Nishabdham Review: फिर हॉलीवुड के किस्से की धुलाई, न ज्यादा खौफ है, न गहराई

By: पवन राणा
| Published: 05 Oct 2020, 05:55 PM IST
Nishabdham Review: फिर हॉलीवुड के किस्से की धुलाई, न ज्यादा खौफ है, न गहराई
Nishabdham Review: फिर हॉलीवुड के किस्से की धुलाई, न ज्यादा खौफ है, न गहराई

बनाने वाले 'निशब्दम' ( Nishabdham movie ) को हॉरर फिल्म बता रहे हैं, जबकि यह उतनी ही 'हॉरिबल' है, जितनी इससे पहले की दो भारतीय फिल्में रही हैं। किरदार उखड़े-उखड़े-से हैं, पटकथा में कई झोल हैं और घटनाएं इतनी बोझिल हैं कि देखने वालों का सब्र टूटने लगता है।

-दिनेश ठाकुर

एक मूक-बधिर युवा लेखिका शहर से दूर सुनसान इलाके के मकान में पालतू बिल्ली के साथ रहती है। उसकी सहेली कभी-कभी उससे मिलने आती रहती है। अचानक सहेली गायब हो जाती है। एक नकाबपोश अब लेखिका की जान के पीछे पड़ा है। उसके सूने मकान में अजीबो-गरीब घटनाएं घूमने लगती हैं। यह किस्सा है चार साल पहले आई हॉलीवुड की चुस्त-दुरुस्त हॉरर थ्रिलर 'हश' का। भारत में पिछले साल इस किस्से पर हाथ मारकर हिन्दी में 'खामोशी' (तमन्ना, भूमिका चावला, प्रभु देवा) और तमिल में 'कोलैयुथिर कालम' (हत्याओं का मौसम) बनाई गईं। नकल में अक्ल नहीं लगाई गई। दोनों फिल्में नहीं चलीं। मसरूर अनवर के मिसरे 'हमको किसके गम ने मारा, ये कहानी फिर सही' की तर्ज पर अब थोड़ी हेर-फेर के साथ 'निशब्दम' में फिर आजमाइश की गई है। ओटीटी प्लेटफॉर्म पर इस तेलुगु फिल्म के हिन्दी, तमिल और मलयालम में डब संस्करण 'साइलेंस' नाम से जारी किए गए हैं।

यह भी पढ़ें : — यूजर बोला, 'सिनेमाघर खुलें या नहीं, आप तो बेकार ही रहोगे', Abhishek Bachchan ने दिया करारा जवाब

बनाने वाले 'निशब्दम' ( Nishabdham movie ) को हॉरर फिल्म बता रहे हैं, जबकि यह उतनी ही 'हॉरिबल' है, जितनी इससे पहले की दो भारतीय फिल्में रही हैं। किरदार उखड़े-उखड़े-से हैं, पटकथा में कई झोल हैं और घटनाएं इतनी बोझिल हैं कि देखने वालों का सब्र टूटने लगता है। निर्देशक हेमंत मधुकर अपनी पिछली हिन्दी फिल्मों 'ए फ्लैट' (2010) और 'मुम्बई 125 किमी' (2014) में भी रहस्य-रोमांच का माहौल रचने में नाकाम रहे थे। 'निशब्दम' में वे फिर निराश करते हैं। फिल्म भावनाओं और गहराई से काफी दूर खड़ी लगती है। शायद उन्हें इल्म हो गया था कि 'हश' के किस्से को वे भारतीय माहौल नहीं दे पाएंगे। इसलिए उन्होंने सिएटल (अमरीका) पहुंचकर यह किस्सा फिल्माया। भूगोल बदलने से किसी कमजोर फिल्म में ज्यादा रंग नहीं भरे जा सकते, यह 'निशब्दम' देखकर साबित हो गया।

यह भी पढ़ें : — स्नेहा उल्लाल को क्यों कहा जाता है Aishwarya की हमशक्ल, मिलती-जुलती सूरत नहीं, ये है राज

कई जगह यह फिल्म सत्तर और अस्सी के दशक की उन हॉरर फिल्मों की याद दिलाती है, जो रामसे बंधु बनाया करते थे। उनकी फिल्में तर्कों को ताक में रखकर डराने की कोशिश में कई बार हास्यास्पद हो जाती थीं। 'निशब्दम' में भी कई घटनाएं ऐसी हैं, जो गले नहीं उतरतीं। मसलन नायिका उस सूने मकान में एक दुर्लभ पेंटिंग लेने अकेली क्यों जाती है, जहां कई साल पहले एक दम्पती की हत्या हो चुकी है।

यह भी पढ़ें : — 'कपिल शर्मा शो' पर भड़के Mukesh Khanna, बोले- 'औरतों के कपड़े पहनकर घटिया हरकत करते हैं मर्द'

फिल्म में अनुष्का शेट्टी ( Anushka Shetty ) ने मूक-बधिर पेंटर का किरदार अदा किया है। उनके साथ सुनसान इलाके के मकान में वही सब होता है, जो 'हश' की नायिका (केट सीगल) के साथ हुआ था। 'बाहुबली' में अनुष्का ने ठीक-ठाक काम किया था, लेकिन 'निशब्दम' में उनके चेहरे पर पीड़ा और परेशानी के भाव कहीं नजर नहीं आए, जो किरदार के हिसाब से जरूरी थे। उनके मंगेतर के किरदार में माधवन ( R Madhavan ) का काम जरूर अच्छा है। पुलिस अफसर बने हॉलीवुड के अभिनेता माइकल मैडसन (किल बिल, रेजर्वोर डॉग्स) सिर्फ खानापूर्ति के लिए हैं। उनकी डबिंग भी हास्यास्पद है।

यह भी पढ़ें— 'कपिल शर्मा शो' के Kiku Sharda की इस हरकत से नाराज हुए सुशांत के फैंस, कहा- बंद कर दो शो

शनील देव की फोटोग्राफी 'निशब्दम' का सबसे उजला पहलू है। उन्होंने सिएटल के खूबसूरत नजारे सलीके से कैद किए हैं। लेकिन पूरी फिल्म के नक्शे को देखते हुए बात वही है- 'ये एक अब्र (घटा) का टुकड़ा कहां-कहां बरसे/ तमाम दश्त (जंगल) ही प्यासा दिखाई देता है।'

  • फिल्म : निशब्दम
  • अवधि : 2.06 घंटे
  • निर्देशक : हेमंत मधुकर
  • पटकथा : कोना वेंकट
  • फोटोग्राफी : शनील देव
  • संगीत : गिरीश जी
  • कलाकार : अनुष्का शेट्टी, माधवन, अंजलि, शालिनी पांडे, सुब्बाराजू, माइकल मैडसन आदि।