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जबलपुर। वैसे तो देशभर में श्रीरामलीला का मंचन किया जाता है पर जबलपुर में जिस परंपरा और विधि के साथ श्रीरामलीला का मंचन होता है वैसा शायद कहीं और नहीं होता। शहर की श्री गोविंदगंज रामलीला की तुलना अवधपुरी में होने वाली रामलीला से की जा सकती है। सबसे बड़ी बात यह है कि शहर में रामलीला के मंचन की परंपरा आजादी से पहले करीब एक सदी पुरानी है। इसे आज भी लोग उसी उत्साह के साथ देखने जाते हैं, जैसा टीवी, सैटेलाइट आने से पहले जाया करते थे। ऐसी मान्यता है कि रामलीला मंचन के समय स्वयं हनुमान जी आते हैं जो मंच के बाजू मंदिर में सदियों से विराजमान हैं।
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आजादी से एक सदी पहले की परंपरा
शहर में रामलीला का मंचन सबसे पहले श्री गोविंदगंज रामलीला समिति द्वारा 153 साल पहले वर्ष 1865 में शुरू किया गया था। इसकी नींव रज्जू महाराज द्वारा रखी गई थी। यह समिति आाजादी के 90 साल पहले से रामलीला का मंचन कर रही है। यह समिति आज भी उसी परंपरा के साथ रामलीला का मंचन करती है जैसा ग्रंथों में वर्णित है। बिना वाद्ययंत्रों के ही हर पात्र अपना मंचन करता है। रामलीला के पूरे मंचन के समय पात्र पूरी तरह सात्विक रहते हैं और कुछ पात्र इस अवधि में गृह त्याग भी कर देेते हैं।
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ऐसे हुई शुरुआत
मिलौनीगंज में डल्लन महाराज की प्रेरणा से रामलीला की शुरूआत हुई। रेलमार्ग न होने से शहर का व्यापार मिर्जापुर से होता था, जो कि मिर्जापुरा रोड भी कहलाता था। इसी मार्ग से बैलगाडिय़ों में माल लाया व ले जाया जाता था। इन्हीं व्यापारियों में मिर्जापुर के व्यापारी लल्लामन मोर जबलपुर आते रहते थे। उनके करीबी लोगों में डल्लन महाराज सबसे ऊपर थे। उन्होंने अपनी इच्छा जाहिर करते हुए रामलीला मंचन की बात रखी। जिस पर डल्लन महाराज ने खुलकर सहयोग दिया। उनके साथी रज्जू महाराज ने भी विशेष रुचि ली और सन् 1865 में पहली बार छोटा फुहारा स्थित कटरा वाले हनुमान मंदिर के सामने गोविंदगंज रामलीला का मंचन हुआ।
रामलीला मंचन का उद्देश्य भगवान श्रीराम के जीवन चरित्र से लोगों को प्रेरणा देना एवं सामाजिक व धार्मिक कुरीतियों में सुधार लाना था। इसके बाद नत्थू महाराज ने बागडोर संभाली, जिसमें मिलौनीगंज क्षेत्र के प्रतिष्ठित व्यापारियों ने तन, मन और धन से सहयोग दिया। इनमें मोथाजी मुनीम, साव गोपालदास, पुत्ती पहारिया, चुनकाई महाराज, डमरूलाल पाठक, मठोलेलाल रिछारिया आदि इसके सूत्रधार बने।
देश में सबसे पहले और सबसे बड़ा मंच
श्री गोविंद रामलीला समिति शहर ही नहीं देशभर में सबसे पहले रामलीला का मंचन शुरू कर देती है। मुकुट पूजन के साथ श्री रामलीला शुरू हो जाती है। इस रामलीला का मंचन जिस मंच पर किया जाता है, उतना बड़ा मंच देश में कहीं भी नहीं बनाया जाता है। लकड़ी के मंच पर सन् 1925 से मंचन शुरू हुआ है। इसके पहले बरगद के पेड़ के नीचे बड़े चबूतरे पर रामलीला दिखाई जाती थी।
तीन साल नहीं कर पाए मंचन
समिति संरक्षक राकेश पाठक पीआरओ के अनुसार 1939 में दूसरे विश्व युद्ध के आसार बने हुए थे। अंग्रेजों ने किसी तरह के सार्वजनिक आयोजनों पर रोक लगा रखी थी। जिसके चलते उस साल रामलीला का मंचन नहीं हो सका। साल 1964 और 1965 में भारत-पाकिस्तान के बीच जंग छिड़ गई। युद्ध में जबलपुर स्थित फैक्ट्रियों की भूमिका अहम थी साथ ही हालात भी सामान्य नहीं थे, जिसके चलते लगातार दो साल तक रामलीला का मंचन नहीं किया जा सका। इसके बाद से आज तक मंचन निर्वाद्ध जारी है।
मुकुट पहनकर बन जाते हैं भगवान
श्री गोविंदगंज रामलीला का शुभारंभ भगवान श्रीराम, लक्ष्मण, माता सीता और भक्त हनुमान के मुकुट पूजन से होता है। इन मुकुटों को धारण करने के बाद साधारण पात्र लोगों के लिए भगवान स्वरूप हो जाते हैं। ऐसा माना जाता है कि मुकुट में भगवान श्रीराम की विशेष कृपा होती है। यही वजह है कि बिना मुकुट पूजन के रामलीला का शुभारंभ नहीं होता है।
कंटेंट - लाली कोष्टा
Published on:
18 Sept 2017 04:16 pm
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