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बुद्धः भारत मां के बेजोड, अनोखे व अनूठे मनीषी पुत्र

‘बिहार’ का अर्थ है ‘भिक्षुओं का विहार पथ।’ जहां संन्यासी गुजरते हैं, विचरते हैं, जहां की मिट्टी को वह छूते हैं ऐसा स्थान।वैसे तो बुद्ध का पूरा जीवन व आचरण प्रेरणा से भरा हुआ है किन्तु फिर भी उनके सात संदेश हमारे जीवन को सार्थकता, परमार्थ और दुखविहीनता से भरपूर कर सकते है।

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जसबीर सिंह,
(पूर्व अध्यक्ष राजस्थान अल्पसंख्यक आयोग, व राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष, राष्ट्रीय सुरक्षा जागरण मंच )-
उनके सात सप्तऋषि संदेश जो हमारे जीवन को सार्थक व आभामंडित बना सकते है।प्रकृति के आकाश पर तो एक धु्रवतारा चमकता है किन्तु भारत के आध्यात्मिक आकाश पर अनेक धु्रवतारे चमके हैं जिनमें से प्रत्येक अपने आप में अनोखा है, अद्वितीय है, बेजोड़ है, आकर्षक है और प्रासंगिक है। चाहे मर्यादा पुरूषोत्तम राम हों, चाहे वो त्रिलोकीनाथ कृष्ण, चाहे पतंजलि, चाहे गोरख, चाहे बुद्ध, चाहे महावीर, चाहे गुरू नानक, चाहे कबीर। ये सब भारत की आध्यात्मिक माला के चमकदार मणके हैं। इनमें बुद्ध का स्थान भी बहुत ऊंचा है। यदि बुद्ध के लौकिक पिता शुषोधन की अपने पुत्र को राजगद्दी संभलाने की इच्छा पूर्ण हो जाती तो यह धरती एक महान आध्यात्मिक सम्पदा से वंचित रह जाती। यह माना जाता है कि बुद्ध का जन्म (2565 वर्ष पूर्व), उनको ज्ञान की प्राप्ति व उनका महापरिनिर्वाण, यह तीनों घटनाएं वैशाख की पूर्णिमा के दिन ही हुई थी इसलिए बुद्ध पूर्णिमा को त्रिगुण पावन पर्व के रूप में भी मनाया जाता है। उनका जन्म लुम्बिनी (वर्तमान नेपाल), उनको ज्ञान प्राप्ति बौद्धगया (बिहार) तथा परिनिर्वाण कुशीनगर (उत्तर प्रदेश) में हुआ।

यह कहा जाता है कि बुद्ध के समय दीक्षा ने जो शान देखी वैसा गौरव फिर पृथ्वी पर दोबारा नहीं हो सका। बुद्ध और महावीर के वक्त बिहार ने संन्यास का जो स्वर्ण युग देखा, वह अद्भुत था। कहते हैं जब बुद्ध चलते थे तो हजारों संन्यासी बुद्ध के साथ चलते थे। जिस गांव या कस्बे में बुद्ध ठहर जाते थे उस क्षेत्र की हवाओं का रूख बदल जाता था। हजारों संन्यासी जिस क्षेत्र में ठहर जाएं, वहां बुरे कर्म होने बंद हो जाते थे, कठिन हो जाते थे, मुश्किल हो जाते थे। इतनी शुद्ध धारणाओं से भरे हुए इतने लोग जो होते थे। कथाएं कहती हैं कि बुद्ध जहां से निकल जाते थे वहां चोरियां बंद हो जाती थी, हत्याएं कम हो जाती थी। आज के युग में यह बात कथाओं जैसी लगती है लेकिन शायद यह वास्तव में हुआ होगा। महावीर के साथ भी हजारों भिक्षु और संन्यासी चलते थे। और दोनों करीब-करीब समकालीन थे। पूरा बिहार सन्यास से भर गया। उसको नाम ही बिहार इसलिए मिला। ‘बिहार’ का अर्थ है ‘भिक्षुओं का विहार पथ।’ जहां संन्यासी गुजरते हैं, विचरते हैं, जहां की मिट्टी को वह छूते हैं ऐसा स्थान।वैसे तो बुद्ध का पूरा जीवन व आचरण प्रेरणा से भरा हुआ है किन्तु फिर भी उनके सात संदेश हमारे जीवन को सार्थकता, परमार्थ और दुखविहीनता से भरपूर कर सकते है।

