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सिर्फ आह्वान नहीं, अन्य उपायों की भी आवश्यकता

यह संकट तब आया है, जब वित्तीय स्थिति पहले से ही दबाव में है। वित्त वर्ष 2025-26 में प्रत्यक्ष कर की प्राप्ति अनुमान से कम रही है और अगले साल का लक्ष्य 15 प्रतिशत अधिक रखा गया है, जबकि राजस्व की रफ्तार धीमी है।

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अजीत रानाडे, वरिष्ठ अर्थशास्त्री (द बिलियन प्रेस)- प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा ईंधन, सोना, उर्वरक, खाद्य तेल और विदेश यात्रा जैसे 11 विषयों पर संयम के हालिया आह्वान को कई लोग कीमतों में भावी वृद्धि की आहट मान रहे हैं। लेकिन इस आह्वान का व्यापक लक्ष्य विदेशी मुद्रा संरक्षण को वर्ष 1930 के नमक सत्याग्रह जैसा राष्ट्रीय जनआंदोलन बनाना है। गांधीजी ने अपनी दूरदर्शिता से जिस प्रकार नमक जैसे शक्तिशाली प्रतीक से आर्थिक स्वावलंबन के विचार को व्यापक जन-भागीदारी में बदला था, मोदी भी चाहते हैं कि हर भारतीय उसी प्रकार देश की आर्थिक आत्मनिर्भरता में अपनी व्यक्तिगत भूमिका महसूस करे। यह आर्थिक नेतृत्व का एक तरीका है। कच्चे तेल, उर्वरक, सोने और खाद्य तेल के आयात पर भारत की निर्भरता ऐसी ढांचागत कमजोरी है, जो दशकों से दूर नहीं की जा सकी है।

लाल बहादुर शास्त्री ने भी 1965 में युद्ध और खाद्यान्न संकट के समय सोमवार की शाम उपवास रखने का आह्वान किया था। समाजवादी सांसद मधु लिमये ने संसद में तर्क दिया था कि राष्ट्रीय संकट के समय स्वैच्छिक सादगी संवैधानिक कर्तव्य है और राजनेताओं को खुद मिसाल पेश करनी चाहिए। आर्थिक आपातकाल के समय नागरिक एकजुटता की अपील की यह परंपरा सम्मानजनक रही है और अतीत में कारगर साबित हुई है। लेकिन गांधीजी के 'नमक सत्याग्रह' की नैतिक शक्ति यह थी कि नमक कर सीधे गरीबों को बड़ी चोट पहुंचाता था। गांधीजी ने उस अन्याय के विरुद्ध नमक को चुना। इसके विपरीत विदेशी मुद्रा संरक्षण का आह्वान किसी अन्याय के खिलाफ नहीं है, बल्कि यह संसाधनविहीन लोगों पर अधिक भार डाल सकता है। यदि हम प्रधानमंत्री के 11 आग्रहों को इसी नजरिए से देखें, तो विदेश में छुट्टियां मनाना या डेस्टिनेशन वेडिंग टालना केवल अमीरों के लिए है। इलेक्ट्रिक वाहन खरीद या 'वर्क फ्रॉम होम' के विकल्प संपन्नों और सफेदपोश पेशेवरों के लिए हैं, दिहाड़ी मजदूरों के लिए नहीं। लेकिन खाद्य तेल के उपयोग में संयम गरीबों की बुनियादी जरूरत पर प्रहार है। कुछ आग्रह अमीरों को लक्षित करते हैं, लेकिन कुछ अनजाने में दरिद्र नारायण से त्याग की अपेक्षा करते हैं।

