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गर्मी तो पहले भी होती थी, अब प्रकृति से दूरी ने बढ़ाई तपिश

भीषण गर्मी से लडऩे की योजना बंद कमरों में बैठकर नहीं बन सकती। हमें जलवायु पर चर्चा करने से पहले उस जीवन शैली को समझना होगा, जो प्रकृति के साथ चलती थी। हमारे घर कैसे बनते थे, हमारा भोजन क्या था और हमारे जल स्रोतों का प्रबंधन कैसे होता था-इन सभी बातों को समझना आवश्यक है।

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भारत

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Rakhi Hajela

May 14, 2026

Heat in Summer

Heat in Summer

जयेश जोशी,कृषि एवं जलवायु विशेषज्ञ
सचिव, वागधारा

कुछ समय पहले की बात है। मैं दिल्ली के पास एक गांव में चाय के ठेले पर बैठा था। बात गर्मी की चल पड़ी। ठेले वाले ने कहा, ‘गर्मी तो पहले भी होती थी, साहब, पर अब कठिन लगने लगी है।’ फिर उसने अपनी बात आगे बढ़ाई। पहले बड़ी इमारतों में गिनती के एयर कंडीशनर हुआ करते थे। अब हर खिडक़ी से एक एसी बाहर की ओर गर्मी फेंकता है। हर मोहल्ले के चौराहे पर मटकों के ठिए हुआ करते थे, लेकिन अब उनकी जगह पानी की बोतलें बिकती हैं। पहले जब मेहमान घर आते थे, तो उन्हें कैरी का पना या छाछ पिलाई जाती थी, ताकि लू का असर कम हो। अब उनकी जगह दवाइयों ने ले ली है। आस-पास बैठे बुज़ुर्ग सिर हिलाकर सहमति जताते रहे और मुझे अपने बचपन के दिन याद आने लगे।

