इतना तो जरूर है वो अपनी जमीन खो चुके हैं। उनके चंगुल से निकल स्थानीय लोग और प्रशासनिक मशीनरी नए ढर्रे पर चल पड़ी है। सोच में बदलाव का ही असर है कि ऑपरेशन ऑल आउट के तहत सेना और स्थानीय पुलिस ने मिलकर आतंकियों को जहन्नुम की राह दिखाने का काम किया। पंचायतों, ब्लॉकों और डीडीसी चुनाव स्थानीय प्रशासन की देखरेख में संपन्न हुए हैं।
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सिस्टम में आम लोगों की सहभागिता बढ़ी

अब आम लोग भी स्थानीय राजनीति में खुलकर हिस्सा लेने लगे हैं। स्थानीय अधिकारी सियासी घरानों से इतर आम लोगों को विकास योजनाओं में सहभागी बनाने लगे हैं। प्रशासनिक सहभागिता का ही असर है कि कोरोना टीकाकरण अभियान में जम्मू-कश्मीर का प्रदर्शन सबसे अच्छा रहा है। पंचायतों से लेकर जिला स्तर नया नेतृत्व उभरकर सामने आया है। ऐसा माहौल तैयार करने में स्थानीय प्रशासन की भूमिका को नकारा नहीं जा सकता।
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घाटी में टूजी नहीं 4जी की बयार है

जहां जम्मू कश्मीर में विशेष दर्जा बहाल रहने तक केंद्र सरकार इंटरनेट की स्पीट टूजी से आगे देने सोच भी नहीं पा रही थी, वहीं इन प्रावधानों की समाप्ति के बाद वहां के लोगों ने देश के अन्य हिस्सों में रहने वाले भारतीयों की तरह 4जी इंटरनेट स्पीड के लिए कानून का सहारा लिया। सुप्रीम कोर्ट का फैसला आने के बाद अब वहां के लोग इंटरनेट क्रांति का लाभ उठा रहे हैं। जम्मू-कश्मीर में पत्थरबाजी की घटनाएं होने की सूचना अपवाद का विषय हो गया है। कश्मीर घाटी बंद का आह्वान अब नहीं होते। धीरे-धीरे वहां पर भी स्थानीय लोगों की जिंदगी पटरी पर आने लगी हैं।
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एससी और एसटी को मिले आरक्षण

दशकों ने भारतीय नागरिकता और सरकारी सुविधा से वंचित और दलितों को अब सभी सुविधाएं मिलने लगी हैं। वहां के सियासी दल भी अब कश्मीरी पंडितों की घर वापसी की बात करने लगे हैं। केंद्रीय स्तर पर कानून बनने के बाद जम्मू—कश्मीर चुनाव में एससी और एसटी श्रेणी के लोगों को अब आरक्षण का लाभ मिलने लगा है। विधानसभा चुनाव के लिए जम्मू कश्मीर में परिसिमन आयोग ने काम शुरु कर दिया हैं। हाल ही में पीएम मोदी ने वहां सियासी स्टेकहोल्डर्स को 7 लोक कल्याण मार्ग यानि पीएम आवास पर बुलाकर बातचीत की है और लोकतांकि प्रक्रियाओं में हिस्सेदार बनने और भावी पीढ़ी को बेहतर माहौल देने के लिए आगे आने की अपील की है। लगभग सभी स्टेकहोल्डरों ने प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से इस पर सहमति जताई है।
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न बनेंगे पासपोर्ट, न ही मिलेंगी सरकारी नौकरियां

दो साल में बदले हालातों के बीच जम्मू-कश्मीर प्रशासन ने नई नीति पर अमल करने की जिम्मेदारी स्थानीय पुलिस और सामान्य प्रशासन को सौंपी है। नई नीति के मुताबिक पत्थरबाजी और दूसरी राष्ट्रविरोधी गतिविधियों मे शामिल होने वालों को पासपोर्ट आवेदनो की जांच और सरकारी नियुक्तियों में कोई सुरक्षा ऐजेसियों से हरी झंडी नहीं मिलेगी। स्थानीय पुलिस रिकार्ड और डिजिटल माध्यमों से जांच के बाद अगर किसी को ऐसी गतिविधियों में संलिप्त पाया गया तो जम्मू कशमीर के लोगों के ना तो पासपोर्ट बनेंगे और न हीं उन्हें सरकारी नौकरियां मिलेंगी।
ऐसे सरकारी कर्मचारियों की होगी छुट्टी

हालात नियंत्रण के आने का ही तकाजा है कि जम्मू-कश्मीर के राज्य प्रशासन ने अब किसी भी सरकारी कर्मचारी के आतंकियों से कनेक्शन होने पर उसे नौकरी से बर्खास्त करने का काम शुरु कर दिया है। हाल ही में जम्मू-कश्मीर प्रशासन ने 15 ऐसे सरकारी कर्मचारी नौकरी से बर्खास्त कर दिए गए जो देश विरोधी गतिविधियों में संलिप्त पाए गए थे। कुछ अन्यों की भी पहचान हुई है और उन पर नौक्री से बर्खास्तगी की तलवार लटकी हुई है। अब राज्य में सरकारी कर्मचारी नौकरी में रहते हुए भारत के खिलाफ आंतकी गतिविधि नहीं चला पाएंगे। पहले ऐसा सोचना भी मुश्किल था।
47.5% लोगों ने माना सही कदम

अगर हम एबीपी-सी वोटर सर्वेक्षण पर गौर फरमाएं तो खुद ब खुद पता चल जाता है कि वहां पर हालात बदले हैं। हर स्तर पर लोग बदलाव का स्वीकार करने लगे हैं और नए माहौल के अनुरूप आगे बढ़ना चाहते हैं। ऐसा इसलिए कि एबीपी-सी वोटर सर्वेक्षण में 47.4 प्रतिशत उत्तरदाताओं ने कहा कि अनुच्छेद 370 35A ( Article 370 and 35A ) को निरस्त करना मोदी सरकार की सबसे बड़ी उपलब्धि है। जबकि 23.7 प्रतिशत का मानना है कि राम मंदिर पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला सबसे बड़ी उपलब्धि है। 543 लोकसभा सीटों पर किए गए सर्वे में 1.39 लाख लोगों से बातचीत की गई। यह सर्वे एक जनवरी से 28 मई 2021 के बीच किया गया था।
ऐसे थे पहले के हालात

अनुच्छेद 370 और 35 Aए ( Article 370 and 35A ) समाप्त होने से पहले संसद को केवल जम्मू-कश्मीर के बारे में रक्षा, विदेश मामले और संचार के विषय में कानून बनाने का अधिकार था। किसी अन्य विषय से संबंधित कानून को लागू करवाने के लिए केंद्र को राज्य सरकार की मंजूरी लेनी पड़ती थी। जम्मू-कश्मीर राज्य पर संविधान की धारा 356 लागू नहीं होती थी। राष्ट्रपति के पास राज्य के संविधान को बर्खास्त करने का अधिकार नहीं था। 1976 का केंद्रीय शहरी भूमि कानून राज्य पर लागू नहीं होता था। दूसरे राज्यों के लोग जम्मू-कश्मीर के स्थानीय निवासी नहीं बन सकते थे। वहां पर जमीन नहीं खरीद सकते थे। इसके अलावे भी कई प्रावधान थे जिसकी वजह से स्थानीय प्रशासन को वहां के कानूनों के मुताबिक ही काम करना होता था, लेकिन अब वैसा नहीं है।

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