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स्वास्थ्य ही नहीं, स्वाद और सुविधा का विकल्प भी बन रहा ‘श्री अन्न’

भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद और मिलेट रिसर्च संस्थानों द्वारा विकसित रेडी-टू-ईट उपमा, हलवा और स्नैक्स जैसे उत्पाद यह सिद्ध करते हैं कि श्री अन्न परंपरा और आधुनिकता के बीच संतुलन बना सकता है। इस बदलाव में स्टार्टअप्स और महिला स्वयं सहायता समूहों की भूमिका भी अहम रही है।

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जयपुर

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Opinion Desk

Jan 02, 2026

-बलवंत राज मेहता, वरिष्ठ पत्रकार एवं स्तंभकार

श्री अन्न यानी मोटे अनाज को लेकर देश में बीते कुछ वर्षों में जो जागरूकता बढ़ी है, वह केवल एक सरकारी पहल तक सीमित नहीं रही, बल्कि धीरे-धीरे एक सामाजिक, आर्थिक और पोषण आंदोलन का रूप ले चुकी है। कभी गरीबों का अनाज कहे जाने वाले बाजरा, ज्वार और रागी आज स्वास्थ्य, पर्यावरण और टिकाऊ खेती के प्रतीक बनते जा रहे हैं। वर्ष 2023 को संयुक्त राष्ट्र द्वारा अंतरराष्ट्रीय श्री अन्न वर्ष घोषित किए जाने के बाद भारत इस वैश्विक अभियान का नेतृत्वकर्ता बनकर सामने आया है, जिसने देश के भीतर और बाहर दोनों स्तरों पर इस विषय को नई पहचान दी। तथ्यों पर नजर डालें तो भारत आज दुनिया का सबसे बड़ा मिलेट उत्पादक देश है और वैश्विक उत्पादन का लगभग 38 प्रतिशत हिस्सा भारत से आता है।

यह आंकड़ा केवल उत्पादन क्षमता नहीं दर्शाता, बल्कि भारत की पारंपरिक कृषि समझ और विविधता की भी कहानी कहता है। देश के भीतर राज्यों की बात करें तो राजस्थान इस दौड़ में सबसे आगे है। कुल मिलेट उत्पादन में लगभग 28 प्रतिशत हिस्सेदारी के साथ राजस्थान शीर्ष पर है, जबकि महाराष्ट्र और कर्नाटक जैसे राज्य भी प्रमुख योगदानकर्ता हैं। यह उल्लेखनीय है क्योंकि ये वही क्षेत्र हैं जहां पानी की कमी, सूखा और जलवायु परिवर्तन लंबे समय से खेती के लिए चुनौती बने रहे हैं। ऐसे में श्री अन्न ने कम पानी में टिकाऊ खेती का भरोसेमंद विकल्प प्रस्तुत किया है। जागरूकता का सबसे स्पष्ट असर शहरी भारत में देखने को मिलता है। बाजरा, ज्वार और रागी अब केवल ग्रामीण रसोई या पारंपरिक भोजन तक सीमित नहीं हैं। मल्टीग्रेन आटा, मिलेट कुकीज, रागी पास्ता, ज्वार फ्लेक्स और रेडी-टू-ईट उत्पाद आज सुपरमार्केट और ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर आसानी से उपलब्ध हैं। शहरी उपभोक्ता अब इन्हें केवल स्वास्थ्य कारणों से नहीं, बल्कि स्वाद और सुविधा के विकल्प के रूप में भी अपना रहे हैं।

भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद और मिलेट रिसर्च संस्थानों द्वारा विकसित रेडी-टू-ईट उपमा, हलवा और स्नैक्स जैसे उत्पाद यह सिद्ध करते हैं कि श्री अन्न परंपरा और आधुनिकता के बीच संतुलन बना सकता है। इस बदलाव में स्टार्टअप्स और महिला स्वयं सहायता समूहों की भूमिका भी अहम रही है। मिलेट आधारित बेकरी उत्पाद, स्नैक्स, इंस्टेंट मिक्स और पैकेज्ड फूड न केवल बाजार में नए विकल्प लेकर आए हैं, बल्कि ग्रामीण और अर्ध-शहरी क्षेत्रों में रोजगार के अवसर भी पैदा कर रहे हैं। इससे श्री अन्न केवल पोषण का विषय नहीं रह गया, बल्कि आजीविका और उद्यमिता से भी जुड़ गया है। वैश्विक परिप्रेक्ष्य में देखें तो श्री अन्न की संभावनाएं भारत की सीमाओं से कहीं आगे जाती हैं। अफ्रीका और एशिया के कई सूखे और अर्ध-शुष्क देशों के लिए मिलेट्स जलवायु-अनुकूल फसल के रूप में उभर रहे हैं। कम पानी की आवश्यकता, कम रासायनिक इनपुट और अधिक पोषण ये तीनों गुण इसे भविष्य की खाद्य सुरक्षा से जोड़ते हैं। भारत द्वारा अंतरराष्ट्रीय मंचों पर श्री अन्न को स्मार्ट फूड के रूप में प्रस्तुत करने से निर्यात, शोध और वैश्विक सहयोग की नई राहें खुली हैं। यह भारत की सॉफ्ट पावर और कृषि कूटनीति को भी मजबूती देता है। हालांकि, इस सफलता की तस्वीर पूरी तरह उजली नहीं है। किसान स्तर पर अब भी सबसे बड़ी चुनौती बाजार और भरोसे की बनी हुई है। कई क्षेत्रों में न्यूनतम समर्थन मूल्य की प्रभावी खरीद व्यवस्था नहीं है। स्थानीय प्रसंस्करण इकाइयों की कमी के कारण किसान कच्चा माल बेचने तक ही सीमित रह जाते हैं और मूल्यवर्धन का लाभ उन्हें नहीं मिल पाता। सुधार की संभावनाएं स्पष्ट हैं और व्यावहारिक भी। हर प्रमुख उत्पादन क्षेत्र में छोटे और मध्यम स्तर के मिलेट प्रोसेसिंग प्लांट स्थापित किए जा सकते हैं।

स्कूलों के मध्यान्ह भोजन, आंगनवाड़ी और सार्वजनिक वितरण प्रणाली में श्री अन्न का नियमित उपयोग इसके उपभोग को जन-आदत बना सकता है। सबसे जरूरी यह है कि श्री अन्न को फैशन फूड के रूप में नहीं, बल्कि भविष्य के भोजन के रूप में प्रस्तुत किया जाए। श्री अन्न को लेकर देश में जागरूकता एक मजबूत आधार पर खड़ी हो चुकी है और राजस्थान जैसे राज्यों ने इसे ठोस उत्पादन का सहारा भी दिया है। अब अगली चुनौती इस जागरूकता को स्थायी अवसर में बदलने की है, ताकि यह केवल थाली तक सीमित न रहे, बल्कि किसान की आय बढ़ाए, उद्योग में नवाचार को प्रोत्साहित करे और भारत को वैश्विक खाद्य नेतृत्व की भूमिका में और सशक्त बनाए। यही श्री अन्न अभियान की वास्तविक व निर्णायक कसौटी होगी।