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जीवनसाथी की हत्या: रिश्तों की उलझन या सोच की विकृति?

— ऋतु सारस्वत (समाजशास्त्री एवं स्तंभकार)

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जयपुर

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VIKAS MATHUR

Jun 11, 2025

17 दिन बाद पकड़ी गई सोनम, प्रेमी के साथ मिलकर रची थी पति की हत्या की साजिश', 'प्रेमी राज के लिए सोनम ने कराई पति राजा की हत्या' देशभर के मीडिया में छाई यह खबर दुखद और पीड़ादायक परंतु सत्य है। इंदौर के राजा रघुवंशी का शव जब शिलांग के पास मिला तो यह अनुमान भी लगाए जा रहा था कि कहीं इस अनहोनी घटना के तार उसकी पत्नी से तो नहीं जुड़े हुए हैं! इन आशंकाओं का सच होना एक असामान्य प्रवृत्ति का सामान्य घटना के रूप में स्वीकार किया जाना है जो कि किसी भी स्वस्थ समाज का द्योतक नहीं है। 'असामान्यता' को 'सामान्यता' का आवरण पहनने वाली प्रवृत्ति के पीछे वह घटनाएं हैं जो बीते वर्षों में घटित हुई हैं।

इस साल की शुरुआत में मार्च में उत्तर प्रदेश के मेरठ में एक पत्नी ने पति की हत्या कर उसके शरीर के 15 टुकड़े करके एक ड्रम में डालकर सीमेंट से सील कर दिया। ऐसे मामलों की एक लंबी फेहरिस्त है जो हर उस मिथक को ध्वस्त करती है जहां पुरुषों को खलनायक के रूप में चित्रित किया जाता रहा है। पैट्रीशिया पियरसन अपनी पुस्तक 'व्हेन शी वाज बैड : वायलेंट वुमन इन द मिथ ऑफ इनोसेंस' में उन सामाजिक नीतियों की कमियों को संबोधित करती हैं जो सामाजिक विकृति और हिंसक व्यवहार को केवल पुरुषों के साथ पहचानती हैं।

पैट्रीशिया उस मिथक को कठघरे में खड़ा करती हैं जहां महिलाएं स्वभाव से ही पोषण करने वाली होती हैं और भयावह आपराधिक व्यवहार करने में काफी हद तक असमर्थ होती हैं। पैट्रीशिया बड़े ही सुदृढ़ता से यह उल्लेखित करती हैं कि महिलाएं आक्रामक और हिंसक हो सकती हैं इसलिए आक्रामकता और हिंसा को अति पुरुषोचित लक्षण मानना न केवल गलत है बल्कि सामाजिक न्याय व्यवस्था के लिए एक सबसे बड़ा व्यवधान है। 'विवाह संस्था दरक रही है' इस विषय को यकीनन संवेदनशील मानकर सामाजिक एवं मनोवैज्ञानिक विमर्शों में स्थान मिल रहा है क्योंकि यह सर्वविदित है कि अगर विवाह संस्था नहीं बचेगी तो शनै: शनै: समाज भी ढह जाएगा।

विवाहेत्तर संबंध भी सामाजिक विमर्श का विषय रहे हैं परंतु स्पष्ट रूप से इस विमर्श में पुरुषों के प्रति पूर्वाग्रह दृष्टिगोचर होता है और यह माना जाता रहा है कि पुरुष ही विवाहेत्तर संबंध स्थापित करते हैं और अगर पत्नी ने विवाहेत्तर संबंध स्थापित किए हैं तो इसमें पति की कुछ कमी रही होगी। हालांकि ऐसे अनेक मामले सामने आए हैं जहां पति के स्नेहपूर्ण व्यवहार के बावजूद भी पत्नियों ने वैवाहिक संबंधों से इतर संबंध स्थापित किए हैं। इन संबंधों को नैतिकता के तराजू पर ना तोलकर यह विचार करने का समय आ गया है कि क्यों विवाहेत्तर संबंधों में जीवनसाथी से मुक्ति के लिए किसी एक की हत्या ही निवारण का मार्ग नजर आ रहा है?

