- राजनेताओं का स्थान पूर्व नौकरशाह लेते जा रहे हैं, जो अधिकांशत: अपने सरपरस्तों का एजेंडा पूरा करते हैं।
भारतीय राजनीति में राज्यपाल का पद पिछले कुछ वर्षों से काफी विवाद में है। आजादी के तुरंत बाद के तीन दशक में गिने-चुने राज्यपाल ही थे, जिन्होंने ऐसे संवैधानिक पद पर रह कर राजनीति की हो। लेकिन पिछले तीन दशक का अनुभव बताता है कि जैसे अब राज्यपाल, राजनीति के सिवाय कुछ करते ही नहीं। राज्य में, केन्द्र में सत्तारूढ़ दल से इतर पार्टी की सरकार है तो इनका एकमात्र लक्ष्य उसे अस्थिर करना लगता है। एक ही पार्टी की सरकार हो तो भी अपनी या केन्द्र की पसंद-नापसंद को लागू करवाना प्राथमिकता नजर आती है।
एक फर्क यह भी दिखता है कि पहले राज्यपाल पद पर नियुक्ति घुटे-घुटाए राजनेता की होती थी। अब ऐसों की संख्या काफी कम रह गई । राजनेताओं का स्थान पूर्व नौकरशाह लेते जा रहे हैं, जो अधिकांशत: अपने सरपरस्तों का एजेंडा पूरा करते हैं। पिछले वर्षों का शायद ही कोई उदाहरण हो, जहां राज्यपाल ने उस प्रदेश या देश की जनता के व्यापक हित में मजबूत आवाज उठाई हो। ताजा उदाहरण कोविड-19 का है।
इस वैश्विक महामारी ने सभी राज्यों की अर्थव्यवस्था को बेहाल कर दिया, लेकिन शायद ही किसी राज्यपाल ने आवाज उठाई हो। कई राज्यों में चुनी हुई सरकारों को अस्थिर करने की कोशिश हुई तो राज्यपाल कहां बोले? विधायकों के आचरण पर ही बोल देते। इस दृष्टि से मेघालय के राज्यपाल सतपाल मलिक अलग मिट्टी के नजर आते हैं। वे चुप कम ही रहते हैं। जहां जिस मुद्दे पर बोलना चाहिए, खुलकर बोलते हैं। लेकिन यह भी सच है कि उन्हें इसका खमियाजा उठाना पड़ता है। ऐसा उदाहरण विरला ही होगा, जहां साढ़े तीन साल में कोई चार राज्यों का राज्यपाल रह चुका हो और, हर तबादला बोलने पर हुआ हो। वे जहां जो बोले, सच बोले। गोवा में तो भाजपा सरकार के काम-काज तक पर बोले।
उनका ताजा बयान किसान आन्दोलन पर है। विस्तार में जाने की बजाय इतना ही बताना काफी होगा कि उन्होंने न केवल किसानों का खुलकर पक्ष लिया, बल्कि केन्द्र सरकार को उसके समाधान का ठोस उपाय बताते हुए देरी या उसके दमन पर गंभीर नतीजों को लेकर आगाह तक किया। पांच दशक से राजनीति में सक्रिय और प्रमुख पांच राजनीतिक दलों की यात्रा कर चुके मलिक की सलाह सरकार के साथ आम अवाम तक पहुंच चुकी है। सरकार इसे मानने या न मानने को स्वतंत्र है, लेकिन यह केवल राज्यपालों को ही नहीं, बल्कि देश के राजनीतिक, प्रशासनिक तंत्र और मीडिया के लिए भी संदेश है कि वे बोलना सीखें। जैसी भी हो अपनी राय सबके सामने रखें, ताकि नीति निर्माताओं को विकल्पतो दिखे। निश्चय ही ऐसा करना देश, सरकार और लोकतन्त्र के हित में ही होगा।