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वक्फ संशोधन कानून पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला: क्या लागू है, क्या रुका और आगे क्या होगा?

Waqf Amendment Act : जानें वक्फ (संशोधन) अधिनियम 2025 पर सुप्रीम कोर्ट के अंतरिम आदेश का पूरा सच। जानें क्या प्रावधान लागू हैं, किस पर रोक लगी है और कलेक्टर की शक्तियों पर अदालत ने क्या कहा।
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Waqf Amendment Act 2025 Supreme Court

Waqf Amendment Act 2025 Supreme Court : क्या है पूरा वक्फ संशोधन कानून?

वक्फ (संशोधन) अधिनियम 2025 को लेकर सबसे ज्यादा भ्रम सुप्रीम कोर्ट के अंतरिम आदेश को लेकर है। एक तरफ दावा किया गया कि सुप्रीम कोर्ट ने कानून पर रोक लगा दी, वहीं दूसरी तरफ यह कहा गया कि अदालत ने पूरे कानून को सही ठहरा दिया। दोनों बातें पूरी तरह सही नहीं हैं।

सुप्रीम कोर्ट ने 15 सितंबर 2025 को कानून के कुछ प्रावधानों पर अंतरिम रोक लगाई, लेकिन पूरे संशोधन अधिनियम को स्थगित नहीं किया। यानी कानून का बड़ा हिस्सा लागू है, जबकि कुछ विवादित प्रावधानों पर फिलहाल रोक है। अदालत का यह आदेश अंतिम फैसला भी नहीं है।

कानून आया कैसे?

वक्फ कानून में बदलाव की प्रक्रिया 2024 में शुरू हुई। सरकार का तर्क था कि वक्फ संपत्तियों के प्रबंधन में पारदर्शिता बढ़ाने, रिकॉर्ड को डिजिटल करने और संपत्तियों से जुड़े विवादों को कम करने के लिए मौजूदा कानून में बदलाव जरूरी है।

विपक्ष और कई मुस्लिम संगठनों ने इसका विरोध किया। उनका आरोप था कि संशोधन से वक्फ संस्थाओं और धार्मिक मामलों में सरकारी हस्तक्षेप बढ़ेगा तथा कुछ प्रावधान मुस्लिम समुदाय के धार्मिक अधिकारों को प्रभावित कर सकते हैं। संसद से पारित होने के बाद राष्ट्रपति की मंजूरी मिलने पर वक्फ (संशोधन) अधिनियम 2025 कानून बन गया।

इसके बाद कानून की संवैधानिक वैधता को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई। इनमें सांसद असदुद्दीन ओवैसी सहित कई याचिकाकर्ता शामिल थे। सुप्रीम कोर्ट के रिकॉर्ड में ओवैसी की याचिका 4 अप्रैल 2025 को दाखिल होने का उल्लेख है।

सुप्रीम कोर्ट में मुख्य सवाल क्या था?

याचिकाकर्ताओं की दलील थी कि कानून के कुछ प्रावधान संविधान के अनुच्छेद 14, 15, 21, 25, 26, 29, 30 और 300A से जुड़े अधिकारों को प्रभावित करते हैं।

दूसरी ओर केंद्र सरकार ने संशोधन का बचाव किया और कहा कि संसद को वक्फ संपत्तियों के प्रशासन और नियमन के लिए कानून बनाने का अधिकार है। सुप्रीम कोर्ट के सामने इसलिए दो अलग-अलग स्तर के सवाल थे।

पहला-क्या पूरे कानून को तुरंत रोक दिया जाए? और दूसरा क्या ऐसे विशिष्ट प्रावधान हैं जिनसे अंतिम फैसला आने तक अपूरणीय नुकसान हो सकता है और इसलिए उन पर अंतरिम रोक जरूरी है? 15 सितंबर 2025 के आदेश में अदालत ने दूसरा रास्ता अपनाया।

15 सितंबर 2025 को सुप्रीम कोर्ट ने क्या किया?

