यह सही है कि यूएस पर वैश्विक ऋण भार काफी अधिक है, पर विभिन्न कारणों से आज भी डॉलर को सुदृढ़ बनाने वाले घटक मौजूद हैं तथा भारतीय रुपया, डॉलर के वर्चस्व से मुक्त हो पाएगा, यह कहना जल्दबाजी ही होगी।
प्रो. सी.एस. बरला
कृषि अर्थशास्त्री, विश्व बैंक और योजना आयोग से संबद्ध रह चुके हैं
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द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद से ही डॉलर विश्व की सबसे शक्तिशाली मुद्रा है, ऐसा माना जा सकता है। और विश्व के प्रमुख देशों के इसी डॉलर के दबाव से जल्द मुक्त होने के कयास लगाती खबरें हाल ही में अखबारों में प्रकाशित हुईं। आयात-निर्यात के आंकड़े हों, या विदेशी विनिमय भंडार, या सकल राष्ट्रीय उत्पाद की गणना, हर स्तर पर डॉलर का ही वर्चस्व दिखाई देता है। हर देश अपने निर्यात व्यापार में वृद्धि करके अधिक से अधिक डॉलर अर्जित करने का प्रयास करता है तथा यथासंभव डॉलर के कोष को बढ़ाने के लिए प्रयत्न करता है। इसी दृष्टि से ये प्रयास किए जा रहे हैं कि भारत सहित दुनिया की सभी उभरती हुई अर्थव्यवस्थाएं डॉलर के वर्चस्व से मुक्त हो जाएं। भारत के लिए वर्तमान में यह कहां तक संभव है, यह देखना जरूरी है।
सकल राष्ट्रीय आय: 2021 के आंकड़े देखें तो उस समय भारत का सकल राष्ट्रीय उत्पाद अमरीका की तुलना में मात्र 1 प्रतिशत ही था। तब अमरीका में प्रति व्यक्ति आय 68 हजार डॉलर थी तो भारत में यह 2500 डॉलर से भी कम। यह सही है कि 2021-22 में भारत की विकास दर 5.5 प्रतिशत रही थी जो विश्व में सर्वाधिक थी। इसके बावजूद भारत की प्रति व्यक्ति आय अमरीका के समकक्ष कितने दशकों में हो पाएगी, इस प्रश्न का उत्तर भारत के नीति-निर्माताओं को खोजना होगा। हाल के वर्षों में विकास दर की दृष्टि से भारत भले ही अमरीका सहित सभी विकसित देशों से आगे हो, सकल आय की दृष्टि से अभी लम्बे समय तक इन देशों से पीछे रहने वाला है।
विदेशी विनिमय भंडार: दिसम्बर 2022 में यूएस के पास विदेशी विनिमय भंडार की राशि 42,602 मिलियन डॉलर थी। चीन के लिए यह राशि विश्व में सर्वाधिक 11 अरब डॉलर थी, जबकि भारत में 572 करोड़ डॉलर की ही थी। दिलचस्प बात यह है कि यूएस का चालू खाता बैलेंस ऋणात्मक होने पर भी गत वर्षों में वहां शुद्ध निवेश बढऩे के कारण विदेशी विनिमय कोष में वृद्धि हो रही है। इसी प्रकार चीन, जापान, दक्षिण कोरिया, स्विट्जरलैंड व जापान आदि देशों के विदेशी विनिमय भंडार बढ़ रहे है जबकि भारत में यह नाम मात्र को बढ़ा है।
स्वर्ण भंडार: किसी देश के केंद्रीय बैंक के पास विद्यमान स्वर्ण भंडार भी उस देश की मुद्रा की ताकत बतलाती है। नवंबर 2022 में भारत के पास विद्यमान स्वर्ण भंडार का कुल मूल्य 40 हजार डॉलर से कम था। जहां वैश्विक कोषों की दृष्टि से इसमें भारत ९वें स्थान पर था, चीन के पास 2020 में 1,04,718 मिलियन डॉलर के स्वर्ण भंडार थे जबकि भारत के पास 537 मिलियन डॉलर मूल्य के ही स्वर्ण भंडार थे। चीन के पास इस वर्ष 2000 टन का स्वर्ण भंडार था। यूएस के पास 8100 टन का स्वर्ण भंडार माना गया था, जो विश्व में सर्वाधिक था। इसी प्रकार जापान, चीन, जर्मनी, फ्रांस, इटली, कोरिया, अरब देशों, और अन्य लगभग 80 देशों के पास विद्यमान स्वर्ण भंडार भारत की तुलना में काफी अधिक है।
कुल मिलाकर विकास की दर धीमी भले ही हुई हो, पर अमरीका का वर्चस्व आज भी बना हुआ है। यह सही है कि यूएस पर वैश्विक ऋण भार काफी अधिक है, पर विभिन्न कारणों से आज भी डॉलर को सुदृढ़ बनाने वाले घटक मौजूद हैं तथा भारतीय रुपया, डॉलर के वर्चस्व से मुक्त हो पाएगा, यह कहना जल्दबाजी ही होगी।
फिर भी, उत्पादन की लागत में 20 से 30 प्रतिशत कमी लाकर और निर्यातों को 35 से 40 प्रतिशत बढ़ाकर, उत्पादों की गुणवत्ता में सुधार करके, नवाचारों को प्रोत्साहन देकर संसाधनों के मूल्य संवद्र्धन में सुधार करके और नवाचारों के माध्यम से अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप डिजाइन विकास करके भारतीय रुपया अगले एक दशक में डॉलर के वर्चस्व से काफी हद तक मुक्त हो सकता है। इन उपायों के साथ देश में उपयुक्त माहौल बनाकर पारिवारिक, संस्थागत एवं राजकीय क्षेत्रों में बचत में वृद्धि करके, दीर्घकालीन परियोजनाएं बनाकर समेकित रूप में आर्थिक विकास के लक्ष्यों को प्राप्त करके, ढांचागत विकास के माध्यम से कृषि, उद्योगों तथा सभी क्षेत्रों का विकास करके तथा विकास की गति बढ़ाने हेतु द्रुतगामी विकास परियोजनाओं का निरूपण भी ऐसे प्रभावी उपाय हैं, जिन्हें अपना कर देश में एक सबल एवं सुदृढ़ विकास की रणनीति बन पाएगी, जिसके माध्यम से भारतीय अर्थव्यवस्था डॉलर से मुक्ति की ओर अग्रसर हो सकेगी।