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मेंटल हेल्थ: लाइक्स और फॉलोअर्स महत्त्वपूर्ण नहीं, कीमत होती है जिंदगी की

—डॉ.नीलू तिवारी (स्वतंत्र लेखिका एवं स्तंभकार )

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जयपुर

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VIKAS MATHUR

May 07, 2025

हाल में सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर मीशा अग्रवाल ने अपने घटते फॉलोअर्स के चलते आत्महत्या कर ली। इस घटना ने सोशल मीडिया यानी कि आभासी दुनिया की कड़वी सच्चाई को एक बार फिर से उजागर कर दिया है। इसके साथ ही मानसिक पहलुओं पर भी दुनियाभर में चर्चा छेड़ दी है। महज 23 साल की मीशा के फॉलोअर्स की संख्या में गिरावट आई, तो उसने खुद को बेकार समझना शुरू कर दिया।

इसके बाद मीशा गहरे अवसाद में चली गई। उसकी आत्महत्या ने यह दिखाया कि कैसे ऑनलाइन मान्यता की खोज एक व्यक्ति के मानसिक स्वास्थ्य पर गहरा प्रभाव डाल सकती है। असल में आज सोशल मीडिया केवल एक संवाद का माध्यम नहीं रह गया है, बल्कि यह एक नया समाज बन गया है। ऐसा समाज, जहां रिश्ते, सोच और पहचान अब स्क्रीन पर तय होते हैं। सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर्स अब केवल कंटेंट निर्माता नहीं, बल्कि युवा पीढ़ी के विचार, व्यवहार और दृष्टिकोण को दिशा देने वाले नए सामाजिक मार्गदर्शक बन चुके हैं। भारत में साल 2024 तक 50 करोड़ से अधिक सोशल मीडिया यूजर्स थे, जिनमें से लगभग 65 प्रतिशत युवा (18-35 वर्ष) हैं। एक सर्वे के अनुसार, 75 प्रतिशत युवा इन्फ्लुएंसर्स से प्रेरित होकर खरीदारी का निर्णय लेते हैं।

मानसिक स्वास्थ्य पर हुए शोध के अनुसार, जो युवा दिन में तीन घंटे से अधिक सोशल मीडिया का इस्तेमाल करते हैं, उनमें चिंता और अवसाद की आशंका 21 प्रतिशत अधिक होती है। अधिकांश इन्फ्लुएंसर अपनी जिंदगी का सिर्फ फिल्टर किया हुआ चमकदार हिस्सा दिखाते हैं। इससे युवा यह मानने लगते हैं कि सफलता का मतलब महंगी गाडिय़ां, लग्जरी जीवन और आकर्षक चेहरा है, जबकि यह यथार्थ से बहुत दूर होता है। युवाओं की आत्मा अब लाइक्स, फॉलोअर्स और कमेंट्स से जुडऩे लगी है। अगर कोई पोस्ट वायरल नहीं हुई, तो वे खुद को विफल समझने लगते हैं। यह डिप्रेशन लो सेल्फ-एस्टीम और सोशल एंजायटी को जन्म देता है। इन्फ्लुएंसर बनने की दौड़ में युवा सामाजिक संबंधों, परिवार, पढ़ाई और जीवन के असल पक्षों से कटते जा रहे हैं। कुछ युवा 14-15 साल की उम्र में स्कूल छोड़कर फुल-टाइम क्रिएटर्स बनने की कोशिश में समय और शिक्षा दोनों गंवा देते हैं।

मीशा से पहले भी भारत में ऐसी कई घटनाएं हुई हैं। साल 2020 में एक 18 वर्ष की टिकटॉक यूजर ने आत्महत्या कर ली, क्योंकि उसके फॉलोअर्स अचानक घट गए थे और वीडियो पर ट्रोलिंग हुई थी। वहीं यूके की एक इन्फ्लुएंसर ओलिविया जेड ने भी इसी तरह के मामले में आत्महत्या कर ली। उसके परिवार का कहना था कि वह हमेशा सोशल मीडिया पर खुद को साबित करने के दबाव में रहती थी। वहीं दक्षिण कोरिया के पॉप कलाकार और सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर की आत्महत्या भी ट्रोलिंग और सोशल दबाव से जुड़ी मानी जाती हैं। असल में बाहर से हंसते-हंसते पोस्ट डालने वाले अधिकतर इन्फ्लुएंसर अंदर से टूटे हुए होते हैं। वे हर दिन परफेक्ट दिखने के दबाव में जीते हैं, लेकिन किसी से कुछ कह नहीं पाते। ली मैकमिलन, जो कि एक ट्रेवल इन्फ्लुएंसर थीं। उन्होंने दुनिया घूमी, हजारों फॉलोअर्स थे पर अवसाद ने उनकी जिंदगी लील ली। आत्महत्या के बाद उनके परिवार ने मानसिक स्वास्थ्य जागरूकता की मुहिम शुरू की।

एक प्रसिद्ध फिटनेस इन्फ्लुएंसर ने स्वीकार किया कि वह कैमरे के सामने ऊर्जा से भरी दिखती थी पर कैमरे के पीछे रातों को रोती थीं। वह नींद की बीमारी से जूझ रही थीं। असल में यह दुनिया उतनी आसान और ग्लैमरस नहीं है, जितनी स्क्रीन पर नजर आती है। इन्फ्लुएंसर्स में प्रमुख मानसिक समस्याएं जैसे कि डिजिटल थकावट, पहचान का संकट, फॉलोअर्स गिरना यानी आत्मविश्वास कम होना, ऑनलाइन ट्रोलिंग और आलोचना देखने को मिलती है। मीशा की कहानी हमें यह सिखाती है कि सोशल मीडिया की दुनिया में सफलता की चमक के पीछे गहरे मानसिक संघर्ष हो सकते हैं। यह आवश्यक है कि हम अपने आसपास के लोगों के मानसिक स्वास्थ्य पर ध्यान दें और उन्हें यह समझाएं कि ऑनलाइन मान्यता ही जीवन का मापदंड नहीं है। मीशा की आत्महत्या कोई निजी त्रासदी नहीं थी।

यह पूरी पीढ़ी की एक सामाजिक त्रासदी है। सरकार, सोशल मीडिया, कंपनियां समाज और खुद इन्फ्लुएंसर्स सभी को मिलकर एक सुरक्षित और मानसिक रूप से स्थिर डिजिटल दुनिया बनानी होगी। नए क्रिएटर्स को सिखाया जाए कि फॉलोअर्स, लाइक और व्यूज आने-जाने वाली चीजें हैं। उन्हें डिजिटल स्थिरता और भावनात्मक लचीलापन सिखाया जाए। डिजिटल युग में मानसिक स्वास्थ्य को उतनी ही अहमियत दें, जितनी लाइक्स और फॉलोअर्स को दी जाती है। हम संवेदनशील बनें, युवाओं को समझें और ऐसा डिजिटल माहौल बनाएं, जहां सफलता का मतलब संतुलन हो न कि केवल संख्या।