
Many ancient water sources
नरसिंहपुर. जिले में पारंपरिक जल स्रोतों के संरक्षण को लेकर हर साल अभियान चलाए जाते हैं, लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि कुछ दिनों की सक्रियता के बाद हालात फि र पुराने जैसे हो जाते हैं। सदियों तक लोगों की प्यास बुझाने वाले कुएं और बावडिय़ां आज अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहे हैं। लगातार उपेक्षा और देखरेख के अभाव में जिले के सैकड़ों कुएं पूरी तरह खत्म हो चुके हैं, जबकि बचे हुए जल स्रोत भी जर्जर स्थिति में हैं।
हर वर्ष गर्मी के मौसम से पहले जल संरक्षण को लेकर सफ ाई और मरम्मत के अभियान शुरू किए जाते हैं। प्रशासन द्वारा लोगों को जागरूक करने के लिए कार्यशालाएं आयोजित की जाती हैं और जल संरक्षण की शपथ भी दिलाई जाती है। इसके बावजूद यह प्रयास स्थायी परिणाम नहीं दे पा रहे हैं। कुछ समय बाद ही अभियान की रफ्तार धीमी पड़ जाती है और जल स्रोत फि र से उपेक्षित हो जाते हैं।
इसी क्रम में एक बार फि र प्रशासन ने जल गंगा संवर्धन अभियान शुरू किया है। इसके तहत पारंपरिक जल स्रोतों के पुनर्जीवन, संरक्षण और उनके उपयोग को बढ़ावा देने की बात कही जा रही है। गांव.गांव में जागरूकता कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे हैं, ताकि लोग जल के महत्व को समझें और इन स्रोतों को बचाने में भागीदारी निभाएं।
हाल ही में कलेक्टर रजनी सिंह और जिला पंचायत सीईओ गजेन्द्र सिंह नागेश ने जनपद पंचायत चांवरपाठा की ग्राम पंचायत लिंगा में स्थित प्राचीन बावड़ी का निरीक्षण किया। उन्होंने संबंधित अधिकारियों को बावड़ी की सफ ाई, संरक्षण और जीर्णोद्धार के निर्देश दिए ताकि इस ऐतिहासिक जल स्रोत को फि र से उपयोग में लाया जा सके।
विशेषज्ञों का मानना है कि केवल औपचारिक अभियान चलाने से समस्या का समाधान नहीं होगाए,बल्कि इसके लिए सतत प्रयास और जनभागीदारी जरूरी है। जब तक स्थानीय स्तर पर जिम्मेदारी तय नहीं होगी और नियमित देखरेख नहीं होगी, तब तक इन जल स्रोतों की स्थिति में सुधार संभव नहीं है।कुल मिलाकर हर साल दोहराए जाने वाले अभियान और वादों के बावजूद जिले में जल संरक्षण की स्थिति में अपेक्षित बदलाव नहीं आ पा रहा है, जिससे भविष्य में जल संकट और गहराने की आशंका बनी हुई है।
Published on:
23 Mar 2026 11:47 am
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