मैं मध्य भारत के आदिवासी अंचल से आता हूं। वहां की गर्मियां कभी भी हमें घर में बांधने वाली नहीं रहीं। अक्षय तृतीया से लेकर पूरी गर्मी तक शादियों और सामाजिक आयोजनों का सिलसिला लगातार चलता रहता था। बारात में जाते या किसी अन्य आयोजन में शामिल होते, तो आस-पास कहीं न कहीं नीम या किसी बड़े पेड़ की छाया मिल ही जाती थी। दोपहर के भोजन के बाद उसी छाया में बैठकर बातें करते हुए समय बीत जाता था। नदी-नालों में कूदना, दिन भर पानी में डूबे रहना भी गर्मी का ही हिस्सा था। मां-बहनें सिर पर गंगाजल लेकर जाती थीं। रात को खुले आंगन में सोते हुए तारे गिनना और उनकी भाषा सुनना भी जीवन का आनंद था। बिजली रहे या न रहे, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता था। भीषण गर्मी भी हमारे जल स्रोतों को कभी समाप्त नहीं कर पाती थी। स्नान और तैरने के लिए पानी निरंतर बहता रहता था।
पिछले कई दशकों से मध्य भारत के मैदानी इलाकों में 40 डिग्री से ऊपर का तापमान कोई नई बात नहीं है। यह सामान्य प्रकृति का हिस्सा रहा है। लगभग सत्तर वर्ष पहले, 1956 में राजस्थान के अलवर में तापमान 50.6 डिग्री तक पहुंचा था। 1994 की मई में प्रयागराज में 48.4 डिग्री तापमान दर्ज किया गया और यह रेकॉर्ड अगले तीस वर्षों तक नहीं टूटा। 2010 की मई में अहमदाबाद ने 46.8 डिग्री तापमान देखा और 2016 में राजस्थान के फलोदी में पारा 51 डिग्री तक पहुंच गया, जो आज भी देश में दर्ज सबसे अधिक तापमान है। थोड़ी असहजता होना और उसका कम-ज्यादा होना हमारी रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा था। फिर ऐसा क्या बदल गया कि आज हर साल की गर्मी हमें तांडव जैसी लगने लगी है? ऐसा क्या खो गया, जिसने हमें इतना असुरक्षित बना दिया? भीषण गर्मी केवल तापमान बढऩे का नाम नहीं है। यह प्रकृति से हमारे टूटते संबंधों का परिणाम है। जब तक हम यह नहीं समझेंगे, तब तक हम इस गर्मी को भी सही ढंग से नहीं समझ पाएंगे। आज मौसम के पूर्वानुमान के आंकड़े देखकर ही हम असहज महसूस करने लगते हैं। हमारी जीवनशैली और प्रकृति को जीतने की हमारी कोशिशें ही गर्मी को बढ़ा रही हैं।
दूसरी ओर आदिवासी और ग्रामीण जीवन शैली है, जो प्रकृति से लडक़र नहीं, बल्कि उसके साथ सामंजस्य बनाकर स्वयं को सुरक्षित रखती है। वही जीवन शैली हमें प्रकृति के साथ रहकर आनंद लेना भी सिखाती है। यह जीवन शैली पहले भी महत्त्वपूर्ण थी और आज भी उतनी ही आवश्यक है।
मेरा उद्देश्य गर्मी का महिमामंडन करना या पर्यावरणविदों की चिंता को कम करके आंकना बिल्कुल नहीं है। चिंता वास्तविक है। परंतु प्रश्न यह है कि अचानक यह गर्मी हमें इतनी असहनीय क्यों लगने लगी है? ऐसा क्या है जो हमसे छूट गया है? जंगल कटते गए। जो जल स्रोत कभी साफ रखे जाते थे और समय-समय पर गहरे किए जाते थे, उनकी सुध किसी ने नहीं ली। गर्मी के पारंपरिक भोजन भुला दिए गए। लू से बचाने वाली देसी औषधियां भी भूल गए और सबसे बड़ी बात, गर्मी में आनंद लेने के हमारे तरीके खो गए। शादियां, अक्षय तृतीया, पेड़ों की छाया में बैठकी-ये केवल परंपराएं नहीं थीं, बल्कि गर्मी के साथ जीने के हमारे तरीके थे।
भीषण गर्मी से लडऩे की योजना बंद कमरों में बैठकर नहीं बन सकती। हमें जलवायु पर चर्चा करने से पहले उस जीवन शैली को समझना होगा, जो प्रकृति के साथ चलती थी। हमारे घर कैसे बनते थे, हमारा भोजन क्या था और हमारे जल स्रोतों का प्रबंधन कैसे होता था-इन सभी बातों को समझना आवश्यक है। यह समझ बड़े जलवायु क्षेत्रों के स्तर पर नहीं, बल्कि छोटे स्थानीय जलवायु क्षेत्रों के स्तर पर विकसित करनी होगी। हर क्षेत्र के अपने वन, अपना भोजन और अपनी परंपराएं होती हैं। समाधान भी इन्हीं से निकलेंगे।
आदिवासी और ग्रामीण समुदाय आज भी इसी प्रकार जीवन जी रहे हैं। वे कोई बीती हुई कहानी नहीं हैं, बल्कि इस बात का जीवित उदाहरण हैं कि जल, जंगल और जमीन का प्रबंधन एक साथ कैसे किया जाता है। यदि हम जलवायु नीति या आपदा प्रबंधन की बात करते हैं, तो इन समुदायों से संवाद और सलाह-मशविरा किए बिना कोई नीति पूर्ण नहीं हो सकती। उनका पारंपरिक ज्ञान, स्थानीय समाधान और परिस्थितियों की समझ हमारी नीतियों का हिस्सा बननी चाहिए। यही वह मार्ग है, जिससे हम प्रकृति से अपने टूटे संबंधों को फिर से जोड़ सकते हैं। और शायद यही वह रास्ता है, जिसके माध्यम से हम और हमारी आने वाली पीढिय़ां केवल गर्मी सहना ही नहीं, बल्कि उसके साथ जीना और उसका आनंद लेना भी फिर से सीख सकें।