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बदलाव कैलेंडर में नहीं जीवन में होना चाहिए: नशा, दिखावा छोड़कर आत्मचिंतन से करें नववर्ष की शुरुआत

नया साल अच्छा मनाया नहीं जाता, नया साल जिया जाता है। नया साल अच्छा तब बनेगा जब वह एक रात का उन्माद न होकर सोच और व्यवहार में सकारात्मक बदलाव का कारण बने।

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जयपुर

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Opinion Desk

Dec 31, 2025

परिचय दास, प्रोफेसर एवं पूर्व अध्यक्ष, हिंदी विभाग, नव नालंदा महाविहार विश्वविद्यालय

नया साल आते ही समय जैसे अचानक तेज हो जाता है। कैलेंडर का एक पन्ना पलटता है और शहरों से लेकर कस्बों तक एक साझा उत्तेजना फैल जाती है। घड़ियां बारह बजने की प्रतीक्षा करने लगती हैं, मोबाइल स्क्रीन में उलटी गिनती दिखाने लगती हैं और मनुष्य अपने भीतर एक ऐसी प्रसन्नता खोजने लगता है जो अक्सर उसके पास होती ही नहीं है। नया साल अब केवल तिथि नहीं रह गया, वह एक उपभोग–अनुष्ठान बन चुका है-जिसमें जश्न, स्थान, संगीत, शराब और जोखिम एक साथ गुंथे हुए हैं। आज का नया साल मुख्यतः जगह-आधारित उत्सव है। होटल, रिसॉर्ट, क्लब, बार, फार्महाउस - ये सब नए साल के आधुनिक विशिष्ट स्थल बन गए हैं। यहां जाना केवल आनंद के लिए नहीं बल्कि यह दिखाने के लिए भी है कि व्यक्ति “कहां” जश्न मना रहा है। स्थान अब अनुभव से बड़ा हो गया है। किसी पांच सितारा होटल की लॉबी में खड़े होकर खिंचाई गई तस्वीर, भीतर के आनंद से अधिक महत्त्वपूर्ण हो जाती है। जश्न का मूल्य इस बात से तय होता है कि वह कितना महंगा, कितना एक्सक्लूसिव और कितना दुर्लभ दिखता है।

इन जगहों पर बजता तेज संगीत एक खास मनोवैज्ञानिक भूमिका निभाता है। फास्ट म्यूजिक केवल मनोरंजन नहीं बल्कि संवेदना को कुंद करने का उपकरण है। उसकी तेज धड़कन सोचने की गति को तोड़ देती है। व्यक्ति अपने भीतर उठते प्रश्नों, खालीपन या असंतोष को सुन न सके इसके लिए शोर जरूरी है। इसलिए नए साल की रात शांति असहज लगती है और शोर अनिवार्य। यह संगीत शरीर को हिलाता है लेकिन मन को स्थिर नहीं होने देता। स्थिरता आज के जश्न की सबसे बड़ी दुश्मन है।

नए साल का जश्न जितना चमकदार दिखाई देता है, उतना ही वह मानवीय जीवन के लिए असुरक्षा का वातावरण भी रचता है। यह असुरक्षा अचानक पैदा नहीं होती, बल्कि योजनाबद्ध शोर, नशे और भीड़ के मेल से धीरे-धीरे निर्मित होती है। जब उत्सव तेज संगीत, शराब और रात भर जागने की संस्कृति से जुड़ जाता है, तब विवेक सबसे पहले कमजोर होता है। विवेक के कमजोर होते ही जोखिम सामान्य लगने लगते हैं, तेज गाड़ी चलाना, असावधानी से सड़क पार करना, भीड़ में धक्का-मुक्की करना।

नशे की भूमिका यहां निर्णायक है। शराब व्यक्ति की निर्णय-क्षमता को घटाती है और प्रतिक्रिया को तेज करती है। इसी कारण नए साल की रात सड़क दुर्घटनाएं, झगड़े और हिंसक घटनाएं सामान्य दिनों की तुलना में अधिक होती हैं। यह केवल व्यक्तिगत असावधानी नहीं, बल्कि एक ऐसी सामाजिक संरचना का परिणाम है जहां जोखिम को रोमांच के रूप में प्रस्तुत किया जाता है।

भीड़ स्वयं एक और खतरा बन जाती है। क्लब, होटल और सार्वजनिक आयोजनों में क्षमता से अधिक लोगों का एकत्र होना आग, भगदड़ और दम घुटने जैसी स्थितियां पैदा करता है। इसके साथ ही महिलाओं और कमजोर वर्गों की सुरक्षा भी गंभीर प्रश्न बन जाती है, क्योंकि नशे और भीड़ का संयोजन अक्सर नियंत्रण को ढीला कर देता है। नया साल, जो जीवन के उत्सव का प्रतीक होना चाहिए, कई बार जीवन के लिए ही असुरक्षा का क्षण बन जाता है, जहां आनंद की तलाश में सावधानी और जिम्मेदारी पीछे छूट जाती है।

