21वीं सदी की शुरुआत से ही वैश्विक स्तर पर औद्योगिक रसायनों का उत्पादन दोगुना होकर करीब 2.3 बिलियन टन हो गया है और 2030 तक 85 प्रतिशत तक बढऩे की संभावना है। इसलिए अगर उत्पादन एवं उपभोग के तरीकों में बदलाव नहीं किया गया, वास्तविक स्थायी प्रबंधन के प्रति राजनीतिक प्रतिबद्धता नहीं अपनाई गई तो मृदा एवं पर्यावरण प्रदूषण त्रासदी के स्तर तक बढऩे की आशंका है।
शैलेंद्र यशवंत
पर्यावरणीय विषयों के स्तम्भकार और सामाजिक कार्यकर्ता
................................................................................
आज विश्व मृदा दिवस है और संयुक्त राष्ट्र खाद्य एवं कृषि संगठन का अभियान ‘मृदा: जहां से खाद्यान्न शुरू होता है’ समाजों को प्रोत्साहित कर रहा है कि मृदा स्वास्थ्य सुधारें। दरअसल, जब सरकारें और पर्यावरण कार्यकर्ता पर्यावरण गुणवत्ता की बात करते हैं, उनका आशय मुख्यत: हवा और पानी की गुणवत्ता से होता है, वे मृदा गुणवत्ता और मृदा स्वास्थ्य के बारे में कम ही बात करते हैं। यहां तक कि ‘क्लाइमेट चेंज’ वाक्यांश का हिंदी अनुवाद भी ‘जलवायु परिवर्तन’ ही है। लेकिन हम सब यह भलीभांति जानते हैं कि चिंता का विषय जल, वायु व मिट्टी का परिवर्तन है।
एक पुराना देशभक्ति गीत - जिसके बोल हैं ‘मेरे देश की धरती सोना उगले, उगले हीरे मोती...’ - आज के दिन बार-बार सुना और गुना जाना चाहिए। वर्ष 1967 में जब हिन्दी फिल्म ‘उपकार’ रिलीज हुई थी और फिल्म का यह गीत लोकप्रिय हो गया था, तब से लेकर अब तक मेरे देश की धरती, उसकी मिट्टी, उसकी मृदा का कण-कण प्रदूषित हो चुका है और मृदा क्षरण इतना हो चुका है कि सुधार से परे है। अध्ययनों की मानें तो निकट भविष्य में भारत के कुल भौगोलिक क्षेत्र में खेती योग्य 141 मिलियन हैक्टेयर भूमि में से करीब 100 मिलियन हैक्टेयर क्षेत्र कृषि योग्य नहीं रह जाएगा।
मृदा प्रदूषण एक रासायनिक क्षरण प्रक्रिया है जो उपजाऊ मिट्टी को नष्ट करती है। हो सकता है इन्हें मानव नेत्रों से न देखा जा सके पर इससे भोज्य पदार्थों में विषाक्तता आती है, पीने का पानी प्रदूषित होता है और हवा प्रदूषित होती है जिसमें हम सांस लेते हैं। ज्यादातर प्रदूषक तत्व मानव गतिविधियों के कारण उत्पन्न होते हैं और पर्यावरण में छोड़ दिए जाते हैं। कारण है पर्यावरण प्रतिकूल उत्पादन, उपभोग और निस्तारण से जुड़ी आदतें, जैसे कि असुरक्षित कृषि आदतें, पर्यावरण प्रतिकूल औद्योगिक प्रक्रियाएं और खनन व कमजोर अपशिष्ट प्रबंधन। प्रदूषण की कोई सीमा नहीं होती। दूषित तत्व मिट्टी, हवा और पानी में विचरण करते रहते हैं। ये पहले कृषि तंत्र में, फिर भोजन तंत्र में प्रवेश करते हैं, जिससे पर्यावरण व मानव स्वास्थ्य प्रभावित होता है।
संयुक्त राष्ट्र ने मृदा को ‘सीमित’ घोषित किया है और भविष्यवाणी की है कि जीवनदायिनी मृदा अगले साठ सालों में काफी कुछ नष्ट हो सकती है। संयुक्त राष्ट्र मरुस्थलीकरण रोकथाम सभा (यूएनसीसीडी) के अनुसार, मृदा क्षरण का विश्वव्यापी असर वर्ष २०५० तक खाद्यान्न, पारिस्थितिकीय सेवाओं और आजीविका के रूप में कुल मिलाकर 23 ट्रिलियन डॉलर के नुकसान के बराबर हो सकता है।
