
arvind kejriwal
- डॉ. एस.एन. सिंह, टिप्पणीकार
आम आदमी पार्टी के विधायकों पर दिल्ली के मुख्य सचिव अंशु प्रकाश से बदसलूकी के आरोप लगे हैं। राज्य की इमारत ब्यूरोक्रेसी और निर्वाचित जनप्रतिनिधियों पर निर्भर हैं। एक दूसरे को नीचा दिखाने अथवा जलील करने से पूरी इमारत का अस्थिर होना तय है। ऐसा लगता है कि देश में ब्यूरोक्रेसी का राजनीतिक धु्रवीकरण हो रहा है। यदि किसी राज्य का मुख्य सचिव ही सुरक्षित नहीं हो और अपमान सहे तो क्या छोटे कर्मचारी बच सकेंगे?
राजनीति में जिस प्रकार के लोग हम चुन रहे हैं उससे हमारा लोकतंत्र खोखला हो रहा है। सार्वजनिक जीवन में सत्यनिष्ठा व ईमानदारी की कमी होती जा रही है। अन्य प्रांतों में भी नौकरशाही के खिलाफ हिंसा और दुव्र्यवहार की घटनाएं घटित हो रही हैं। बिहार में जिला मजिस्ट्रेट की राजनीतिक दल के लोगों ने पिटाई की, हाल ही में मध्यप्रदेश के मंदसौर में भीड़ ने जिला कलेक्टर व पुलिस अधीक्षक की पिटाई की।
राजनीतिक दलों के मूल्य व सिद्धांत बदल रहे हैं। जनता के सेवक कहलाने वाले चुनिंदा लोग जनता के मालिक बन बैठे हैं। जनसेवा और त्याग का स्थान पहले धनबल ने लिया फिर धन बल का स्थान बाहुबल ने लिया, बाहुबल का स्थान अपराध ने लिया व उसके बाद हिंसा ने ले लिया। भ्रष्टाचार अब कोई मुद्दा नहीं रहा। राजनेताओं के पास सत्ता की ताकत है परन्तु उनको ध्यान रखना चाहिए कि लोकसेवक के यथेष्ठ सम्मान की रक्षा भी आवश्यक है।
लोकशाही ने लालफीताशाही की आड़ लेकर अपनों को बहुत छला है। दूसरी ओर सरकारी दफ्तरों में बैठे अफसरों पर भ्रष्टाचार के संगीन आरोप भी साबित हो रहे हैं। परन्तु इन सबके बावजूद दोनों पक्षों को दुव्र्यवहार करने का अधिकार नहीं मिलता। सरकार नीति तय करती है। ब्यूरोके्रसी की जिम्मेदारी नीतियों का क्रियान्वयन कर उनका लाभ आम आदमी तक पहुंचाना सुनिश्चित करना है।
गत वर्षों में राजनेता और ब्यूरोके्रसी के मध्य टकराव बढ़ता जा रहा है। जब राजनीतिक विचारधारा अधिक आधारभूत परिवर्तन की आकांक्षा करती है तब यथार्थ में प्रशासनिक विचारधारा की समस्यायें समुदायात्मक, क्रियात्मक, यथार्थ एवं व्यवहारार्थ होती है। प्रशासनिक तंत्र ? के सभी स्तरों पर राजनैतिक हस्तक्षेप से मतभेद बढ़ा है जिससे प्रशासनिक तंत्र पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है और अधिकारियों की भावनाओं को भी ठेस पहुंची है। स्वस्थ लोकतंत्र के लिए आवश्यक है कि लोकशाही व नौकरशाही ओछी राजनीति में नहीं पड़े। आरोप-प्रत्यारोप व एक दूसरे के साथ दुव्र्यवहार नहीं करें, अपनी भाषा को संयमित रखें।
Published on:
04 Mar 2018 11:29 am