उन्मुक्त वातावरण में जुए का आकर्षण भी बढ़ता है। कार्ड गेम, ऑनलाइन बेटिंग, कैसीनो आयोजन ये सब नए साल की रात को “रोमांचक” बनाने के नाम पर परोसे जाते हैं। जुआ यहां केवल पैसे का खेल नहीं, बल्कि नियंत्रण खोने का सुख है। साल भर की असफलताओं और दबावों के बाद मनुष्य एक रात के लिए भाग्य पर सब कुछ छोड़ देना चाहता है। यह मनोवृत्ति खतरनाक है, क्योंकि यह जोखिम को आनंद और नुकसान को खेल में बदल देती है।

इन सबके पीछे एक गहरा मनोविज्ञान काम करता है-नवीनता का भ्रम। नया साल मनुष्य को यह विश्वास दिलाता है कि समय बदलते ही जीवन भी बदल जाएगा। यह भ्रम इतना शक्तिशाली है कि लोग अपनी वास्तविक समस्याओं से मुठभेड़ करने के बजाय उन्हें जश्न से ढक देना बेहतर समझते हैं। होटल की चमक, शराब की गर्मी और संगीत की तेजी ये सब मिलकर एक ऐसी कृत्रिम खुशी रचते हैं, जो अगले दिन फीकी पड़ जाती है।

लेकिन इस जश्न का एक दूसरा पक्ष भी है, जो अक्सर अंधेरे में रह जाता है। सड़क दुर्घटनाएं, हिंसा, घरेलू झगड़े, आर्थिक नुकसान ये सब नए साल की रात के स्थायी साथी बन चुके हैं। उत्सव की यह संस्कृति व्यक्ति को जिम्मेदारी से मुक्त नहीं करती, बल्कि उसे और अधिक असावधान बना देती है। कानून और नैतिकता दोनों उस रात थोड़ी देर के लिए शिथिल मान ली जाती हैं, मानो कैलेंडर बदलने से दायित्व भी बदल जाएंगे। यह प्रश्न अब जरूरी हो गया है कि क्या नया साल सचमुच उत्सव की मांग करता है, या यह केवल बाजार द्वारा निर्मित एक अवसर है? क्या खुशी का अनुभव शोर, नशे और जोखिम के बिना असंभव हो गया है? और यदि ऐसा है, तो यह केवल व्यक्तिगत समस्या नहीं, बल्कि सामूहिक मानसिक संकट का संकेत है।

नए साल के इस जश्न पर आलोचनात्मक दृष्टि रखते हुए एक और प्रश्न उठता है-क्या यह उत्सव सचमुच सामूहिक है, या यह केवल एक चयनित वर्ग का प्रदर्शन बनकर रह गया है? होटल, क्लब और रिसॉर्ट आधारित जश्न अनजाने में ही बहुसंख्यक समाज को बाहर छोड़ देता है। जिनके पास पैसे, समय और शहरी पहुंच है जश्न उनके लिए है; बाकी लोग या तो दर्शक हैं या सेवा-प्रदाता। नया साल जिस क्षण “पैकेज” में बदलता है, उसी क्षण वह बराबरी की संभावना खो देता है। यह ध्यान देने योग्य है कि नए साल की रात श्रम सबसे सस्ता और सबसे अदृश्य हो जाता है। होटल का स्टाफ, ड्राइवर, वेटर, सुरक्षा गार्ड, सफाईकर्मी सब जश्न के केंद्र में होते हुए भी जश्न से बाहर रहते हैं। वे दूसरों की खुशी को संभव बनाते हैं लेकिन अपनी खुशी को स्थगित रखते हैं। यह विडंबना केवल सामाजिक नहीं, नैतिक भी है। जिस उत्सव की बुनियाद ही असमान श्रम पर टिकी हो, वह भीतर से खोखला ही होगा।

सोशल मीडिया ने इस पूरे जश्न को और अधिक आक्रामक बना दिया है। अब जश्न जीने से पहले दिखाना जरूरी है। लाइव स्टोरी, रील और पोस्ट ये सब नए साल की रात के अनिवार्य अनुष्ठान बन चुके हैं। व्यक्ति अपने अनुभव से ज़्यादा अपने फ्रेम की चिंता करता है। यह स्थिति मनोविज्ञान की दृष्टि से गहरी बेचैनी को जन्म देती है क्योंकि हर खुशी को तुरंत प्रमाणित करना पड़ता है। बिना कैमरे के बिताया गया सुख, आज मानो अधूरा है। इस प्रदर्शन-प्रधान जश्न में अकेलापन और भी तीखा हो जाता है। जो लोग इन जगहों तक नहीं पहुंच पाते, उनके लिए नया साल उत्सव नहीं, अभाव की याद बन जाता है। अकेलेपन, अवसाद और आत्महत्या की घटनाएं नए साल के आसपास बढ़ने का एक कारण यह भी है।

