
सुप्रीम कोर्ट (File Photo)
सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) ने अदालतों में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस - एआई (Artificial Intelligence - AI) के इस्तेमाल को लेकर गंभीर चिंता जताई। कोर्ट ने कहा कि अगर इसे बिना किसी नियमन के इस्तेमाल करने दिया गया, तो यह न्यायिक कार्य संस्कृति को प्रभावित कर सकता है। कोर्ट ने कहा कि जिस न्यायिक प्रक्रिया और फैसले में फर्जी एआई सामग्री को कानूनी नजीर के रूप में इस्तेमाल किया जाता है, वो पूरी प्रक्रिया को दूषित कर देती है। यह कानून के शासन को कमजोर करता है। ऐसे फैसलों को जल्द से जल्द रद्द किया जाना चाहिए। कोर्ट ने कहा कि न्यायिक क्षेत्र में एआई से फर्जी सामग्री का इस्तेमाल वैसा ही है, जैसा मिथाइल आइसोसाइनेट गैस का रिसाव। यह अदृश्य और विनाशकारी है, जो न्यायिक प्रक्रिया की मूल भावना को नष्ट कर सकता है।
यह टिप्पणी करते हुए सुप्रीम कोर्ट जस्टिस पी.एस. नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे की बेंच ने राष्ट्रीय कंपनी कानून न्यायाधिकरण (एनसीएलटी) और राष्ट्रीय कंपनी कानून अपीलीय न्यायाधिकरण (एनसीएलएटी) के आदेश रद्द कर दिए। सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि इनके पिछले आदेशों में ऐसे न्यायिक फैसलों का हवाला दिया गया था, जो वास्तव में मौजूद ही नहीं थे। जिन फैसलों का हवाला सही था, उनमें भी एआई द्वारा तैयार किए गए पैराग्राफ शामिल थे।
यह मामला एसेल इन्फ्राप्रोजेक्ट्स से जुड़े दिवाला मामले की सुनवाई के दौरान आई। एनसीएलटी ने अगस्त 2024 में दिवाला प्रक्रिया शुरू करने का आदेश दिया था। इसे बाद में एनसीएलएटी ने भी बरकरार रखा। सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि फैसला देते समय एआई से तैयार फर्जी न्यायिक फैसलों का हवाला दिया गया था।
सुप्रीम कोर्ट ने बार काउंसिल ऑफ इंडिया को निर्देश दिया कि वो इस मुद्दे पर एक समिति गठित करे। एआई से जुड़े मामलों पर स्पष्ट दिशा-निर्देश तैयार करे और नियमों के उल्लंघन पर अनुशासनात्मक कार्रवाई का प्रावधान भी तय करे।
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि एआई के इस्तेमाल और एप्लीकेशन पर पूरा नियंत्रण होना बहुत ज़रूरी और अनिवार्य है। कंट्रोल का मतलब है इसके इस्तेमाल से दो कदम आगे रहना और सोच-समझकर यह तय करना कि इसे कब और कहाँ इस्तेमाल किया जाए। इसे अदालती आदेशों से नहीं सुलझा सकते, बल्कि इसके लिए पब्लिक पॉलिसी और लागू करने योग्य कानूनों की ज़रूरत है।
Updated on:
03 Jul 2026 12:54 am
Published on:
03 Jul 2026 12:49 am
