लाइन प्रोड्यूसर हॉलीवुड जैसी जगहों में सितारा हैसियत तक पाते हैं। हमारे यहां अमूमन उनकी चर्चा मीडिया के गलियारों तक भी बमुश्किल ही पहुंचती है।
सुशील गोस्वामी, सदस्य, सीबीएफसी
क्रिस्टोफर नोलन की 'द डार्क नाइट राइजेज' में जोधपुर के मेहरानगढ़ को देख कर आप चमत्कृत रह जाएंगे। जेम्स बांड शृंखला की 'ओक्टोपसी' में उदयपुर स्थिति लेक पैलेस व जग मंदिर के नयनाभिराम दृश्य आपको भौचक्का कर देंगे। 'मणिकर्णिका' में जयपुर, बीकानेर, जोधपुर के किलों का स्थापत्य व अलसीसर-मलसीसर की धरती का अप्रतिम सौंदर्य रानी झांसी के कालखंड को उभारते हुए फिल्म को मुकम्मल बना देता है।
समूचे विश्व के दिग्गज फिल्मकार अपने ख्वाबों में भारत-भूमि के इस सपनीले रंगों से सिक्त, राजसी वैभव वाले अलहदा प्रांत राजस्थान की छटाओं का सच भर लेने को आतुर रहते हैं। पर, कौन इस बात की तह तक जाता है कि आखिर दिग्गज निर्देशक क्रिस्टोफर नोलन, सुदूर जोधपुर के मेहरानगढ़ के पिछवाड़े स्थित कुएं को भीतर से फिल्माने अपने दल-बल सहित पहुंचते कैसे हैं?
दरअसल, लाइन प्रोड्यूसर फिल्म निर्माण सेना का वह महत्त्वपूर्ण सैनिक है, जो नोलन को उस कुएं का पता देता है। राजस्थान की खुशबू अगर रजत-पट के जरिए दुनिया के नथुनों तक पहुंची है, तो इसके लिए आज हम न्यूनतम चर्चित, किंतु अति महत्त्व के काम को अंजाम देने वाले इस कर्मठ को सलाम भेज देते हैं। फिल्मों के अधिकतर रसिया शायद न जानते हों कि सिनेमा के पर्दे पर उतरीं दृश्यावलियां सिनेमेटोग्राफर और निर्देशक की सोच से भी पहले एक लाइन प्रोड्यूसर के उस फोटो-खजाने का हिस्सा बन चुकी होती हैं, जो उसकी अनथक रेकी की बदौलत खनखनाता है। हालांकि, यह लाइन प्रोड्यूसर के काम का महज एक हिस्सा-भर है। शूटिंग के लिए भारी-भरकम तैयारियों के ज्यादातर हिस्से को संभालने का काम उसके ही जिम्मे होता है। शूटिंग से पहले की कानूनी खानापूर्ति, क्रू मेम्बर व शूटिंग के भारी-भरकम साज-सामान का परिवहन, होटल व खाने-पीने के इंतजाम व लोकल कास्टिंग इत्यादि अनेक कामों को लाइन प्रोड्यूसर ही पूरा करते हैं।
एक कथा के फिल्म का जामा पहने जाने तक की दुरूह प्रक्रिया के भागीदार अनेक होते हैं, जो निर्देशक की कप्तानी में अपने-अपने खेल खेलते हैं। किसी का भी योगदान कम नहीं आंका जा सकता, किंतु कहानी में जगह लाइन प्रोड्यूसर की सुझाई होती है, जो उसके उठाव के लिए सबसे महत्त्वपूर्ण साबित होती है। यहीं उसका रोल जरा ऊंचा हो जाता है। आखिर जमाना आउट्डोर शूट्स का है।
लाइन प्रोड्यूसर हॉलीवुड जैसी जगहों में सितारा हैसियत तक पाते हैं। हमारे यहां अमूमन उनकी चर्चा मीडिया के गलियारों तक भी बमुश्किल ही पहुंचती है। हर प्रांत में लाइन प्रोड्यूसर अप्रत्यक्ष सांस्कृतिक राजदूत का किरदार खामोशी से निभा रहे हैं। वे देश का नाम रोशन करने में भागीदार हैं।