
protests erupt in pok against exploitation of resources Pakistan
- क्रिस्टोफर बाल्डिंग, आर्थिक विश्लेषक
इस बात की पूरी-पूरी संभावना है कि इस सप्ताह पाकिस्तान की ओर से अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आइएमएफ) से 12 अरब डॉलर के बेलआउट पैकेज (आर्थिक सहायता) की मांग की जाएगी। वर्ष 1980 से लेकर यह अब तक का १२वां और सबसे बड़ा बेलआउट पैकेज होगा। लेकिन इस बार आइएमएफ को कोई भी फैसला लेने से पहले अच्छी तरह विचार कर लेना चाहिए। पाकिस्तान का ऋण संकट उसकी हिचकोले खाती माली हालत का परिणाम नहीं है। हकीकत में यह अनाप-शनाप तरीके से चीन से मिले उधार के कारण है। यदि किसी भी किस्म की नई सहायता पाकिस्तान को मिलती है तो यह उसके जोखिम को बढ़ाने के साथ इसी तरह की समस्याओं को बदतर करने में ही मददगार होगी।
उल्लेखनीय है कि चीन अपने बेल्ट एंड रोड इनिशटिव के तहत विभिन्न देशों को आधारभूत सेवा परियोजनाओं के लिए भारी-भरकम ऋण उपलब्ध कराता है। इस ऋण राशि को उपलब्ध कराते समय छिपी मंशा यह होती है कि इसे चीनी वस्तुओं, सेवाओं और श्रम पर व्यय किया जाए। ऋण भुगतान की शर्तों में जरूरी पारदर्शिता नहीं होती। इन शर्तों का बोझ इतना अधिक होता है कि ऋण भुगतान के लिए किसी भी देश को भारी प्रयास और परेशानियों का सामना करना पड़ता है।
पाकिस्तान की हालत दर्शाती है कि स्थितियां किस तरह बिगड़ सकती हैं। चीन सडक़ों, बंदरगाहों, विद्युत संयंत्र और बिजनेस पार्क जैसी परियोजनाओं के लिए पाकिस्तान में 62 अरब डॉलर का निवेश कर रहा है। जब तक विस्तारपूर्वक न देखा जाए, चीन का उद्देश्य बेहद अच्छा दिखाई देता है। पाकिस्तान में चीन की सहायता से लगाए जा रहे विद्युत संयंत्र पर 30 वर्षों तक सालाना 34 फीसदी लाभ की बात कही गई है। इस बात की गारंटी पाकिस्तान सरकार की ओर से भी दी गई है। तुलनात्मक प्रदर्शन की बात करें तो पाकिस्तान सरकार के 10 वर्ष बांड से सालाना 8 से 9 फीसदी तक ही कमाई हो पाती है। यह अपने आप में असंतुलन की स्थिति दर्शाता है।
इन हालात से भी बदतर यह है कि चीन जिस मुद्रा में उधार देता है, वह है डॉलर। इसके मद्देनजर पाकिस्तान के पास ऋण के भुगतान के लिए भारी मात्रा में विदेशी मुद्रा भंडार होना चाहिए। व्यापार अधिशेष के लिए बेहतर निर्यात की आवश्यकता होती है और पाकिस्तान ऐसा कर पाने में सक्षम नहीं है। आयात पर निर्भरता के कारण विदेशी मुद्रा भंडार के तेजी से समाप्त होने की आशंका है।
पाकिस्तान जैसी ही परेशानियां अन्य देश भी झेल रहे हैं। वेनेजुएला ने तेल उत्पादन के भरोसे पर चीन से ऋण ले लिया। लेकिन, उधारी चुकाने के लिए आवश्यक मुद्रा कमाने के लिहाज से वह वैश्विक बाजार में कच्चा तेल नहीं बेच सका और आर्थिक शिकंजे में जकड़ गया। इसी तरह जब श्रीलंका भी उधारी नहीं चुका सका तो चीन ने उसका एक बंदरगाह 99 वर्षों के लिए हथिया लिया। इसीलिए, इस बात पर कोई आश्चर्य नहीं होता कि आज मलेशिया, म्यांमार और नेपाल को चीन से मिलने वाली संभावित उधारी पर पुनर्विचार करना पड़ रहा है।
चीन के बेल्ट एंड रोड इनिशटिव से जुड़ी परियोजनाओं का सबसे बड़ा जोखिम यही है कि उसका वास्तविक उद्देश्य आर्थिक कम, राजनीतिक अधिक है। चीन के इस महत्त्वाकांक्षी इनिशटिव या अभियान को वहां की कम्युनिस्ट पार्टी ने 2017 में अपने संविधान में शामिल किया। यह प्रभुत्व और ताकत बढ़ाने की चीन की योजना की आधारशिला है। विभिन्न देशों को ऋण चीन के सरकारी बैंकों द्वारा दिए जाते हैं जो चीन की विदेश नीति को केंद्र में रखकर काम करते हैं। उनका मकसद मुनाफा कमाने की बजाय अधिक से अधिक नए सहयोगियों को इनिशटिव से जोडऩा है। कई बार ऐसा भी देखने में आता है कि वित्तीय स्थिति और अंतरराष्ट्रीय मानक स्तर के मद्देनजर ऋण की समयावधि को बढ़ाया जाता है। ये स्थितियां स्पष्ट करती हैं कि क्यों बेल्ट एंड रोड इनिशटिव के तहत चीन से ऋण प्राप्त करने वाले देश आर्थिक दबाव में आ जाते हैं।
आइएमएफ को चीन की आर्थिक रणनीति को लेकर चौकस रहना होगा। यद्यपि उसने वित्तीय व्यवहार्यता और चीन के निरंतर बढ़ते ऋण भार को लेकर चेतावनियां जारी की हैं। उसने वर्ष 2015 में युआन (चीन की मुद्रा) को मुद्रा भंडार के तौर पर रखने के चीन के आग्रह को भी स्वीकार किया। इसके बावजूद चीन ने युआन के विदेशी मुद्रा भंडार संबंधित मानदंडों का उल्लंघन किया। अब यदि आइएमएफ पाकिस्तान के मामले में फैसला लेने में विफल होता है तो बेल्ट एंड रोड से संबद्ध देशों के लिए यह नैतिक अवरोध को बढ़ाने वाला होगा।
पाकिस्तान को सहायता पैकेज देने पर विचार करते हुए आइएमएफ को चीन के ऋण भुगतान को इससे अलग रखना चाहिए। साथ ही आइएमएफ को साफ कर देना होगा कि उसके लिए बिगड़ती माली हालत वाली व्यावसायिक परियोजनाओं और विदेश नीति के कारण बनते ऋण जाल में फर्क है। यदि चीन के नेता विदेशों में अपनी संदेहास्पद परियोजनाओं पर पैसा उड़ाते हैं, तो यह उनकी करनी है। इसके चलते बिगडऩे वाली चीजों को सुधारने की जिम्मेदारी आइएमएफ को नहीं लेनी चाहिए।

