17 मार्च 2026,

मंगलवार

Patrika Logo
Switch to English
home_icon

मेरी खबर

video_icon

शॉर्ट्स

epaper_icon

ई-पेपर

राष्ट्रीय गोकुल मिशन: स्वदेशी नस्ल की गायों के संरक्षण की एक पहल

कई स्वदेशी नस्लें, जैसे साहीवाल, थारपारकर, कांकरेज या हरियाणा नस्ल, अब भी क्षेत्रीय दायरे तक सिमटी हुई हैं। कुछ नस्लों में संख्या बढ़ी है, लेकिन उनकी आनुवंशिक शुद्धता व गुणवत्तापूर्ण विस्तार अब भी चिंता का विषय है।

2 min read
Google source verification

जयपुर

image

Opinion Desk

Mar 17, 2026

बलवंत राज मेहता - वरिष्ठ पत्रकार एवं स्तंभकार,

स्वदेशी गायों की नस्लों का संरक्षण केवल आस्था या परंपरा का विषय नहीं, बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था, पोषण सुरक्षा और जैव विविधता से जुड़ा गंभीर प्रश्न है। इसी पृष्ठभूमि में केंद्र सरकार की ओर से संशोधित राष्ट्रीय गोकुल मिशन को मंजूरी देना एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। 2021-22 से 2025-26 तक के लिए 3400 करोड़ रुपए के बजट और उसमें 1000 करोड़ रुपए के अतिरिक्त प्रावधान के साथ यह योजना स्वदेशी गोजातीय नस्लों के संरक्षण, संवर्धन और पशुपालकों की आय बढ़ाने का दावा करती है। आंकड़ों के स्तर पर देखें तो पिछले एक दशक में डेयरी क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रगति दिखाई देती है। देश का कुल दूध उत्पादन 63 प्रतिशत से अधिक बढ़ा है और प्रति व्यक्ति दूध उपलब्धता 471 ग्राम प्रतिदिन तक पहुंच चुकी है, जो विश्व औसत से भी बेहतर है। प्रति पशु उत्पादकता में भी करीब 26 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई है। यह संकेत देता है कि पशुपालन क्षेत्र में तकनीक, प्रबंधन और सरकारी योजनाओं का असर पड़ा है।

संशोधित गोकुल मिशन में बछिया पालन केंद्रों की स्थापना और आइवीएफ बछिया खरीद पर ब्याज सब्सिडी जैसी नई पहलें जोड़ी गई हैं। इनका उद्देश्य यह है कि अच्छी नस्ल की मादा पशुओं की संख्या बढ़े और भविष्य की उत्पादकता मजबूत हो। गो चिप, गो सॉर्ट जैसी स्वदेशी तकनीकों का विकास यह दिखाता है कि भारत अब केवल परंपरागत ज्ञान पर नहीं, बल्कि आधुनिक विज्ञान के सहारे स्वदेशी नस्लों को बचाने की कोशिश कर रहा है।

सवाल यह है कि क्या इन उपलब्धियों को सीधे-सीधे स्वदेशी नस्लों की वास्तविक रक्षा की सफलता कहा जा सकता है। यहीं तस्वीर का दूसरा, थोड़ा असहज पहलू सामने आता है। दूध उत्पादन में हुई बढ़ोतरी का बड़ा हिस्सा आज भी क्रॉसब्रीड या उच्च दुग्ध उत्पादन वाली सीमित नस्लों से आ रहा है। कई स्वदेशी नस्लें, जैसे साहीवाल, थारपारकर, कांकरेज या हरियाणा नस्ल, अब भी क्षेत्रीय दायरे तक सिमटी हुई हैं। कुछ नस्लों में संख्या बढ़ी है, लेकिन उनकी आनुवंशिक शुद्धता व गुणवत्तापूर्ण विस्तार अब भी चिंता का विषय है। किसानों की व्यावहारिक मजबूरी भी एक बड़ा कारण है। छोटे और सीमांत किसान तत्काल आय को प्राथमिकता देते हैं। ऐसे में वे ऐसी गाय चुनते हैं जो जल्दी और अधिक दूध दे सके, भले ही वह स्वदेशी नस्ल न हो। पशु रोगों का खतरा भी योजनाओं की सफलता पर भारी पड़ा है। हाल के वर्षों में लंपी स्किन डिजीज जैसी बीमारियों ने हजारों पशुओं को प्रभावित किया और कई इलाकों में दूध उत्पादन घटा।

इससे स्पष्ट होता है कि केवल नस्ल सुधार या प्रजनन तकनीक पर्याप्त नहीं है, पशु स्वास्थ्य सेवाओं, टीकाकरण और आपदा प्रबंधन पर समान रूप से ध्यान देना जरूरी है। यदि योजनाओं का लाभ मुख्यत: संगठित डेयरी या बड़े पशुपालकों तक सीमित रह गया, तो स्वदेशी नस्लों का व्यापक संरक्षण एक अधूरा लक्ष्य ही रहेगा। इस पूरी तस्वीर से यह निष्कर्ष निकलता है कि राष्ट्रीय गोकुल मिशन ने दिशा जरूर दिखाई है और कई ठोस कदम भी उठाए हैं, लेकिन स्वदेशी गायों की नस्लों को लेकर हमारी सफलता अभी आंशिक है। गोकुल मिशन ने उम्मीद जगाई है, पर यह उम्मीद तभी स्थायी बनेगी जब नीति, विज्ञान और किसान की जमीनी हकीकत एक ही दिशा में चलें। स्वदेशी गायों को बचाने की कोशिश जारी है, लेकिन यह कहना अभी जल्दबाजी होगी कि हम इस प्रयास में पूरी तरह कामयाब हो चुके हैं।