अदालत ने पूरे कानून पर रोक लगाने से इनकार किया। यानी यह कहना गलत है कि 'सुप्रीम कोर्ट ने वक्फ संशोधन कानून रद्द कर दिया।' लेकिन अदालत ने कुछ प्रावधानों पर अंतरिम राहत दी। सबसे महत्वपूर्ण बिंदु ये हैं।

संशोधन में वक्फ बनाने की पात्रता से जुड़ी एक शर्त को चुनौती दी गई थी, जिसमें व्यक्ति के कम से कम पांच साल से इस्लाम का पालन करने से जुड़ा प्रावधान था। सुप्रीम कोर्ट ने इस प्रावधान के संचालन पर रोक लगा दी।

अदालत की चिंता यह थी कि इस शर्त को लागू करने के लिए पर्याप्त स्पष्ट प्रक्रिया या नियम मौजूद नहीं थे। इसलिए अंतरिम स्तर पर इस प्रावधान को लागू नहीं किया गया।

यानी फिलहाल यह प्रावधान कानून की तरह मौजूद होने के बावजूद लागू करने के लिए इस्तेमाल नहीं किया जा सकता, जब तक आगे अदालत का आदेश न आ जाए।

कलेक्टर की शक्ति पर बड़ी रोक

यह विवाद का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा है। संशोधित कानून की धारा 3C से जुड़ी व्यवस्था में सरकारी जमीन होने के दावे की जांच के दौरान प्रशासनिक अधिकारी की भूमिका बढ़ती थी।

सुप्रीम कोर्ट ने इस व्यवस्था के उस हिस्से पर रोक लगाई जिसके तहत जांच लंबित रहने के दौरान वक्फ संपत्ति की स्थिति प्रभावित हो सकती थी। अदालत ने साफ किया कि संपत्ति के टाइटल का अंतिम फैसला सिर्फ प्रशासनिक अधिकारी के स्तर पर नहीं छोड़ा जा सकता। संपत्ति के अधिकार का विवाद वक्फ ट्रिब्यूनल और उसके बाद उच्च न्यायिक मंचों के जरिए तय होगा।

अदालत ने यह भी निर्देश दिया कि जब तक टाइटल का विवाद ट्रिब्यूनल में अंतिम रूप से तय नहीं होता, तब तक संबंधित वक्फ को संपत्ति से बेदखल नहीं किया जाएगा और रिकॉर्ड में भी ऐसा बदलाव नहीं किया जाएगा जो उसके अधिकार को प्रभावित करे। यानी कलेक्टर अंतिम न्यायिक फैसला करने वाली संस्था नहीं बन सकता।

गैर-मुस्लिम सदस्यों की संख्या पर सीमा

वक्फ बोर्ड और केंद्रीय वक्फ परिषद की संरचना भी अदालत के सामने महत्वपूर्ण मुद्दा थी। सुप्रीम कोर्ट ने अंतरिम व्यवस्था के तौर पर कहा कि:

  • केंद्रीय वक्फ परिषद में 22 में अधिकतम 4 गैर-मुस्लिम सदस्य होंगे।
  • राज्य वक्फ बोर्ड में 11 में अधिकतम 3 गैर-मुस्लिम सदस्य होंगे।

अदालत ने साथ ही यह भी कहा कि जहां तक संभव हो, बोर्ड के मुख्य कार्यकारी अधिकारी की नियुक्ति मुस्लिम समुदाय से करने का प्रयास किया जाए।

इसका मतलब यह नहीं है कि अदालत ने अंतिम रूप से यह तय कर दिया कि गैर-मुस्लिम सदस्य होना असंवैधानिक है। यह अंतरिम व्यवस्था है, जब तक संवैधानिक चुनौती पर अंतिम फैसला नहीं आता।

क्या-क्या नहीं रुका?

  • यहीं सबसे ज्यादा भ्रम पैदा हुआ है।
  • सुप्रीम कोर्ट ने पूरे वक्फ संशोधन कानून पर रोक नहीं लगाई।
  • यानी कानून के कई प्रावधान लागू हैं।
  • विशेष रूप से वक्फ संपत्तियों के पंजीकरण और रिकॉर्ड से जुड़ी व्यवस्था पूरी तरह खत्म नहीं हुई।
  • इसका अर्थ है कि वक्फ संपत्तियों के रिकॉर्ड को व्यवस्थित करने और पंजीकरण की प्रक्रिया कानून के अनुसार आगे बढ़ सकती है।
  • इसलिए यह कहना कि 'वक्फ की नई व्यवस्था पूरी तरह रुक गई है' भी सही नहीं है।

क्या वक्फ संपत्तियां सरकार अपने कब्जे में ले सकती है?

