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शिक्षा, रोजगार और आत्मसंतुष्टि

जीवन का लक्ष्य और उद्देश्य, जीवन की असीम संभावना, समस्या और समाधान समझने के लिए गहन विचार शक्ति का होना अनिवार्य है। यह शक्ति हमें यथार्थ शिक्षा से ही प्राप्त हो सकती है।
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Sunil Sharma

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Jul 02, 2018

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- ऋतु सारस्वत, समाजशास्त्री

देश के युवाओं के सामने रोजगार हासिल करना आज सबसे बड़ी चुनौती है। इसलिए एक और अहम सवाल यह भी है कि क्या आज की शिक्षा व्यवस्था, युवा प्रतिभा को पहचानने में सक्षम है या फिर किताबी ज्ञान पर आधारित डिग्रियों की लंबी फेहरिस्त के बीच देश के युवाओं में उस स्तर की प्रतिभा का अभाव है जितनी कि संबंधित नौकरियों के लिए चाहिए। यह जानना और समझना बहुत जरूरी हो जाता है कि क्यों देश का युवा उन स्वप्नों को पूरा नहीं कर पा रहा है जो कि वह अपने लिए देखता है।

दुर्भाग्यपूर्ण तथ्य तो यह है कि वर्तमान शिक्षा व्यवस्था ने युवाओं को भ्रमित कर दिया है। संपूर्ण समाज ऐसे मिथकों के ढेर पर बैठ गया, जिसे दूर करना सहज नहीं है। मौजूदा शिक्षा व्यवस्था में समझने के बजाय रटाया जाता है और युवाओं को हुनर सिखाने और उनकी सोच बदलने की कोशिश नहीं की जाती। देश के युवा ऐसी डिग्रियों के साथ बाहर निकल रहे हैं, जो उन्हें कुछ नहीं सिखाती। ऐसे दौर में जब नवाचार का महत्त्व बढऩे के साथ तकनीक की गति भी बढ़ रही है, शिक्षा की कमजोर बुनियाद वाले लाखों छात्रों का भविष्य स्वाभाविक तौर पर उज्ज्वल नहीं हो सकता। तो ऐसे में क्या? जीवन का लक्ष्य और उद्देश्य, जीवन की असीम संभावना, समस्या और समाधान समझने के लिए गहन विचार शक्ति का होना अनिवार्य है। यह शक्ति हमें यथार्थ शिक्षा से ही प्राप्त हो सकती है।

यह सत्य है कि जिस तादाद में जनसंख्या बढ़ रही है उस अनुपात में रोजगार सृजित करना असंभव है। व्यवस्थाओं पर अंगुली उठाने के बजाय, स्वयं यह विचार करना आवश्यक हो जाता है कि जिस राह को उन्होंने चुना है क्या वह उनके स्वभावगत है। युवा बल को युवा शक्ति में रूपान्तरित करने के लिए सबसे पहले युवा को अपने स्वभाव को पहचानने का प्रशिक्षण देना होगा। स्वभाव के अनुरूप कार्य का चयन करने से पूरी क्षमता व संभावना का विकास हो सकता है। भीड़ का हिस्सा बन, अपनी आजीविका का चयन करने के स्थान पर अपने स्वभाव के अनुरूप शिक्षा व व्यवसाय का चयन आत्मसंतुष्टि का भाव देगा।

‘स्वभाव से स्वावलम्बन’ युवा आकांक्षाओं की पूर्ति का मूलमंत्र सिद्ध हो सकता है। वह कार्य या विषय, जो रुचिकर हो, चुनने पर राह में आई चुनौतियां भी दुष्कर प्रतीत नहीं होती हैं। परम्पराओं का निर्वहन करने के प्रयास में रुचिकर विषयों का चुनाव न करना स्वयं के लिए दु:खद ही हो सकता है।