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ट्रैवलॉग अपनी दुनिया : अद्भुत है उत्तराखंड के जौनसार-बावर की सांस्कृतिक विरासत

जौनसार बावर क्षेत्र उत्तराखंड की राजधानी देहरादून, चकराता और मसूरी के आसपास का ही क्षेत्र है जो प्रदेश के सबसे ज्यादा पसंद किए जाने वाले पर्यटन स्थलों में शुमार है।

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जौनसार-बावर

जौनसार-बावर

संजय शेफर्ड , (ट्रैवल ब्लॉगर)

देश के पहाड़ी राज्य उत्तराखंड का जौनसार बावर क्षेत्र अपनी जुदा लेकिन अद्भुत सांस्कृतिक विरासत के लिए जाना जाता है। यहां स्थित कालसी और लाखामंडल क्षेत्र की विशेषताओं के बारे में नजदीक से जानने का जो मौका मुझे मिला, वह आज साझा कर रहा हूं।

जौनसार बावर क्षेत्र उत्तराखंड की राजधानी देहरादून, चकराता और मसूरी के आसपास का ही क्षेत्र है जो प्रदेश के सबसे ज्यादा पसंद किए जाने वाले पर्यटन स्थलों में शुमार है। इस जगह का भूगोल हो या फिर इतिहास, दोनों की ही बात निराली है। कुछ लोग इसे सम्राट अशोक और बौद्ध धर्म की वजह से जानते हैं तो कुछ लोग कौरव-पांडव कालीन कहानियों और पौराणिक कथाओं की वजह से यहां खिंचे चले आते हैं। 2013 में एक शैक्षिक यात्रा के दौरान मैं पहली बार यहां आया। जौनसार-बावर की मानवीय संस्कृति और व्यवहार को जानने-समझने का प्रयास कर रहा था और कई बार ऐसा होता था कि मुझे उन्हीं के बीच गांव में ठहरना होता था। मैं करीब एक सप्ताह तक इस आदिवासी घाटी में रहा।

सामुदायिक गतिविधियों के प्रमुख स्थानीय केंद्रों को देखने के बाद मैंने पाया कि यहां के लोगों ने पुरातन संस्कृति का दामन नहीं छोड़ा है, वे अभी भी अपनी सदियों से चली आ रही परंपरा को निभा रहे हैं। दरअसल, जौनसार-बावर दो क्षेत्र हैं जिनमें दो जनजातियां निवास करती हैं। निचला हिस्सा जौनसार और ऊपरी हिस्सा बावर कहलाता है। दोनों एक ही भूभाग के अलग-अलग हिस्से हैं और एक-दूसरे से पूरी तरह सटे हुए हैं। यहां के मूल निवासी अपनी उत्पत्ति को अलग-अलग मानते हैं। जौनसारी जनजाति के लोग खुद को पांडवों का वंशज मानते हैं और बावर के लोग खुद को कौरवों से जोड़कर देखते हैं। क्रमश: इनको पाशि और शाठी भी कहा जाता है।

यमुना और टोंस नदियों के मध्य में स्थित इस पूरे क्षेत्र में आदिवासी समुदाय की बहुलता है। गढ़वाल में होते हुए भी जौनसार की दोनों ही जनजातियों की संस्कृति कुमाऊं व गढ़वाल से अलग है। मेले और तीज-त्योहार की बात करें तो जौनसारियों का सबसे महत्त्वपूर्ण पर्व माघ मेला है।

जौनसार-बावर के हणोल या हनोल गांव में हूण स्थापत्य शैली में बना लोक देवता महासू का मंदिर यहां के मुख्य आकर्षणों में से एक है। इसका निर्माण हूण राजवंश के पंडित मिहिरकुल हूण ने करवाया था। क्षेत्र के प्रमुख स्थल कालसी, लाखामंडल, बैराटगढ़ और हनोल है। हनोल के मुख्य मंदिर के अलावा थैणा, लखवार, लखस्यार और बिसोई व लोहारी में भी महासू देवता के मंदिर दर्शनीय हैं।