सुप्रीम कोर्ट के अंतरिम आदेश का एक महत्वपूर्ण प्रभाव यही है कि केवल प्रशासनिक जांच के आधार पर वक्फ संपत्ति से तत्काल बेदखली नहीं की जा सकती।

अदालत ने कहा कि धारा 3C के तहत टाइटल का विवाद अंतिम रूप से ट्रिब्यूनल में तय होने तक वक्फ को संपत्ति से बेदखल नहीं किया जाएगा। साथ ही ऐसे मामलों में तीसरे पक्ष के अधिकार बनाने पर भी रोक लगाई गई है। इसका मतलब यह नहीं है कि हर विवादित संपत्ति हमेशा के लिए वक्फ ही मानी जाएगी। बल्कि इसका मतलब है कि अंतिम फैसला कानूनी प्रक्रिया से होगा और तब तक स्थिति को अचानक बदलने से रोका जाएगा।

क्या सुप्रीम कोर्ट ने कानून को संवैधानिक घोषित कर दिया?

नहीं। यह भी एक बड़ी गलतफहमी है। 15 सितंबर 2025 का आदेश अंतरिम आदेश था। अदालत ने उस चरण पर पूरे कानून को असंवैधानिक घोषित नहीं किया और न ही उसे पूरी तरह संवैधानिक घोषित किया।

अंतिम सुनवाई में अदालत को यह तय करना होगा कि संशोधन संविधान के तहत मिले मौलिक अधिकारों और धार्मिक स्वतंत्रता की संवैधानिक गारंटी के अनुरूप है या नहीं। यानी असली संवैधानिक लड़ाई अभी बाकी है।

विवाद का सबसे बड़ा सवाल क्या है?

पूरा विवाद मूल रूप से एक बड़े संवैधानिक सवाल के आसपास घूमता है: वक्फ संपत्तियों के प्रशासन को नियंत्रित करने की संसद की शक्ति और धार्मिक संस्थाओं की स्वायत्तता के बीच सीमा कहां खींची जाए?

सरकार का पक्ष है कि वक्फ संपत्ति सार्वजनिक धार्मिक/चैरिटेबल ट्रस्ट की तरह प्रबंधित होती है और उसमें पारदर्शिता, रिकॉर्ड और प्रशासनिक जवाबदेही जरूरी है।

विरोध करने वालों का कहना है कि कुछ बदलाव धार्मिक स्वतंत्रता और समुदाय के अपने धार्मिक मामलों को संचालित करने के अधिकार को प्रभावित कर सकते हैं।

इसलिए सुप्रीम कोर्ट को सिर्फ यह नहीं देखना है कि कानून प्रशासनिक रूप से उपयोगी है या नहीं, बल्कि यह भी देखना होगा कि संसद ने संविधान की सीमाओं के भीतर रहकर यह कानून बनाया है या नहीं।

समयघटनाक्रम
2024वक्फ कानून में संशोधन की प्रक्रिया शुरू
अप्रैल 2025सुप्रीम कोर्ट में संवैधानिक चुनौतियां दाखिल
अप्रैल-मई 2025अदालत में अंतरिम राहत पर सुनवाई
15 सितंबर 2025सुप्रीम कोर्ट का अंतरिम आदेश
15 सितंबर 2025 के बादकुछ प्रावधानों पर रोक, बाकी कानून लागू
आगेकानून की संवैधानिक वैधता पर अंतिम सुनवाई बाकी

सवाल: क्या पूरा वक्फ संशोधन कानून रुक गया?
जवाब: नहीं।

क्या सुप्रीम कोर्ट ने कानून को पूरी तरह सही ठहरा दिया?
जवाब: नहीं। अंतिम संवैधानिक फैसला अभी बाकी है।

क्या पांच साल इस्लाम पालन वाली शर्त लागू है?
जवाब: इस प्रावधान के संचालन पर अंतरिम रोक है।

क्या कलेक्टर तुरंत किसी वक्फ संपत्ति से कब्जा हटा सकता है?
जवाब: टाइटल विवाद के अंतिम निपटारे से पहले ऐसी कार्रवाई पर सुप्रीम कोर्ट ने सुरक्षा दी है।

क्या गैर-मुस्लिम सदस्य पूरी तरह प्रतिबंधित हैं?
जवाब: नहीं। अंतरिम आदेश में उनकी संख्या सीमित की गई है।

क्या वक्फ संपत्तियों का पंजीकरण रुक गया?
जवाब: नहीं, कानून के पंजीकरण संबंधी प्रावधान पूरी तरह खत्म नहीं हुए।

क्या यह अंतिम फैसला है?
जवाब: नहीं। यह अंतरिम आदेश है।