
नियति के नियमों की पालना करने से होगा सुधार
नववर्ष हमें यह सोचने का अवसर देता है कि समृद्धि केवल भौतिक या बौद्धिक संपदा से ही नहीं, बल्कि भोजन में संयम और ज्ञान में करुणा का संतुलन रखने से आएगी। आज हमारे पास स्वाद से भरी थालियां उपलब्ध हैं, लेकिन जाने-अनजाने में हम रोग भी बढ़ा रहे हैं। तकनीक और शिक्षा ने हमें ज्ञान के नए आयाम दिए हैं, लेकिन इस ज्ञान वृद्धि के साथ-साथ असहिष्णुता और हिंसा की प्रवृत्ति भी बढऩे लगी है। विचारों का आदान-प्रदान संवाद में बदलने के बजाय संघर्ष में बदलता जा रहा है। श्रद्धेय कुलिश जी ने करीब 36 बरस पहले ये सवाल उठाते हुए जो लिखा वह आज भी प्रासंगिक है।
आप देखेंगे कि आज संसार में जितनी भोग्य सामग्री है, उतनी कभी नहीं थी और जितना ज्ञान आज है, वह ज्ञान भी इस विस्तार के रूप में कभी नहीं था। लेकिन दूसरी ओर इसकी परिणति आप क्या देख रहे हैं, इसका कोई यथार्थ है कि जितने रोग आज है उतने रोग भी पहले कभी नहीं थे। जितनी भोग्य सामग्री है, जितने पदार्थ हैं, जितने प्रचुर मात्रा में उपलब्ध हैं, उन पदार्थों के होते हुए भी उतने ही रोग बढ़ते जा रहे हैं। उतने रोग और मर्मांतक रोग मानव सभ्यता के इतिहास में पहले कभी नहीं रहे। यह क्या बात है? (अलबत्ता अस्थायी रूप से महामारियां हुईं हैं और आज भी हैं) इतना बड़ा विरोधाभास क्यों? जितना ज्ञान आज हमको प्रतीत होता है, हमको उपलब्ध है, उतनी ही हिंसा आज हो रही है। द्वितीय महायुद्ध में जितनी हत्याएं या जितनी मौतें हुई, जितने लोग मारे गए उसके दुगने लोग केवल अब तक मोटर दुर्घटना में मर चुके हैं। यह ऐसी दुर्घटना है जिसे हिंसा का रूप तो आप नहीं कह सकते लेकिन यह अज्ञात या परोक्ष हिंसा ही है। अब दूसरे प्रकार की मृत्यु या हिंसा जो हो सकती है उसके परिमाण का आप अनुमान लगाइए कितना होगा। विमान दुर्घटनाएं, घातक रोगों से होने वाली मौतें, आत्महत्याएं, आपराधिक हत्याएं - कोई अंत ही नहीं है और सामरिक हत्याएं! यह क्या है- मानव समाज का जो रूप अभी बन गया है उसमें भोग्य सामग्री भी अधिक है तो रोग भी अधिक है। ज्ञान मात्रा अधिक है तो हिंसा भी अधिक है। ऐसे में जिस किसी काम को या उद्देश्य को लेकर मानव का ज्ञान, विज्ञान, शासन, धर्म व वर्ण व्यवस्था चलती है, चिंतनधारा चलती है वह लक्ष्य तो बहुत ही दूर होता जा रहा है। बजाय इसके कि मानव प्रगति करके उस लक्ष्य के निकट पहुंचे, बल्कि दूर होता जा रहा है। लक्ष्य क्या है? जिसके लिए संयुक्त राष्ट्र की स्थापना हुई। शांति, सद्भाव, सहृदयता, सदाशयता, सहिष्णुता और मुख्यत: शांति। शांति के संपूर्ण प्रयत्नों के सामने अशांति बढ़ते जाना, यह क्या कारण है? हम किस अवस्था में पहुंचते जा रहे हैं?
मनचाही अंधी दौड़ का नतीजा
यदि गूढ़ दृष्टि से आप देखें तो हमें लगेगा कि हम ईश्वर के नियमों के विरुद्ध होते जा रहे हैं। दूर होते जा रहे हैं। जो लोग ईश्वर नाम की भाषा में नहीं मानना चाहते उन्हें यह मानिए, यह मान लेना चाहिए कि नियति के नियमों के विरुद्ध हम जा रहे हैं। कहीं न कहीं हम नियति के नियमों का उल्लंघन कर रहे हैं। और नियति इतनी बड़ी शक्ति है, वह ईश्वर इतना बड़ा शक्तिमान तत्व है कि फिर भी इसकी उपेक्षा करके हम मनचाही अंधी दौड़ में चले जा रहे हैं। यही कारण है, यही निष्कर्ष है कि हम अपने लक्ष्य के प्रति पहुंचने की जितनी तैयारी दिखा रहे हैं, जितनी प्रगति हम करना चाहते हैं, उसके परिणाम ठीक विपरीत मिलते जा रहे हैं। इसका एकमात्र कारण यह जो हमारा जीवन के प्रति दृष्टिकोण है वह बदल गया। हमारे जीवन में संतुलन नहीं है। संतुलन का स्वरूप तभी हो सकता है जब जीवन के प्रति कोई हमें वैज्ञानिक दृष्टिकोण प्रदान करे।
सब पाकर भी क्षुब्ध रहने वाला गरीब
हम कई बार कहते हैं और सुनते हैं, और सुनते- सुनते इसके आदी हो चुके हैं कि हम बड़े गरीब हैं। हमारा देश बड़ा गरीब है। मैं आपको पूरे जोर के साथ यह कह देना चाहता हूं कि मैं गरीबी का हिमायती नहीं हूं, मैं दरिद्रता का उपासक नहीं हूं। न मैं दरिद्रनारायण जैसे दर्शन में विश्वास रखता हूं। दरिद्रता जितनी जल्दी दूर जाए उतनी ही अच्छी। लेकिन चिंतन करें तो पता लगेगा कि गरीब कौन है? जो सब-कुछ पाकर भी क्षुब्ध रहता है। नींद लेने के लिए उसको गोलियां खानी पड़ती है वह गरीब अधिक है।
माँच रही छै होड़
गोल्याँ खायाँ जा रह्या।
माँच रही छै होड़।।
काँई लेबा जा रह्या।
नींद भूख न छौड़।।
Published on:
02 Jan 2026 12:45 pm
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