
विनय कौड़ा - अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकार,
पश्चिम एशिया का क्षितिज एक बार फिर धधक रहा है। अमरीका-इजरायल के संयुक्त सैन्य प्रहारों और ईरान की प्रतिघाती कार्रवाई ने पूरे इलाके को युद्ध की काली छाया में ला खड़ा किया है। अमरीकी वायुसेना की ओर से ईरान के खार्ग द्वीप स्थित सैन्य ठिकानों पर बड़े हमले और उसके बाद ईरान की ओर से समुद्री मार्गों पर दबाव की रणनीति ने इस संकट को और गहरा बना दिया है। इस उथल-पुथल के बीच भारत एक जटिल संतुलन साधने का प्रयास कर रहा है - मानो वह इतिहास और भूराजनीति के बीच तनी हुई रस्सी पर सावधानी से कदम रख रहा हो।
भारत के लिए पश्चिम एशिया उसकी आर्थिक धमनियों का विस्तार है। ऊर्जा आपूर्ति, समुद्री व्यापार मार्ग, प्रवासी भारतीयों की सुरक्षा और बहुआयामी कूटनीतिक संबंध जैसे कारक इस क्षेत्र को भारत की विदेश नीति का अनिवार्य अध्याय बनाते हैं। इसलिए जब फारस की खाड़ी में युद्ध की आहट गूंजती है, तो उसकी प्रतिध्वनि नई दिल्ली की रणनीतिक सोच में सुनाई देना स्वाभाविक है। पीएम नरेंद्र मोदी ने ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन से बातचीत कर क्षेत्रीय तनाव के बीच समुद्री मार्गों की सुरक्षा और भारतीय जहाजों की आवाजाही पर चर्चा की। इस संवाद के केंद्र में हॉर्मुज जलडमरूमध्य की स्थिरता की रणनीतिक चिंता है।
कूटनीतिक प्रयासों के बाद दो भारतीय एलपीजी टैंकरों को इस संकट के बीच सुरक्षित मार्ग मिल सका। भारत सरकार ने स्पष्ट किया है कि ईरान के साथ 'सामूहिक व्यवस्था' (ब्लैंकेट अरेंजमेंट) नहीं है और प्रत्येक जहाज की आवाजाही अलग-अलग कूटनीतिक समन्वय के आधार पर सुनिश्चित की जा रही है। वैसे इस संघर्ष का गहरा आयाम सिर्फ समुद्री मार्गों तक सीमित नहीं है। अमरीका-इजरायल की रणनीति 'रेजिम चेंज' के जरिये ईरान की सैन्य शक्ति और उसके क्षेत्रीय प्रभाव को कमजोर करना है। इजरायल के लिए यह अस्तित्व का प्रश्न है क्योंकि वह ईरान के परमाणु व मिसाइल कार्यक्रमों को समाप्त करना चाहता है। अमरीका इस संघर्ष को परमाणु अप्रसार, क्षेत्रीय सुरक्षा और खाड़ी क्षेत्र में अपने हितों की रक्षा के रूप में प्रस्तुत कर रहा है।
किंतु ईरान की राजनीतिक संरचना इतनी सरल नहीं कि केवल सैन्य प्रहारों से बदल दी जाए। उसकी धार्मिक-राजनीतिक व्यवस्था दशकों में इतनी संस्थागत हो चुकी है कि बाहरी दबावों के बावजूद वह स्थिर बनी हुई है। युद्ध की यह रणनीतिक शतरंज भारत के लिए कई स्तरों पर चुनौती उत्पन्न कर रही है। यदि तेल की कीमतों में वृद्धि जारी रहती है, तो उसका प्रभाव केवल पेट्रोल या डीजल तक सीमित नहीं रहेगा। वह परिवहन, कृषि, उद्योग और उपभोक्ता बाजार तक फैलेगा। फारस की खाड़ी की स्थिरता भारत के लिए सिर्फ विदेश नीति का प्रश्न नहीं, बल्कि आर्थिक स्थिरता का भी प्रश्न है। पिछले दो दशकों में भारत की पश्चिम एशिया नीति में उल्लेखनीय परिवर्तन आया है। पहले यह नीति मुख्यत: ऊर्जा आयात तक सीमित थी, परंतु अब यह कहीं अधिक बहुआयामी हो चुकी है।
एक ओर भारत के इजरायल के साथ रक्षा और तकनीकी सहयोग लगातार मजबूत हुए हैं, वहीं दूसरी ओर ईरान के साथ ऐतिहासिक और भू-आर्थिक संबंध भी उतने ही महत्वपूर्ण रहे हैं। ऐसे में किसी एक पक्ष का खुला समर्थन करना भारत के लिए व्यावहारिक नहीं है, इसलिए उसने संतुलित कूटनीति का मार्ग चुना है। वर्तमान संकट ने एक सच्चाई उजागर की है कि एक ही समुद्री मार्ग पर अत्यधिक निर्भरता जोखिम भरी है। यदि हॉर्मुज जलडमरूमध्य लंबे समय तक अस्थिर रहता है, तो वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति शृंखला में गहरी बाधा आ सकती है। भारत की ओर से विकसित किए जा रहे वैकल्पिक सम्पर्क मार्गों का महत्व बढ़ जाता है।
भारत-मध्यपूर्व-यूरोप आर्थिक गलियारा केवल आर्थिक योजना नहीं, बल्कि भू-राजनीतिक सुरक्षा की रणनीति भी है। इनका उद्देश्य दक्षिण एशिया, मध्यपूर्व और यूरोप को बंदरगाहों, रेलमार्गों और लॉजिस्टिक्स नेटवर्क के माध्यम से जोडऩा है। पश्चिम एशिया का यह संकट चाहे जितना भी लंबा चले, उसके भीतर छिपा संदेश स्पष्ट है कि वैश्विक अनिश्चितताओं के युग में केवल आशा के सहारे नहीं जिया जा सकता। भारत के समक्ष प्रश्न केवल वर्तमान संकट से निपटने का नहीं, बल्कि भविष्य की रणनीतिक तैयारी का है।
Published on:
18 Mar 2026 02:25 pm
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