
MaternalCare
श्री गोपाल काबरा
हाल के महीनों में, राजस्थान के छोटे और दूर-दराज के अस्पतालों में इमरजेंसी सिजेरियन डिलीवरी के बाद माताओं की मौत के मामलों में चिंताजनक बढ़ोतरी देखी गई है। ये दुखद घटनाएं सिर्फ आंकड़े नहीं हैं, ये उन युवा माताओं की कहानी हैं, जिन्होंने नई जिंदगी को दुनिया में लाते हुए अपनी जान गंवा दी। उनकी मौतें गर्भावस्था के दौरान देखभाल में गंभीर कमियों को उजागर करती हैं और उन तौर-तरीकों पर जरूरी सवाल उठाती हैं, जिन पर अक्सर ध्यान नहीं दिया जाता।
जिन महिलाओं की मौत हुई, उनमें से ज़्यादातर पहले से ही हाई-रिस्क स्थितियों का सामना कर रही थीं, जैसे, गर्भावस्था में टॉक्सेमिया (गर्भावस्था के दौरान खतरनाक रूप से हाई ब्लड प्रेशर)। एचईएलएलपी सिंड्रोम (एक गंभीर समस्या, जिसमें लिवर और खून के थक्के जमने से जुड़ी दिक्कतें होती हैं)। गंभीर एनीमिया (हीमोग्लोबिन का बहुत कम स्तर, जिससे शरीर कमजोर और बीमारियों के प्रति संवेदनशील हो जाता है।)
हालांकि, सिजेरियन ऑपरेशन के दौरान सर्जिकल जटिलताएं मौत का तात्कालिक कारण थीं, लेकिन डॉक्टरों का मानना है कि असली समस्या पहले की स्थिति में है, यानी गर्भावस्था के दौरान इन महिलाओं की देखभाल कैसे की गई।
बिना रेकॉर्ड किए गए आयुर्वेदिक नुस्खों की भूमिका
एक बात, जिसने ध्यान खींचा है, वह है गर्भावस्था के दौरान आयुर्वेदिक दवाओं का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल। ये नुस्खे अक्सर बिना डॉक्टरी देखरेख के लिए जाते हैं और फ्रंटलाइन हेल्थ वर्कर, जैसे आशा वर्कर, ऑक्सिलरी नर्स मिडवाइफ या पारंपरिक दाइयों द्वारा शायद ही इनका रिकॉर्ड रखा जाता है। परिवार इन्हें ‘प्राकृतिक’ और सुरक्षित मान सकते हैं, लेकिन असल में इनमें छिपे हुए जोखिम हो सकते हैं।
कुछ संभावित खतरों में शामिल हैं-
हर्बल यूटेरोटोनिक प्रभाव: कुछ जड़ी-बूटियां गर्भाशय को उत्तेजित कर सकती हैं, जिससे डिलीवरी के दौरान समय से पहले संकुचन या जटिलताएं हो सकती हैं।
हार्मोनल असंतुलन- हर्बल मिश्रण शरीर के उस नाजुक हार्मोनल संतुलन में बाधा डाल सकते हैं, जो स्वस्थ गर्भावस्था के लिए जरूरी है।
हेवी मेटल टॉक्सिसिटी- अध्ययनों से पता चला है कि कुछ आयुर्वेदिक दवाओं में लेड, मरकरी या आर्सेनिक का हानिकारक स्तर होता है, जो माँ और बच्चे दोनों को नुकसान पहुंचा सकता है।
जब ये पहले से मौजूद हाई-रिस्क स्थितियों के साथ जुड़ जाते हैं, तो ये छिपे हुए कारक मां के लिए जोखिम बढ़ा सकते हैं और खराब नतीजों का कारण बन सकते हैं।
यह क्यों जरूरी है?
