15 मई 2026,

शुक्रवार

Patrika Logo
Switch to English
home_icon

मेरी खबर

video_icon

शॉर्ट्स

epaper_icon

ई-पेपर

संपादकीय: सिर्फ ‘कागजी घोड़े’ नहीं, तकनीकी सुरक्षा जरूरी

कोर्ट का यह भी सुझाव है कि वाहन निर्माताओं को ये उपकरण पहले से ही फिट कर देने चाहिए। इस व्यवस्था को लेकर कोर्ट ने केंद्र सरकार से एक रिपोर्ट बनाकर पेश करने को भी कहा है। सबसे बड़ा सवाल पैनिक बटन का है जिसे खासतौर से सार्वजनिक परिवहन के साधनों व स्कूल बसों में बच्चों, महिलाओं और बुजुर्गों की सुरक्षा के लिए जरूरी समझा गया है।

2 min read
Google source verification
bus

bus rape case

यात्रियों की सुरक्षा को बढ़ावा देने के इरादे से सुप्रीम कोर्ट ने साफ निर्देश दिए हैं कि किसी भी सार्वजनिक परिवहन से जुड़े वाहन को तब तक फिटनेस सर्टिफिकेट या परमिट जारी नहीं किया जाए जब तक कि यह सुनिश्चित नहीं हो जाए कि उसमें व्हीकल लोकेशन ट्रेकिंग डिवाइस (वीएलटीडी) और इमरजेंसी पैनिक बटन लगे ही नहीं हो बल्कि वे जांच के साथ वाहन डेटाबेस में भी दर्ज हो। दिल्ली के निर्भया कांड के बाद से ही सार्वजनिक वाहनों में इन दोनों सुविधाओं की जरूरत महसूस की गई थी। केंद्रीय परिवहन मंत्रालय के अलावा अलग-अलग राज्य सरकारों ने भी इनकी अनिवार्यता को लेकर निर्देश पहले से ही जारी कर रखे हैं लेकिन व्यवहार में लागू नहीं हो पा रहे थे। सिर्फ एक फीसदी से भी कम पब्लिक परिवहन वाहनों में ही ट्रेकिंग डिवाइस लगे होने पर सुप्रीम कोर्ट ने भी जो चिंता व्यक्त की है उसे इसी परिपे्रक्ष्य में देखा जा सकता है।

दो दिन पहले ही दिल्ली में चलती बस मे एक महिला से गैंगरेप की घटना हुई है। मध्यप्रदेश बस में सफर कर रही महिला डॉक्टर से पुलिस के सब इंस्पेक्टर द्वारा छेड़छाड़ का मामला सामने आया है। बलात्कार के आरोपी गिरफ्तार हो गए और छेड़छाड़ के मामले में पुलिस सब इंस्पेक्टर निलंबित भी हो गया। लेकिन ऐसे अपराध कारित करने का दुस्साहस भी किसी का तब ही होता है जब संबंधित वाहन मेंं न तो पैनिक बटन लगा हो और न ही ट्रेकिंग डिवाइस। सड़क हादसों में होने वाली मौतों में कमी लाने की दिशा में भी इन उपकरणों की अहम भूमिका रहती है। कोर्ट का यह भी सुझाव है कि वाहन निर्माताओं को ये उपकरण पहले से ही फिट कर देने चाहिए। इस व्यवस्था को लेकर कोर्ट ने केंद्र सरकार से एक रिपोर्ट बनाकर पेश करने को भी कहा है। सबसे बड़ा सवाल पैनिक बटन का है जिसे खासतौर से सार्वजनिक परिवहन के साधनों व स्कूल बसों में बच्चों, महिलाओं और बुजुर्गों की सुरक्षा के लिए जरूरी समझा गया है। केंद्रीय परिवहन मंत्रालय और राज्य सरकारों ने इनकी अनिवार्यता को लेकर कागजी घोड़े दौड़ाने से ज्यादा कुछ नहीं किया। चिंता यह भी है कि कानूनी प्रावधानों के बावजूद इन प्रावधानों को लागू करने की दिशा में ठोस काम नहीं होता।
अक्टूबर २०१५ के बाद सभी परिवहन वाहनों में स्पीड लिमिटिंग डिवाइस (एसएलडी) लगाने के फरमान का भी यही हश्र हुआ है। इसकी वजह भी यह है कि कई राज्य तो ऐसी अनिवार्यता को लागू करने के लिए समुचित तकनीकी बंदोबस्त तक नहीं कर पाए। जबकि पैनिक बटन व्हीकल ट्रेकिंग डिवाइस से जुड़ा होने पर किसी भी किस्म के अपराधी की त्वरित धरपकड़ की जा सकती है। कोर्ट की सख्ती के बाद उम्मीद की जानी चाहिए कि अब इस दिशा में त्वरित काम होगा ताकि हादसों पर अंकुश के साथ-साथ महिलाओं का सुरक्षित सफर सुनिश्चित हो।