इलेक्ट्रिक वाहनों को अपनाने में आने वाली बाधाओं को दूर करने की जरूरत है, ताकि भारत अपनी पर्यावरणीय और आर्थिक आकांक्षाओं को साकार करने की दिशा में आगे बढ़ सके।
प्रदीप सिंह मेहता महासचिव, कट्स इंटरनेशनल
भारत जलवायु परिवर्तन से निपटने और पर्यावरणीय बोझ को कम करने के लिए अपनी राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित प्रतिबद्धताओं को पूरा करने के लिए एक रणनीति के रूप में इलेक्ट्रिक वाहनों (ईवी) को अपनाकर परिवहन क्षेत्र को कार्बन मुक्त करने की दिशा में धीरे-धीरे आगे बढ़ रहा है। लेकिन, इस मार्ग में अभी कई बाधाएं हैं। बुनियादी ढांचे की कमी एक महत्त्वपूर्ण मुद्दा है जिस पर तत्काल ध्यान देने की आवश्यकता है। आज भी सीएनजी स्टेशनों पर वाहनों की लंबी कतारें देखने को मिलती हैं। उम्मीद की जाती है कि इलेक्ट्रिक चार्जिंग स्टेशनों का हश्र सीएनजी आपूर्ति ढांचे जैसा नहीं होगा। इस बुनियादी ढांचे को मजबूत करने की जरूरत है। सार्वजनिक निजी भागीदारी (पीपीपी मोड) के माध्यम से इसे बढ़ावा दिया जा सकता है। साथ ही व्यापक पुनप्र्रशिक्षण कार्यक्रमों के माध्यम से श्रम बल को कुशल बनाने पर ध्यान दिया जाना चाहिए।
ईवी निर्माताओं को इलेक्ट्रिक मोबिलिटी में निवेश करने के लिए ऋण और भूमि के रूप में प्रोत्साहन की भी आवश्यकता है। इसके साथ ही, सरकार को ईवी की उच्च अग्रिम लागत को कम करने के लिए कर छूट और कम वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) दरें प्रदान करनी चाहिए, जो अक्सर ग्राहकों को उन्हें खरीदने से रोकती हैं। इसके अतिरिक्त कार्यान्वयन स्तर पर स्थानीय सरकारों की भूमिका को पहचानने की आवश्यकता है। ईवी पुनर्विक्रय बाजार और बैटरी स्वैपिंग कार्यक्रम, समग्र लागत को प्रभावित करते हैं। भारत में फिलहाल इनमें से किसी के लिए भी सुस्थापित बाजार का अभाव है।
कुशल संसाधन उपयोग के लिए बैटरी बाजार का विनियमन और उचित निगरानी की आवश्यक है। इसके अलावा, भारत को इलेक्ट्रिक बैटरियों की सीमाओं पर विचार करना चाहिए, विशेष रूप से लिथियम का कम ऊर्जा घनत्व। इसके कारण इलेक्ट्रिक कार्गो वाहनों के लिए भारी एवं महंगी बैटरियां बनती हैं। कार्गो परिवहन के लिए उभरते हाइड्रोजन आधारित समाधानों को बढ़ावा देना भी अंतरिम समाधान हो सकता है। भारत में इलेक्ट्रिक मोबिलिटी का भविष्य हरित ढांचागत क्रांति की सफलता और बैटरियों से उत्पन्न ई-कचरे की समस्या के समाधान पर निर्भर करता है। शैक्षणिक अध्ययन बेहतर वित्त पोषण के माध्यम से बुनियादी ढांचे में सुधार मानते हुए, अगले कुछ दशकों में भारत में इलेक्ट्रिक वाहनों की खरीद में पर्याप्त वृद्धि का पूर्वानुमान लगाते हैं। एक पहलू जिसे अक्सर अनदेखा किया जाता है वह है भारत में ई-कचरे की समस्या में योगदान देने वाली विशाल बैटरियों से भविष्य मे संभावित का खतरा है। असल में देश में उचित रीसाइक्लिंग और ई-कचरा प्रबंधन सुविधाओं का अभाव है। इस प्रयास में, ग्रामीण सामूहिक समूह एक प्रणालीगत समाधान पेश कर सकते हैं। उपरोक्त मुद्दों का नीति और बाजार के हस्तक्षेप के माध्यम से समाधान करना आवश्यक है। इलेक्ट्रिक वाहनों को अपनाने में आने वाली बाधाओं को दूर करने की जरूरत है, ताकि भारत अपनी पर्यावरणीय और आर्थिक आकांक्षाओं को साकार करने की दिशा में आगे बढ़ सके।