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शरीर ही ब्रह्माण्ड– स्त्री : माया का अवतार

‘अहं ब्रह्मास्मि’ कहना सरल है, किन्तु इसको समझ पाना कठिन है। ब्रह्म एक सर्वत्रव्यापी तत्व है, निराकार, निष्काम है। प्रलय काल में एकमात्र ब्रह्म ही भासित होता है, जो निर्विशेष कहलाता है।

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जयपुर

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Gulab Kothari

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गुलाब कोठारी

Mar 21, 2026

Gulab Kothari wrote istri Incarnation of Maya

पत्रिका समूह के प्रधान संपादक गुलाब कोठारी। फोटो पत्रिका

‘अहं ब्रह्मास्मि’ कहना सरल है, किन्तु इसको समझ पाना कठिन है। ब्रह्म एक सर्वत्रव्यापी तत्व है, निराकार, निष्काम है। प्रलय काल में एकमात्र ब्रह्म ही भासित होता है, जो निर्विशेष कहलाता है। हालांकि यह भी एक काल्पनिक अवस्था है। अग्नि-सोम सदा साथ रहते हैं। परात्पर में ब्रह्म-माया के दो स्वरूपों की चर्चा है, किन्तु अविनाभाव होने से अलग-अलग नहीं रह सकते। ब्रह्म अग्नि तत्व है, अग्नि साकार है। सोम निराकार होता है, अग्नि को आवरित करके रहता है। यही आहुति द्रव्य है। यही आवरण तंत्र है, विश्व है।

ब्रह्म (अव्यय) का विद्या भाग रसप्रधान है, कर्मभाग बलप्रधान है। कर्म शून्य ही परात्पर भाव है। कर्म से आवरित वही अव्यय कहलाता है। कर्म के लिए चेष्टा और चेष्टा के लिए कामना चाहिए। ब्रह्म के मन में कामना का उदय ही प्राणन का कारण बना। अप् की उत्पत्ति हुई। प्राण भाग ही प्राण-आप दो भागों में बंट गया। यही वृषा-योषा बने। जिस कामना से आप बना, वही ब्रह्म के मन का बीज कहलाया। यही कामना माया रूप में जानी जाती है। मन और कामना एकाकार ही रहते हैं। हम कह सकते हैं कि मन ब्रह्म है और कामना माया। चूंकि कामना निराकार भी है और गतिशून्य भी, इसमें कोई क्रिया नहीं है। दोनों निराकार नहीं हो सकते- सृष्टि विस्तार के लिए। माया ऋत रूप ब्रह्म को सत्य रूप- अव्यय पुरुष बनाती है।

अव्यय मन में कामना यदि ब्रह्म के विवर्त के लिये उठती है तो माया है, अन्यथा वासना रूप है। वासना में विवर्त तो है, किन्तु ब्रह्म नहीं रहता। ब्रह्म के विवर्त कर्म में एक दिव्यता का प्रकाश होता है जो अंधकार में भी आत्मा को प्रकाशित रखता है। जैसे विवाह पूर्व का अपरा भाव कन्या को विवाह के अगले ही क्षण में परा भाव में स्थानान्तरित कर देता है। वैसे ही विवर्त भाव दोनों आत्माओं को सुसूक्ष्म स्तर तक उठा देता है।

महाभारत के प्रारम्भ में जब महर्षि पाराशर सत्यवती (केवट कन्या) को देखते हैं, तो मंत्रमुग्ध हो जाते हैं। कन्या उनके योगी भाव पर प्रश्न कर बैठती है। महर्षि उसकी सुन्दरता की प्रशंसा करते हुए कहते हैं कि उन्होंने दो ही सुन्दरतम स्त्रियां देखी हैं। 'कौन कौन सी’ के उत्तर में पुन: महर्षि कहते हैं कि 'एक मां प्रकृति और एक तुम।‘ कैसा अद्भुत उत्तर था। कहां शरीर का अस्तित्व था? एक ओर मां जिसने जन्म दिया और दूसरी ओर कन्या जो (यदि सत्य हुआ) उसकी सन्तान की मां होगी। कहां की समानता है दोनों में? हां है! प्रत्येक जननी मां है। प्रत्येक मां सुन्दरतम है। प्रत्येक जननी ब्रह्म को ही अपनी आकृति में जन्म देती है। प्रकृति उसे आकर्षित करने में सहायक होती है। उसे विवर्त का प्रयोजन समझ में आता है। अन्यत्र वह मौन रहती है।

माया के संसार की भाषा माया ही समझ सकती है। मछुआरी कन्या सत्यवती को पिता ने बताया कि वह संन्यासी से उसका विवाह नहीं करना चाहता, किसी राजकुमार से करना चाहता है। सत्यवती ने कारण पूछा और उत्तर पाकर संतुष्ट हो गई। किंतु जब मां ने पूछा कि क्या संन्यासी से विवाह करना चाहोगी, तब वह मौन हो गई। माया का मौन ही उसकी अभिव्यक्ति है। मां-पुत्री दोनों ही सूक्ष्म स्तर पर थे। देहातीत आकाश में स्पंदन दोनों के समान होते हैं। मां समझ गई कि बेटी सूक्ष्म से ही बात कर रही है (मां सूक्ष्म में रहती है आत्मा के साथ)। बस फिर दोनों मौन।

प्रत्येक मनुष्य के तीन शरीर होते हैं-स्थूल, सूक्ष्म और कारण शरीर। प्रत्येक शरीर की एक विशेष इच्छा भी होती है। मूल इच्छा तो ब्रह्म की ही रहती है-'एकोऽहं बहुस्याम्’ जिसके कारण ब्रह्माण्ड (जगत) का निर्माण होता गया। इस इच्छा को ब्रह्म का विवर्त या पुत्रैषणा कहा जाता है। यह कार्य पुत्री से नहीं हो सकता।

