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20 साल बाद फैसला, फर्जी ‘डॉक्टर’ को 3 साल की सजा और 6 हजार रुपए जुर्माना

एक परिवाद 20 सितम्बर, 2004 को बांसवाड़ा मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी की ओर से पेश किया गया। सीएमएचओ ने एक नीम-हकीम की 25 अप्रेल, 2004 को उसकी क्लिनिकल प्रैक्टिस को लेकर जांच की। उसके पास उपचार करने का कोई वैध दस्तावेज नहीं मिला था। जो दस्तावेज मिले थे, उनके संबंध में कोई जानकारी विभाग को भी नहीं दी गई।

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बांसवाड़ा एसीजेएम कोर्ट ने सुनाया फैसला

अतिरिक्त मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट, बांसवाड़ा ने एक झोलाछाप ‘चिकित्सक’ को अवैध रूप से क्लिनिकल प्रैक्टिस करने के जुर्म में तीन वर्ष की सजा सुनाई और उस पर 6000 रुपए का जुर्माना भी लगाया है। न्यायालय से मिली जानकारी के अनुसार आरोपी को औषधि एवं प्रशासन अधिनियम के तहत लगे आरोपों का दोषी पाया गया। अभियोजन अधिकारी अमरप्रीत कोर ने बताया कि सीजेएम कोर्ट में एक परिवाद 20 सितम्बर, 2004 को बांसवाड़ा मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी की ओर से पेश किया गया। सीएमएचओ ने एक नीम-हकीम की 25 अप्रेल, 2004 को उसकी क्लिनिकल प्रैक्टिस को लेकर जांच की। उसके पास उपचार करने का कोई वैध दस्तावेज नहीं मिला था।

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जो दस्तावेज मिले थे, उनके संबंध में कोई जानकारी विभाग को भी नहीं दी गई। अदालत ने कोर्ट ने सभी पक्षों की सुनवाई के के बाद शहर की कंधारवाड़ी मस्जिद के सामने संचालित ‘राहुलदवाखाने’ के संचालक गोविंद कुमार पुत्र अजीत सरकार, उम्र 54 को औषधि अधिनियम के तहत लगाए आरोपों का दोषी पाया गया। न्यायाधीश रजनी कुमावत ने इस कानून की अलग-अलग धाराओं में तीन वर्ष के साधारण कारावास के साथ ही 6000 रुपए का जुर्माना भी लगाया है।