गौरतलब है कि यह हत्याएं क्षणिक आवेश में नहीं की जा रही हैं अपितु योजनाबद्ध तरीके से अंजाम दी गई हैं। एक महत्त्वपूर्ण प्रश्न यहां यह उत्पन्न होता है कि क्या यह महिलाएं इस तथ्य से परिचित नहीं कि ऐसे जघन्य अपराधों को अंजाम देने के बाद उनका बचे रहना लगभग नामुमकिन है। या फिर वह इस भ्रम में रहती हैं कि उनकी बनाई गई योजनाएं इतनी सुनियोजित और त्रुटिहीन होगी कि उन्हें पकडऩा संभव नहीं। वर्तमान समय में तकनीकी पारंगतता और आधुनिक कार्य प्रणाली से सुसज्जित पुलिस तंत्र में यह संभव नहीं कि ऐसी घटनाओं को छुपाया जा सके।

अपने शोध 'डिसीजन साइंस, रिस्क परसेप्शन, एंड इनफिडेलिटी' में निकोल मैरी जैपियन 'डिसीजन साइंस मॉडल जजमेंट' की चर्चा करते हुए उन तरीकों का खुलासा करती हैं जिससे हम निर्णय लेते हैं विशेषकर जिसमें जोखिम शामिल हो। वह कहती हैं कि सामाजिक, राजनीतिक और सार्वजनिक क्षेत्र के संबंधों में लिए जाने वाले निर्णय के परिणाम के संबंध में विचार किया जाता है परंतु महत्त्वपूर्ण व्यक्तिगत निर्णय पर यह मॉडल असरकारी नहीं है। निकोल का यह शोध स्पष्ट रूप से बताता है कि विवाहेत्तर संबंध के परिणामों के बारे में विचार नहीं किया जाता जो कि स्वयं और समाज दोनों की बेहतरीन के लिए आवश्यक है।

अब एक महत्त्वपूर्ण यक्ष प्रश्न कि विवाहेत्तर संबंधों का अंत जीवनसाथी की हत्या पर जाकर ही क्यों रुकता है? क्या और कोई मार्ग नहीं है? अगर जीवनसाथी प्रेम संबंधों में रुकावट है तो क्या उसे छोड़ देना बेहतर विकल्प नहीं? जर्नल ऑफ फेनोमेनोलॉजिकल साइकोलॉजी में प्रकाशित जैपियन, निकोल मैरी गॉटफ्राइड का शोध 'द बिगनिंग ऑफ ऐन एक्स्ट्रा-मैरिटल अफेयर : ए डिस्क्रिप्टिव फेनोमेनोलॉजिकल साइकोलॉजिकल स्टडी एंड क्लिनिकल इम्प्लिकेशन्स' एक विस्तृत दृष्टिकोण प्रदान करता है कि समाज चाहे आधुनिक हो या परंपरागत वैवाहिक संबंधों से मुक्ति सहज नहीं है और वैवाहिक संबंधों का उलझाव व्यक्ति के व्यक्तित्व को विखंडित कर देता है।

निश्चित ही भारतीय समाज में आज भी वैवाहिक संबंधों से अलग होना कलंक माना जाता है और इसके लिए एक लंबा भावनात्मक, आर्थिक तथा सामाजिक संघर्ष जीवन को पीड़ादायक बना देता है और शायद यह एक बड़ा कारण है जिसके चलते विवाहेत्तर संबंधों में लिप्त व्यक्ति अपने जीवनसाथी को समाप्त करके मुक्त होने का मार्ग खोजता है। पर क्या यह वाकई मुक्ति का मार्ग है? यह विचार करना आवश्यक है, किसी के जीवन को समाप्त कर कभी भी मुक्ति नहीं पाई जा सकती। यह भी एक गंभीर मंथन का विषय है कि समाज अनचाहे रिश्तों को जीवित रखने का दबाव क्यों बनाता है?

विशेष कर यह अभिभावकों को समझना और जानना जरूरी है कि उनकी संतान के प्रेम संबंधों को जानने के बाद भी उनका अन्यत्र विवाह कई जीवनों की बर्बादी का कारण बनता है। एक और तथ्य जिस पर ईमानदारी से विचार अगर नहीं किया गया तो मेरठ, जयपुर, इंदौर, बेंगलुरु जैसी घटनाओं की पुनरावृत्ति होगी और वह यह कि हमें अब एक ऐसा समाज निर्मित करना होगा जहां विवाह से सम्मानजनक निकासी के रास्ते खुले हो और अगर ऐसा नहीं हुआ तो हत्या को समाधान के रूप में देखने की प्रवृत्ति को रोका जाना मुश्किल होगा।