गुरु राय के पिता बाबा गुरदिता जी थे जो छठे गुरु गुरु हरगोबिंद जी के पुत्र थे। गुरु हरगोबिंद साहिब जी ने संसार छोड़ने के पहले ही अपने पोते हर राय जी को 14 साल की उम्र में ही 3 मार्च 1644 को 'सप्तम नानक' के तौर पर घोषित किया और वो 6 अक्टूबर 1661 तक इस पद रहे।
Guru Har Rai Ji Some Special Facts: श्री गुरु हर राय जी सिक्ख धर्म के सातवें गुरु थे। गुरु हर राय जी का जन्म 16 जनवरी, 1630 ईस्वी में हुआ था। आध्यात्मिक व राष्ट्रवादी महापुरुष होने के साथ एक योद्धा भी थे। उनका जन्म पंजाब में हुआ था। गुरु हर राय जी के पिता का नाम गुरदित्ता और माता का नाम नेहाल कौर था। आपके दादा जी गुरु हरगोबिन्द जी आपको महान पुरुष मानते थे। छोटी सी उम्र में गुरु हर राय जी को नानक की उपादि प्राप्त हुई। आइए जानतें सिखों के सातवें गुरु गुरु हर राय जी के जीवन से जुड़ी कुछ खातें।
11 साल की उम्र में हुई थी शादी
11 साल की उम्र में गुरु हर राय जी का विवाह हो गया था। आपकी पत्नी कृष्ण कौर ने दो बेटों को जन्म दिया। श्री रामराय और श्री हरकृष्ण जी। आपका विवाहिक जीवन बड़ी खुशी से बीता। गुरु हर राय जी ने कभी भी युद्ध की शुरुआत नहीं की।
14 साल उम्र बनाया सप्तम नानक
गुरु राय के पिता बाबा गुरदिता जी थे जो छठे गुरु गुरु हरगोबिंद जी के पुत्र थे। गुरु हरगोबिंद साहिब जी ने संसार छोड़ने के पहले ही अपने पोते हर राय जी को 14 साल की उम्र में ही 3 मार्च, 1644 को 'सप्तम नानक' के तौर पर घोषित किया। वे 6 अक्टूबर, 1661 तक इस पद रहे। गुरु पद पर रहते हुए गुरु हर राय जी ने फिर से अपने दादा गुरु हरगोबिंद जी के बनाए सिख योद्धाओं के दल को संगठित किया।
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आध्यात्मिक और राष्ट्रवादी महापुरुष के तौर पर बनी पहचान
ऐसा कहा जाता है कि गुरु हरराय जी ने अपने दूसरे पुत्र हरिकिशन जी को अपना उत्तराधिकारी घोषित कर दिया। रुपनगर में 20 अक्टूबर, 1661 को गुरु हर राय जी ने संसार त्याग दिया। आध्यात्मिक और राष्ट्रवादी महापुरुष के तौर पर गुरुजी की पहचान बनी और एक कुशल योद्धा भी रहे थे। उन्होंने जनता की भलाई के लिए एक आयुर्वेदिक चिकित्सालय भी बनवाया था। आयुर्वेद से लोगों को करीब रखने का यह एक बेहतरीन तरीका साबित हुआ था।