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भारत में राजनीतिक सुधार की बात करना जितना आसान है, उतना ही कठिन है राजनीतिक सुधार करना। अब सांसदों, विधायकों की संपत्ति की छानबीन पर पर्दा रखने के लिए केन्द्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड ने चुनाव आयोग को जो पत्र सौंपा है, उसका अघोषित लक्ष्य राजनेताओं की धन-संपत्ति सम्बंधी सूचनाओं को आम लोगों तक पहुंचने से रोकना है। जनता के धन पर चलने वाली संस्थाएं जनता से ही सूचनाएं छिपाना चाहती हैं?
सुप्रीम कोर्ट में दायर एक याचिका बताती है कि २६ लोकसभा सदस्य, ११ राज्यसभा सदस्य और २५७ विधायकों की संपत्ति दो चुनावों के बीच कई गुना बढ़ गई। केन्द्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड इसकी जांच कर रहा है। केन्द्रीय सूचना आयोग और चुनाव आयोग, दोनों की ही मंशा है कि नेताओं द्वारा दायर हलफनामों की जांच हो और मांगने वालों को सूचनाएं दी जाएं, लेकिन यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि कर बोर्ड ऐसा नहीं चाहता। उसने आयकर कानून की एक ऐसी धारा १३८ का हवाला दिया है, जिसके तहत ऐसी सूचनाएं छिपाई जा सकती हैं। आखिर किसके इशारे पर किसके हित में सूचनाएं छिपाई जा रही हैं? आखिर ऐसे नियम-अधिनियम का क्या मतलब, जो देश को भ्रष्ट बनाने में काम करे।
पहले तो यही समझना होगा कि राजनीतिक सुधार की सबसे बड़ी जिम्मेदारी संवैधानिक संस्थाओं की है। ऐसे कानून-नियम अच्छे काम और नेताओं-अधिकारियों को संरक्षण देने के लिए बनाए गए थे, लेकिन इनसे यदि भ्रष्टाचारियों को संरक्षण देने का काम होने लगे तो तत्काल जागना चाहिए। राजनीतिक पार्टियां सूचना के अधिकार के दायरे से बाहर रहना चाहती हैं। वे नहीं चाहतीं कि उनके धन के बारे में आम लोगों को पता चले।
राजनीतिक सुधार की राह में यह सबसे बड़ा रोड़ा है कि नैतिकता की बड़ी-बड़ी बातें करने वाली पार्टियां इस मोर्चे पर एकमत हैं। अब उनके नेताओं द्वारा चुनाव के समय दायर हलफनामे की सच्चाइयां भी अगर गोपनीय श्रेणी में आ जाएंगी, तो भला राजनीतिक सुधार की प्रक्रिया कैसे आगे बढ़ेगी? हलफनामा कागजी खानापूर्ति रह जाएगा? कर बोर्ड जिस नियम-धारा की आड़ ले रहा है, उसे तत्काल खत्म करना चाहिए। जनप्रतिनिधियों को ध्यान रहे, वे राजनीति में सेवा के लिए हैं। सूचना क्रांति के दौर में अपनी स्याह सच्चाइयों पर पर्दा डाले रखने का हठ हास्यास्पद है। जितना छिपाएंगे, दुनिया आप पर उतना ही हंसेगी।
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