अच्छे मंतव्यों के साथ शुरू की गई अल्पकालिक लाभ देने वाली हरित क्रांति भारत में मृदा क्षरण का बड़ा कारण है। साठ के दशक में शुरू की गई हरित क्रांति के चलते अत्यधिक मात्रा में कीटनाशी और कृत्रिम सामग्री के इस्तेमाल को प्रोत्साहन मिला। इससे मृदा की उर्वरता घटी, जिससे पर्यावरणीय असंतुलन और स्वास्थ्य खतरे उत्पन्न हुए। इससे मिट्टी का उपयोग अत्यधिक बढ़ गया और उसके पोषक तत्वों में निरंतर कमी आई। हरित क्रांति के चलते आई अनियंत्रित सिंचाई आदतों से मृदा क्षरण अधिक हुआ। इससे भी बुरी बात यह है कि हमारी मिट्टी विषाक्त प्रदूषक तत्वों से दूषित है। अनियमित और अनुपचारित अपशिष्टों और औद्योगिक अवशिष्टों से ये प्रदूषक तत्व आते हैं। गुजरात के वापी की रंग-बिरंगी बंजर भूमि और तमिलनाडु के एन्नोर, भोपाल की जानलेवा यूनियन कार्बाइड फैक्ट्री से लेकर कोडईकनाल के मर्करी थर्मामीटर प्लांट तक मिट्टी में कितने ही तरह के विषाक्त तत्व घुल चुके हैं।
विश्व को खेती, पानी को शुद्ध करने, जलवायु परिवर्तन के प्रभावों के शमन, पारिस्थितिकी सेवाओं, स्वास्थ्य व अन्य सेवाओं के लिए स्वस्थ मृदा की जरूरत है। हवा व पानी के बीच का फलक मिट्टी ही है। अगर मिट्टी में भारी धातु, कीटनाशकों के अवशेष या अन्य प्रदूषक तत्व शामिल हैं तो यही तत्व हवाओं में भी शामिल होते हैं और पानी की गुणवत्ता मिट्टी पर ही निर्भर करती है। मिट्टी के हर एक ग्राम में लाखों जीवाणु कोशिकाएं और फंगस होते हैं जो सभी पारिस्थितिकीय सेवाओं में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। खेती में आई तेजी का नतीजा मृदा क्षरण, वनों की कमी और जैव विविधता में नुकसान के रूप में सामने आया। और अधिक तेजी लाना उन चुनौतियों का हल नहीं है, जिनका सामना हम कर रहे हैं। जलवायु संकट के प्रभावी समाधान के लिए हमें तुरंत ऐसी कृषि प्रणालियां अपनाने की जरूरत है, जो मृदा स्वास्थ्य सुधारें। मिट्टी अति आवश्यक है। मानवता इस पर निर्भर है और इसीलिए ऐसी कृषि पद्धतियों को प्राथमिकता देनी होगी जो वास्तव में पर्यावरण सुधारती हैं, जैसे कृषि पारिस्थितिकी, कृषि वानिकी और घास पर आधारित मिश्रित किसानी।
21वीं सदी की शुरुआत से ही वैश्विक स्तर पर औद्योगिक रसायनों का उत्पादन दोगुना होकर करीब 2.3 बिलियन टन हो गया है और 2030 तक 85 प्रतिशत तक बढऩे की संभावना है। इसलिए अगर उत्पादन एवं उपभोग के तरीकों में बदलाव नहीं किया गया, वास्तविक स्थायी प्रबंधन के प्रति राजनीतिक प्रतिबद्धता नहीं अपनाई गई तो मृदा एवं पर्यावरण प्रदूषण त्रासदी के स्तर तक बढऩे की आशंका है। संभावित प्रदूषित स्थल चिह्नित करना और आकलन मृदा प्रदूषण प्रबंधन की दिशा में पहला कदम है। अगर किसी स्थल का प्रदूषण स्तर हानिकारक है तो उसकी जानकारी सरकारी स्तर पर एकत्र कर सार्वजनिक रूप से साझा की जानी चाहिए। यदि किसी स्थल का उपयोग खाद्यान्न उत्पादन या जलाशय के लिए करना है तो प्रदूषण का उपचार या जोखिम कम करने के उपाय करना जरूरी है।
मृदा प्रदूषण के मौजूदा हालात को देखते हुए ज्यादा राजनीतिक, सामाजिक व व्यापारिक प्रतिबद्धता की जरूरत है ताकि अत्यधिक विषाक्त रसायनों का इस्तेमाल रोका जा सके व अनुसंधान, रोकथाम व उपचार में निवेश बढ़ाया जा सके। हमारे ग्रह का अस्तित्व उस कुछ सेंटीमीटर स्वस्थ मृदा पर टिका है, जिसमें हमारा 95 प्रतिशत भोजन उगाया जाता है।