आर्थिक परिदृश्य वैसे ही गंभीर है। सरकारी तेल कंपनियां प्रतिदिन लगभग 1,600 से 1,700 करोड़ रुपए का नुकसान उठा रही हैं। पिछले दस सप्ताह का कुल घाटा 1 लाख करोड़ रुपए पार कर चुका है। उपभोक्ताओं को राहत देने के लिए की गई उत्पाद शुल्क कटौती से सरकारी खजाने को हर महीने 14,000 करोड़ रुपए का नुकसान हो रहा है। उर्वरक सब्सिडी का बजट भी 1.71 लाख करोड़ से बढ़कर 2 लाख करोड़ के पार जाने की आशंका है। यह संकट तब आया है, जब वित्तीय स्थिति पहले से ही दबाव में है। वित्त वर्ष 2025-26 में प्रत्यक्ष कर की प्राप्ति अनुमान से कम रही है और अगले साल का लक्ष्य 15 प्रतिशत अधिक रखा गया है, जबकि राजस्व की रफ्तार धीमी है। यहीं मोदी की अपील में विरोधाभास नजर आता है। सोने की खरीद और विदेश यात्रा को कम करने जैसे कदम घरेलू उत्पादन को नुकसान पहुंचाए बिना विदेशी मुद्रा भंडार की मदद करेंगे। लेकिन ईंधन की कीमतों में वृद्धि से महंगाई बढ़ेगी और रिजर्व बैंक को रुपए की रक्षा या आर्थिक विकास को बनाए रखने के बीच कठिन संतुलन बनाना होगा।

सरकार द्वारा एक तरफ कीमतों को दबाने की कोशिश करना और दूसरी तरफ नागरिकों से यह उम्मीद करना कि वे व्यवहार ऐसा करें जैसे कीमतें बहुत अधिक हों, एक तरह का मानसिक विरोधाभास पैदा करता है। अब कर संग्रह को लेकर भी भारी दबाव है। देशभर में करदाताओं पर 9 लाख करोड़ रुपए से अधिक का निर्विवाद कर बकाया है। सरकार नैतिक रूप से तब तक विश्वसनीय नहीं लग सकती, जब तक वह परिवारों से खाद्य तेल की खपत कम करने को कहती रहे और दूसरी ओर बड़े कॉर्पोरेट तथा व्यक्तिगत कर-चूककर्ताओं से लाखों करोड़ का कर न वसूले। यदि सरकार डिजिटल निगरानी या अन्य उपायों से इन बकाया करों की वास्तविक वसूली सुनिश्चित करे, तो यह एक सशक्त संदेश होगा कि राष्ट्रीय त्याग का बोझ सबके बीच समान रूप से बांटा गया है। यह कर ढांचे पर पुनर्विचार का समय भी है। 2015 में संपदा कर हटा दिया गया था और 1985 से एस्टेट ड्यूटी भी लागू नहीं है। देश की कुल संपत्ति का लगभग 40 प्रतिशत हिस्सा शीर्ष एक प्रतिशत भारतीयों के पास है। ऐसे में अति संपन्न वर्ग पर अस्थायी संकट अधिभार या मुनाफा कमाने वाली संस्थाओं पर विंडफॉल टैक्स जैसे कदम राजस्व बढ़ाने के साथ-साथ इस बोझ को न्यायसंगत बनाएंगे और इस जनआंदोलन को नैतिक वैधता भी मिलेगी।

अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी के सदस्य देश 90 दिनों का आपातकालीन पेट्रोलियम भंडार रखते हैं, लेकिन भारत का रणनीतिक भंडार इससे कम दिनों का है। हमारे पास संकटकाल के लिए कोई पर्याप्त संस्थागत सुरक्षा कवच नहीं है।प्रधानमंत्री मोदी का यह आह्वान एक स्थायी राष्ट्रीय दृष्टि की नींव बन सकता है या फिर एक ऐसा भाषण, जो वक्त के साथ फीका और असहज हो जाए- यदि ईंधन की कीमतें चुपचाप बढ़ा दी जाएं, अमीर डिफॉल्टर अपने बकाया टालते रहें और गरीबों के लिए खाद्य तेल और महंगा हो जाए। यदि इसे भारत का विदेशी मुद्रा सत्याग्रह बनना है, तो इसकी रूपरेखा भी इसकी महत्त्वाकांक्षा के अनुरूप होनी चाहिए- बोझ का न्यायसंगत बंटवारा, क्रियान्वयन में कठोरता और समस्याओं का स्थायी एवं ईमानदार समाधान। स्वैच्छिक संयम कभी भी उन ढांचागत सुधारों और आर्थिक संकेतों की जगह नहीं ले सकता, जो आज की आवश्यकता हैं।