गर्भावस्था का समय ऐसा होता है, जब महिलाएं और परिवार अक्सर पारंपरिक ज्ञान पर भरोसा करते हैं। लेकिन जब नुस्खे बिना रिकॉर्ड किए और बिना जांचे-परखे इस्तेमाल किए जाते हैं, तो वे गर्भावस्था के दौरान देखभाल में ‘ब्लाइंड स्पॉट’ (अनदेखी कमियां) पैदा करते हैं। डॉक्टरों को यह पता नहीं चल पाता कि मां ने क्या-क्या चीजें ली हैं, जिससे जटिलताओं का पता लगाना या जोखिमों का अनुमान लगाना मुश्किल हो जाता है। इमरजेंसी की स्थिति में जानकारी की यह कमी जानलेवा साबित हो सकती है।
व्यवस्थित जांच की जरूरत
राजस्थान के विशेषज्ञ अब माताओं की मौत में आयुर्वेदिक इलाज की भूमिका को समझने के लिए एक व्यवस्थित जांच का तरीका सुझा रहे हैं। इस तरीके में ये चीजें शामिल होंगी-
क्लिनिकल ऑडिट- माताओं की मौत के पैटर्न को समझने के लिए अस्पताल के रिकॉर्ड और केस हिस्ट्री की समीक्षा करना।
टॉक्सिकोलॉजिकल एनालिसिस- आम तौर पर इस्तेमाल होने वाली आयुर्वेदिक दवाओं में हानिकारक पदार्थों और उनके असर की जांच करना।
कम्युनिटी-लेवल सर्वे- परिवारों, आशा वर्करों और पारंपरिक दाइयों से बात करके यह पता लगाना कि कौन-से इलाज इस्तेमाल किए जा रहे हैं और क्यों।
अस्पताल, लैब और कम्युनिटी से मिली जानकारी को मिलाकर राजस्थान की हेल्थ टीमें यह बेहतर ढंग से समझ सकती हैं कि ये इलाज माताओं की सेहत पर कैसा असर डालते हैं।
क्या किया जा सकता है?
मकसद आयुर्वेद को खारिज करना नहीं है, जिसकी सांस्कृतिक जड़ें गहरी हैं, बल्कि सुरक्षा सुनिश्चित करना है। कुछ कदम, जो फर्क ला सकते हैं, उनमें शामिल हैं-
बेहतर एंटीनेटल निगरानी- हेल्थ वर्करों को यह पूछना और रेकॉर्ड करना चाहिए कि गर्भवती महिलाएं कौन-से इलाज अपना रही हैं।
जन-जागरूकता अभियान- परिवारों को गर्भावस्था के दौरान बिना जांचे-परखे हर्बल दवाओं के खतरों के बारे में जानकारी दी जानी चाहिए।
मजबूत अस्पताल प्रोटोकॉल- डॉक्टरों को गर्भावस्था की जटिलताओं का इलाज करते समय हर्बल दवाओं से होने वाले जहरीले असर (टॉक्सिसिटी) पर विचार करने के लिए प्रशिक्षित किया जाना चाहिए।
पॉलिसी-लेवल पर कार्रवाई- सरकार गर्भवती महिलाओं के लिए बेची जाने वाली आयुर्वेदिक दवाओं को रेगुलेट कर सकती है और उनकी गुणवत्ता तथा सुरक्षा की नियमित जांच सुनिश्चित कर सकती है।
भरोसे और सुरक्षा का मामला
मां की हर मौत एक दुखद घटना होती है, जो परिवारों और समुदायों को झकझोर देती है। राजस्थान में, जहां पारंपरिक तरीकों पर गहरा भरोसा है, चुनौती सांस्कृतिक मान्यताओं और मेडिकल सुरक्षा के बीच संतुलन बनाने की है। आयुर्वेदिक इलाज की छिपी हुई भूमिका की जांच करके राज्य उन जोखिमों की पहचान कर सकता है, जिन्हें रोका जा सकता है और माताओं को अनावश्यक नुकसान से बचाया जा सकता है।
गर्भावस्था उम्मीद का समय, डर का नहीं
गर्भावस्था उम्मीद का समय होना चाहिए, डर का नहीं। फिर भी, राजस्थान में हाल ही में हुई माताओं की मौतें हमें याद दिलाती हैं कि छिपे हुए खतरे जैसे बिना रिकॉर्ड किए गए हर्बल इलाज, इस सफर को दुखद घटना में बदल सकते हैं। ऑडिट, टॉक्सिकोलॉजी और कम्युनिटी सर्वे को मिलाकर की जाने वाली व्यवस्थित जांच आगे का रास्ता दिखाती है। बेहतर एंटीनेटल देखभाल और जागरूकता के साथ राजस्थान यह सुनिश्चित कर सकता है कि माताएं बच्चे के जन्म के बाद सुरक्षित रहें और परिवार नई जिंदगी का स्वागत खुशी के साथ करें, न कि दुख के साथ।
Updated on:
24 Jul 2026 06:56 pm
Published on:
24 Jul 2026 06:19 pm