प्रथम योग, ज्ञान व ध्यान हमारे मन व तन को आभा से भर देंगे कहते हैं ज्ञान प्राप्ति के बाद बुद्ध के माथे पर ऐसी स्वर्ण आभा उतर आई थी कि एक बार वह एक गांव से गुजरते थे और उन्हें देखकर एक ग्रामवासी ने पूछा कि क्या आप ईश्वर हैं? उन्होंने कहा नहीं, उसने फिर पूछा कि क्या आप कोई देवता हैं? उन्होंने कहा नहीं। तो उसने पूछा कि तो क्या आप कोई संत हैं? उन्होंने कहा नहीं तो। तो उसने पूछा फिर आप कौन हैं? तब उन्होंने कहा मैं सिर्फ एक चेतना हूं और कुछ भी नहीं। उन्होंने पूरी विनम्रता से कहा कि यदि तुम्हें मुझमें कुछ दिखता है तो वो सिर्फ और सिर्फ मेरे चैतन्य होने का परिणाम है।
द्वितीय, संवेदनशीलता मानव जीवन को सार्थक बनाती हैं बुद्ध प्राणी मात्र और जगत की सारी वनस्पति तक के प्रति इतनी संवेदनशीलता व करूणा से भर गए थे कि कहते हैं, एक बार एक गांव में रात्रि को ठहरने के बाद जब सवेरे उन्होंने प्रस्थान किया तो गांव वालों ने जल से भरा एक जलपात्र यात्रा के लिए उनके साथ किया। अभी उनका समूह पचास कदम ही चला था कि पगडंडी में उगे हुए एक पौधे को देखकर साथ चल रहे संन्यासी से जलपात्र लेकर सारा जल बुद्ध ने उस पौधे में उंडेल दिया। यह देखकर उनके प्रिय शिष्य आनन्द ने आवेश में उनसे पूछा कि यह आपने क्या किया? यात्रा लम्बी है, धूप चिलचिलाती है और हममें से किसी को भी प्यास लग सकती है और आपने सारा जल इस पौधे में ही उंडेल दिया। तो बुद्ध ने कहा आनन्द हममें से तो किसी को प्यास लग सकती थी लेकिन यह पौधा तो अभी प्यास से मरे जा रहा था। ऐसी संवेदना और करूणा से भरे हुए थे बुद्ध। शायद ऐसी संवेदना की पराकाष्ठा से प्रेरित होकर ही 15वीं शताब्दी के सौराष्ट्र के संत नरसिंह मेहता ने वो भजन (जो पूज्य गांधी को भी बहुत प्रिय था) गाया था कि ‘वैष्णव जन तो तेने कहिए जे पीड़ पराई जाने रे।’ उन्होंने एक बार आनन्द को कहा भी ‘यह तो सबको मालूम है कि सबके खून का रंग लाल होता है लेकिन मैं एक बात तुम्हें और कहता हूं कि ‘सबकी आंखांे के आंसू भी खारे होते हैं।’ आज के समाज में उनके कहे हुए वचन कितने प्रासंगिक हैं हम यह समझ सकते हैं।

तृतीय, पर्यावरण की रक्षा व संरक्षण हमारा धर्म है प्रत्येक पेड़ व पौधा हमारे जीवन के लिए उपयोगी है इसलिये प्रकृति के जर्रे-जर्रे व वनस्पति के हर पौधे की उपयोगिता का भी बोध उन्होंने हमें कराया। कहते हैं जब बुद्ध के लिए एक राजवैद्य को नियुक्त किया जाना था तो वैद्यों की योग्यता को परखने के लिए अनेक वैद्यों को कहा गया कि जाओ जंगल में अनुपयोगी पौधों को लेकर आ जाओ। कोई दो, कोई चार, कोई छ व कोई आठ पौधे उखाड़ कर ले आया। जीवक नाम के वैद्य खाली हाथ लौटे और बोले कि मुझे पूरे जंगल में एक भी पौधा ऐसा नहीं मिला जिसका कोई उपयोग न हो। जीवक को ही बुद्ध का वैद्य नियुक्त किया गया। हमारे शास्त्रों में भी कहा गया है ‘अमंत्रं अक्षरं नास्ति, नास्ति मूलं अनोषधम, अयोग्यः पुरूषो नास्ति, योजकस्तत्र दुर्लभः’ अर्थात् ऐसा एक भी अक्षर नहीं जो मंत्र नहीं बन सकता, ऐसा एक भी पौधा नहीं जिससे औषधि नहीं बन सकती, ऐसा एक भी व्यक्ति नहीं जिसमें कोई भी योग्यता न हो लेकिन इनका उपयोग करने वाली कोई पारखी नजर मुश्किल से होती है।

