- पाठकों का अब भी मुद्रित माध्यमों पर ज्यादा भरोसा है। - भारतेन्दु हरिश्चंद्र को आधुनिक हिंदी का जन्मदाता कहा जाता है और यह भी सर्वविदित है कि हिंदी में साहित्यिक पत्रकारिता का सूत्रपात भी उन्होंने ही किया।
पल्लव, (लेखक दिल्ली विश्वविद्यालय में अध्यापन और 'बनास जन' लघु पत्रिका का सम्पादन करते हैं)
हिंदी साहित्य समाज प्रति वर्ष भारतेन्दु जयन्ती के अवसर पर लघु पत्रिका दिवस भी मनाता है। असल में यह अवसर साहित्य-संस्कृति के क्षेत्र में छोटे, व्यक्तिगत और गैर सांस्थानिक मदद के बिना पत्रकारिता के संकल्पों को दोहराने का दिन है। भारतेन्दु हरिश्चंद्र को आधुनिक हिंदी का जन्मदाता कहा जाता है और यह भी सर्वविदित है कि हिंदी में साहित्यिक पत्रकारिता का सूत्रपात भी उन्होंने ही किया। आगे जाकर सत्तर के दशक में स्वतंत्रता के बाद जब साहित्यकारों को सांस्थानिक पत्रकारिता की सीमाओं में लिखना अपने मूल्यों के खिलाफ लगा, तब लघु पत्रिका आंदोलन ने जोर पकड़ा। इसके साथ ही यह भी स्पष्ट दिखाई दे रहा था कि हिंदी साहित्य-संस्कृति का कोई भी कार्य बड़ी पूंजी के दबाव और शिकंजे में नहीं हो सकता। उस दौर में अनेक साहित्यकारों ने लघु पत्रिकाओं का प्रकाशन किया।
सम्प्रति हिंदी में लगभग तीन-चार सौ नियतकालिक-अनियतकालिक लघु पत्रिकाएं प्रकाशित हो रही हैं, लेकिन कोरोना से उपजे नए हालात ने इस मुहिम को गहरा धक्का पहुंचाया है। लघु पत्रिकाओं को जहां अपने दम पर प्रबंधन के तमाम उपक्रम करने होते हैं, वहीं घर कैद और विज्ञापनों के अकाल ने इन पत्रिकाओं के हाथ बांध दिए हैं। बड़े मंचों से प्रकाशित हो रहीं अनेक प्रमुख साहित्यिक पत्रिकाओं को भी इस अवधि में अपना कलेवर बदलना पड़ा अथवा मुद्रण स्थगित करना पड़ा। कोरोना से पहले भी इन पत्रिकाओं के प्रकाशन में दिक्कतें कम नहीं थीं। इसके बावजूद अकेले राजस्थान से ही अनेक श्रेष्ठ लघु पत्रिकाएं इस बात की गवाही देती रही हैं कि साहित्य की स्वाधीनता अंतत: लोकतंत्र की स्वाधीनता को सुरक्षित करती है। इन पत्रिकाओं के माध्यम से केवल कम कीमत में ही श्रेष्ठ साहित्य सामान्य पाठकों तक नहीं पहुंचता, अपितु हमारी संस्कृति की धरोहर भी सुरक्षित होती है। मध्य प्रदेश से विश्व कविताओं के अनुवाद की अनूठी लघु पत्रिका 'तनावÓ और छत्तीसगढ़ से लोक कलाओं की पत्रिका 'मड़ई' इसके उदाहरण हैं।
वैश्वीकरण ने हमारे बाजारों को नियंत्रित करने के साथ ही हमारे पारम्परिक सांस्कृतिक-सामाजिक मूल्यों को भी निशाने पर लिया है। इस नए दौर का दबाव मीडिया के तमाम पक्षों पर देखा जा सकता है, तथापि बड़ी पूंजी का सहारा लिए बिना ये लघु पत्रिकाएं अपने संकल्प की शक्ति से निकल रही हैं। प्रकाशन के जल्दी-जल्दी बदलते माध्यमों के इस दौर में यह आग्रह भी बड़ा है कि इंटरनेट के माध्यम से ही लघु पत्रिकाओं को पाठकों तक पहुंचना चाहिए, क्योंकि यह सस्ता और सुगम है। इसके बावजूद यह भूलना नहीं चाहिए कि मुद्रित माध्यमों का भरोसा अब भी कहीं अधिक गहरा और उसकी पहुंच अब भी अधिक गहरी है। फिर भारत जैसे बड़े देश में इंटरनेट की पहुंच भी सभी पाठकों तक नहीं। लघु पत्रिकाओं की सामग्री भी इस तरह की नहीं होती कि किसी समाचार पोर्टल की तरह पढ़कर आगे बढ़ जाएं। यहां की गंभीर और वैचारिक सामग्री को पाठक सुरक्षित रखते हैं।
दिल्ली सरकार और भारत सरकार के बड़े सार्वजनिक उपक्रमों ने ऐसी छोटी पत्रिकाओं को भी नियमित विज्ञापन देकर उन्हें आर्थिक अवलम्बन प्रदान किया था। राजस्थान साहित्य अकादमी साहित्यिक पत्रकारिता के क्षेत्र में अपने पुरोधा सम्पादक प्रकाश जैन की स्मृति में पुरस्कार देती थी। अब ये सभी बातें अतीत की स्मृति हैं। लघु पत्रिकाओं के लिए यह सचमुच बड़ी चुनौती का समय है। आर्थिक असुरक्षा के घनघोर दबावों और पाठकों की विकृत अभिरुचियों के बीच अपने साहित्यिक-सांस्कृतिक मूल्यों को बचाते हुए लघु पत्रिकाओं का प्रकाशन सुनिश्चित करना होगा।