आलोचना का अर्थ उत्सव-विरोध नहीं है। प्रश्न यह है कि उत्सव किसका, किसके लिए और किस कीमत पर। यदि नया साल हमें और अधिक असंवेदनशील, असमान और असावधान बना रहा है, तो उस जश्न पर प्रश्न उठाना जरूरी है। शायद हमें यह स्वीकार करना होगा कि हर खुशी शोर से नहीं आती, और हर नया आरंभ शराब के गिलास से नहीं होता। नया साल यदि सच में नया होना है, तो उसे हमें धीमेपन, जिम्मेदारी और सजगता की ओर ले जाना होगा। वरना यह उत्सव केवल एक रात का उन्माद बनकर रह जाएगा जिसके बाद वही पुरानी थकान, वही पुरानी बेचैनी और वही पुराना खालीपन हमारा इंतजार कर रहा होगा।

तो नया साल अच्छा कैसे मने ? नया साल अच्छा मनाया नहीं जाता, नया साल जिया जाता है यहीं से उत्तर शुरू होता है। नया साल अच्छा तब बनेगा जब वह एक रात का उन्माद न होकर सोच और व्यवहार में सकारात्मक बदलाव का कारण बने। इसके लिए कोई बड़ा आयोजन नहीं चाहिए, बल्कि कुछ छोटे, लेकिन निर्णायक बदलाव चाहिए। ऐसे बदलाव जो दिखते नहीं, लेकिन असर छोड़ते हैं।

सबसे पहले, नया साल धीमा होना चाहिए।
धीमापन आज सबसे बड़ा प्रतिरोध है। तेज संगीत, तेज फैसले, तेज नशे ये सब मन को खाली करते हैं। नया साल यदि एक शाम को बैठकर चुप रहने, पिछली गलतियों को स्वीकारने और अगले वर्ष के लिए कोई एक जरूरी संकल्प चुनने का समय बन जाए, तो वह अच्छा होना शुरू हो जाता है। कई संकल्प नहीं केवल एक, जिसे निभाया जा सके।

दूसरा, नया साल अकेलेपन को अपराध न बनाए।
हर व्यक्ति खुश नहीं होता, हर व्यक्ति बाहर नहीं जाना चाहता। नया साल अच्छा तब बनेगा जब समाज यह मान ले कि घर पर रहना, जल्दी सो जाना, किसी प्रिय को याद करना ये भी वैध और सम्मानजनक तरीके हैं। जब खुशी का एक ही मॉडल नहीं होगा, तभी मन राहत पाएगा।

तीसरा, नया साल नशे पर नहीं, सजगता पर टिके।
खुशी को भूलने से नहीं, देखने से ऊर्जा मिलती है। शराब या किसी भी नशे से मिली खुशी अगले दिन उतर जाती है, लेकिन सजगता से मिली शांति टिकती है। नया साल अच्छा तब बनेगा जब हम अपने होश को बचाए रखें क्योंकि वही हमें बेहतर इंसान बनाता है।

चौथा, नया साल संबंधों को केंद्र में रखे।
एक सच्ची बातचीत, बिना मोबाइल के बैठना, किसी पुराने मित्र को सुनना ये क्रियाएं किसी भी पार्टी से ज्यादा मूल्यवान हैं। नया साल अच्छा तब बनेगा जब हम संबंधों को दिखाने की चीज नहीं, निभाने की प्रक्रिया समझेंगे।

पांचवां, नया साल न्याय के प्रति थोड़ा संवेदनशील हो।
जब हम जश्न मनाएं, तो यह भी देखें कि हमारे जश्न की कीमत कौन चुका रहा है। टैक्सी ड्राइवर से सम्मान, होटल स्टाफ से मानवीय व्यवहार, सड़क पर सावधानी ये छोटे कर्म नए साल को नैतिक बनाते हैं। अच्छा साल वही है जो किसी और के लिए बुरा न हो।

छठा, नया साल कम उपभोग, अधिक अर्थ की ओर जाए।
हर नया साल हमें कुछ खरीदने के लिए उकसाता है। अच्छा नया साल वह है जिसमें हम कुछ छोड़ते हैं एक बुरी आदत, एक अनावश्यक खर्च, एक दिखावटी अपेक्षा। जो छोड़ा जाता है, वही मन को हल्का करता है।

सातवां, नया साल याद रखने का समय बने, भूलने का नहीं।
पिछले साल की पीड़ा को दबाने के बजाय समझना जरूरी है। दुख को समझे बिना खुशी स्थायी नहीं होती। नया साल अच्छा तब बनेगा जब हम यह स्वीकार करेंगे कि जीवन केवल उत्सव नहीं, संघर्ष भी है और दोनों का सम्मान जरूरी है।

और अंत में नया साल अच्छा तब नहीं बनेगा जब घड़ी बारह बजाएगी, वह अच्छा तब बनेगा जब हम अगले दिन कैसे उठते हैं, यह बदल जाए। यदि अगली सुबह मन थोड़ा शांत हो, दृष्टि थोड़ी साफ हो और दूसरों के प्रति व्यवहार थोड़ा बेहतर हो तो समझिए नया साल सचमुच नया हो गया।