देश भर के कर्मचारियों को केंद्र सरकार का बड़ा झटका, Lockdown में पूरा वेतन देने का आदेश वापस

  • MHA ने बंद होने के बावजूद पूरी तनख्वाह देने के दिए थे निर्देश।
  • रविवार को गृह सचिव अजय भल्ला ने जारी किए नए दिशा-निर्देश।
  • 'पूर्ण वेतन भुगतान का आदेश मनमाना, असंवैधानिक और अनिश्चित।'

नई दिल्ली। कोरोना वायरस के कारण केंद्र सरकार ने बीते 25 मार्च से लागू किए राष्ट्रव्यापी लॉकडाउन के दौरान श्रमिकों को पूरे वेतन का भुगतान करने के लिए कंपनियों और वाणिज्यिक इकाइयों के लिए जारी अपना आदेश वापस ले लिया है।

देश भर में कोरोना वायरस के प्रसार को रोकने के लिए लागू किया गया लॉकडाउन का सोमवार को चौथा चरण शुरू हो चुका है। सरकार के इस कदम से बड़ी संख्या में ऐसे उद्योगों और कंपनियों को राहत मिलने की उम्मीद है जो अपने कर्मचारियों को पूरी तनख्वाह नहीं दे पा रहे थे। हालांकि तमाम कंपनियों-उद्योगों से जुड़े कर्मचारियों के लिए यह बहुत बड़ा झटका है।

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केंद्रीय गृह सचिव अजय भल्ला ने तालाबंदी के चौथे चरण के लिए दिशानिर्देश जारी करते हुए रविवार को जारी आदेश में कहा, “जब तक इस आदेश के तहत जारी परिशिष्ट में कोई दूसरा प्रावधान नहीं किया गया हो, वहां आपदा प्रबंधन अधिनियम 2005 की धारा 10(2)(1) के तहत राष्ट्रीय कार्यकारी समिति द्वारा जारी आदेश 18 मई 2020 से अमल में नहीं आएगा।"

रविवार के दिशानिर्देशों में ज्यादातर लोगों के आने-जाने से संबंधित, मानक संचालन प्रोटोकॉल (SOP) के छह सेटों का उल्लेख किया गया है, जो जारी रहेंगे। लेकिन इसमें केंद्रीय गृह सचिव द्वारा जारी 29 मार्च का आदेश शामिल नहीं है, जिसमें सभी नियोक्ताओं को निर्देश दिया गया था कि किसी भी कटौती के बिना नियत तिथि पर श्रमिकों को वेतन का भुगतान करें, भले ही वाणिज्यिक इकाई लॉकडाउन अवधि के दौरान बंद रही हो।

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इस संबंध में 29 मार्च को जारी आदेश में कहा गया था, "सभी नियोक्ता, चाहे वो उद्योग या दुकानों और वाणिज्यिक प्रतिष्ठानों में हों, अपने श्रमिकों के वेतन का भुगतान उनके कार्यस्थलों पर, नियत तिथि पर, बिना किसी कटौती के, लॉकडाउन के दौरान उनके प्रतिष्ठानों के बंद रहने की अवधि के बावजूद करेंगे।"

भल्ला ने चौथे चरण के दिशा-निर्देश जारी करते हुए कहा था कि आपदा प्रबंधन अधिनियम, 2005 के तहत एनईसी के अध्यक्ष के रूप में, उन्होंने 24 मार्च, 29 मार्च, 14 अप्रैल, 15 अप्रैल और 15 मई को लॉकडाउन के उपायों के आदेश जारी किए हैं। जो लॉकडाउन के कार्यान्वयन और विभिन्न लोगों और सेवाओं से दिए गए छूट को लागू करने से संबंधित है।"

दिलचस्प बात यह है कि सुप्रीम कोर्ट ने 15 मई को केंद्र सरकार से उन कंपनियों और नियोक्ताओं के खिलाफ एक हफ्ते तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं करने को कहा था जो देशव्यापी तालाबंदी के दौरान अपने कर्मचारियों को पूरी मजदूरी नहीं दे पा रहे हैं। सर्वोच्च अदालत ने पाया था कि ऐसी कई छोटी कंपनियां हो सकती हैं जो कमाई नहीं कर रही हैं और इसलिए भुगतान करने में असमर्थ हैं।

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न्यायमूर्ति एलएन राव, एसके कौल और बीआर गवई की पीठ ने वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से इस मुद्दे पर कई याचिकाओं की सुनवाई की। इस दौरान बेंच ने कहा कि 29 मार्च को गृह मंत्रालय (एमएचए) के सर्कुलर में व्यापक रूप से कंपनियों को श्रमिकों को पूर्ण मजदूरी का भुगतान करने का निर्देश दिया गया था, और यह एक बड़ा सवाल यह था जिसका जवाब दिया जाना चाहिए।

पीठ ने कहा कि ऐसे छोटे उद्योग हो सकते हैं, जो लॉकडाउन के कारण प्रभावित हुए और बिना कमाई करे अधिकतम 15 दिनों तक चल सकते हैं, लेकिन ज्यादा नहीं, तो वे अपने श्रमिकों को कैसे भुगतान करेंगे। 29 मार्च को जारी आदेश व्यापक है। इसमें एक बड़ा सवाल है और सरकार को इसका जवाब तलाशना है। इसमें कहा गया है कि अगर सरकार इन छोटी कंपनियों की मदद नहीं करती है, तो वे अपने श्रमिकों को भुगतान नहीं कर पाएंगे।

उन्होंने कहा कि सरकार को इन कंपनियों का सहारा बनना चाहिए और उनकी मदद करनी चाहिए, लेकिन उन पर मुकदमा नहीं चलाया जा सकता। पीठ ने कहा कि इनमें से किसी भी कंपनी के खिलाफ अगले सप्ताह तक अपने कर्मचारियों को पूर्ण वेतन देने में विफल रहने के लिए कोई कठोर कार्रवाई नहीं होगी।

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माइक्रो, स्मॉल एंड मीडियम एंटरप्राइजेज (MSMEs) एसोसिएशन ने अपनी दलील में कहा कि गृह मंत्रालय ने नियोक्ताओं के लिए वित्तीय निहितार्थों पर उचित देखभाल और विचार-विमर्श किए बिना आदेश पारित किए थे। छोटी औद्योगिक इकाइयों ने चेतावनी दी कि पूर्ण भुगतान करने से उनका काम बंद हो जाएगा, जो परिणामस्वरूप स्थायी बेरोजगारी का कारण बनेगा और अर्थव्यवस्था पर प्रतिकूल प्रभाव डालेगा। उन्होंने कहा है कि पूर्ण वेतन का भुगतान का व्यापक आदेश मनमाना, असंवैधानिक और अनिश्चित है।

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अमित कुमार बाजपेयी
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