दूसरी इच्छा सूक्ष्म शरीर अथवा आत्मा की कही गई है-लोकैषणा अथवा यश प्राप्ति की कामना। इसके लिए लोग धन देकर नाम कमाते रहते हैं। स्थूल शरीर भोग चाहता है। इसकी इच्छा धन की अर्थात् वित्तैषणा कहलाती है। मूल में तीनों कामनाएं स्त्री-पुरुष दोनों में समान होती हैं।

दाम्पत्य भाव में वित्तैषणा और लोकैषणा का आधार पुरुष बनता है। पुत्रैषणा भी मूल में तो पुरुष आधारित ही है किन्तु इसमें भूमिका माया की देखी जाती है। माया स्त्री-पुरुष दोनों के कारण शरीर के स्तर पर कार्य करती है। अत: दोनों को कारण शरीर की भूमिका तक पहुंचना होता है। पुरुष के लिए तो सूक्ष्म शरीर का योग करना भी सहज नहीं होता। उसका स्त्रैण अद्र्धांग आमतौर पर पोषित बहुत कम हो पाता है। अपने माया भाग से वह अनभिज्ञ रहकर बड़ा होता है। बहुत कम युवकों को इस क्षेत्र में अध्ययन एवं अभ्यास करने का मौका मिल पाता है। हां, यह बात उसे समझ में आती है कि विवाह के बाद उसका परिवार होगा। इसमें वह स्वयं की ही (शरीर की) भूमिका मानता है। स्त्री जन्म से माया का अवतार होती है। मातृत्व का भाव लेकर जन्म लेती है। प्रत्येक वार-त्योहार पर अच्छे घर-वर के लिए ईश्वर (आमतौर पर पार्वती) से प्रार्थना करती रहती है। अपने शरीर और स्वास्थ्य के प्रति सजग रहती है। उसे यह भी ध्यान में रहता है कि उसे मातृत्व के लिए पुरुष के साथ रहना है, उससे बीज ग्रहण करके उसका निर्माण और पोषण भी करना है। यह चिंतन की गंभीरता है।

मातृत्व दैहिक कर्म दिखाई जरूर पड़ता है, किन्तु इससे कहीं आगे है। इसमें आरंभ ही सूक्ष्म शरीर से होता है, कारण शरीर आहुत होता है। स्थूल शरीर तो मात्र साधन है, वाहक है। स्त्री की सौम्यता प्रारंभिक आकर्षण होता है, किन्तु विवाह कर्म की समाप्ति पर दोनों का प्रवेश (एक-दूसरे के लिए) सूक्ष्म में हो जाता है। शरीर साधन मात्र रह जाता है। पुरुष के स्त्रैण भाव की अल्पता के कारण उसको सूक्ष्म-प्रवेश में सफलता सहज रूप से नहीं मिल पाती। चूंकि दोनों के ब्रह्मांश पुरुष शरीर में रहते हैं। अत: स्त्री सहजता से कारण शरीर से भी जुड़ जाती है। वह तो आई ही विवर्त के लिए है, अत: सम्पूर्ण यज्ञ में उसका ध्यान ब्रह्मांश पर रहता है, पुरुष का अंगाश बटोरने पर रहता है। पुरुष इन दोनों कर्मों से अनभिज्ञ रहता है। विवर्त का भौतिक स्वरूप ही उसके मन में रहता है। पुत्रैषणा चूंकि दोनों के मन में रहती है, अत: दोनों ही आत्मिक धरातल पर युक्त रहते हैं। यही भारतीय विवाह में मंत्रों की भूमिका का परिणाम है।

स्त्री की भूमिका मात्र विवर्त तक सीमित कर देना अनेक दृष्टि से अधोगति का कारण बन जाता है। माया सन्तान का भविष्य भी जानती है। देवकी की दृष्टि आठवीं सन्तान पर थी। कन्या ने भविष्यवाणी कर दी थी। द्वापर में गंगा ने ही सात पुत्रों को नदी में बहा दिया था। आठवें गंगापुत्र भीष्म हुए। हम कहते हैं कि सीता धरती से और द्रौपदी अग्नि कुण्ड से पैदा हुई थी। वास्तव में तो शरीर पृथ्वी (पंचमहाभूत निर्मित) है और स्त्री शरीर अग्नि कुण्ड है। प्रत्येक युग में जीवन का संचालन स्त्री के ही हाथ में है। विवर्त की भूमिका उसी की है।

आधुनिक शिक्षा ने मातृत्व विषय में प्रवीण महिला को अज्ञानी बना दिया। न उसको शरीर के प्राकृतिक स्वरूप की जानकारी है, न ही स्त्रैण भूमिका की। शिक्षा ने उसे भौतिकवाद से बांध दिया, जिसमें अर्थ और काम ही रह गया। काम पूर्ति के लिए अर्थ का अर्जन। जितना मिले उतना कम। कृष्ण ने गीता में काम-क्रोध-लोभ तीनों को नरक के द्वार कहा है। मूल में तो एक काम ही है। अर्थ अर्जन में काम ही मुद्रा बन गया, शरीर संपदा हो गया। स्त्री खो गई, ब्रह्म का विवर्त ठहरने लगा है। लगता है शनै: शनै: ब्रह्म सृष्टि से बाहर हो जाएगा-बिना माया के। वही कलियुग का अंत होगा।
क्रमश:
gulabkothari@epatrika.com