चतुर्थ, सांसारिक कार्य करते हुए भी निर्वाण प्राप्त हो सकता है
चतुर्थ सांसारिक कार्यों या कर्त्तव्यों को करते हुये भी निर्वाण प्राप्त किया जा सकता है। प्रसंग है कि जब बुद्ध को परम ज्ञान प्राप्त हो गया तो उनकी पत्नी यशोधरा उन्हें अपने महल में आग्रहपूर्वक भोजन ग्रहण करने के लिये ले गयी। भोजन के दौरान यशोधरा ने उनसे तीन प्रश्न पूछे। प्रथम, क्या जिस चीज के लिये आपने घर छोड़ा क्या वो आपको मिली? उन्होंने तत्काल कहा हाँ मिली। फिर यशोधरा ने पूछा क्या जो आपको प्राप्त हुआ वो घर तथा जंगल दोनों जगह प्राप्त हो सकता है? उन्होंने जवाब दिया हाँ दोनों जगह प्राप्त हो सकता है। फिर यशोधरा ने तीसरा प्रश्न दागा कि जब यह दोनों जगह घर व जंगल में प्राप्त हो सकता है तो फिर आपको घर छोड़ने की जरूरत ही क्या थी? तब उन्होंने उत्तर दिया जब मुझे जंगल में यह परम ज्ञान प्राप्त हुआ तब मुझे अहसास हुआ अरे यह तो घर में भी प्राप्त हो सकता था।

पंचम, जीवन में जो भी जानो और पाओ उसे मानवता के साथ बांटो भी
बुद्ध ने एक और महत्वपूर्ण संदेश दिया कि सारे पुरूषार्थ व कर्म करते हुए भी, आकांक्षाओं को पूरा करते हुए भी संतोष का भाव रखो व बगैर किसी असमंजस के लक्ष्य निर्धारित करते हुए बढ़ते चलो ‘चरैवेति चरैवेति।’ कहते हैं एक बार उन्होंने अपनी हथेली में मुट्ठी भर पत्ते लिए और अपने संन्यासियों से पूछा ‘ये बताओ कि मेरे हाथ में पत्ते ज्यादा हैं या पूरे जंगल में? स्वाभाविक जवाब मिला जंगल में। बुद्ध बोले बेशक जंगल में ज्यादा हैं लेकिन मेरे हाथ में जितने पत्ते हैं वो दुख को समाप्त करने के लिए आवश्यक ज्ञान का प्रतिनिधित्व करते हैं और अपने दुख को समाप्त करने के लिए इतना ज्ञान ही पा लेना काफी है। जीवन में न तो हम सब कुछ जान सकते हैं और न ही सब कुछ पा सकते हैं। थोड़ा जान लेना और थोड़ा ही पा लेना पर्याप्त है। और उन्होेंने आगे कहा ‘जितना भी जान लो और पा लो उसे अपने तक सीमित मत रखो, बांटते जाओ। ये ही जीवन रूपी इस परम यात्रा का लक्ष्य भी है।

छठा, दूसरे जीव के प्रति करूणा मनुष्यत्व का श्रेष्ठ गुण है
बुद्ध ने अपने पिछले जीवन की कई कहानियों (बोद्ध कथाओं) में से एक में कहा कि वो पूर्वजन्म में एक जंगल में हाथी थे। जंगल में आग लग गई और सारे पशु पक्षी सुरक्षा के लिये इधर-उधर भागने लगे। वह हाथी भी एक वृक्ष के नीचे खड़े हो गया विश्राम के लिये। फिर जैसे ही हाथी ने पैर उठाया वहां से हटने को, एक खरगोश भागा हुआ आया और जो जगह खाली हुई थी पैर उठाने से उस जगह को सुरक्षित मान कर वहां बैठ गया। बुद्ध ने कहा है मेरे (हाथी के) मन में भाव हुआ कि मेरे पैर के नीचे पड़ते ही यह खरगोश विनिष्ट हो जायेगा। और बुद्ध ने कहा कि मैं खड़ा रहा, जब तक कि यह खरगोश हट न जाये क्योंकि मेरे पैर रखते ही तो यह तत्क्षण मर जायेगा। चूंकि खरगोश गया नहीं तो हाथी ने भी पैर नीचे न किया। आग भयंकर हो गयी और हाथी जल कर मर गया। बुद्ध ने कहा है उसी क्षण जब मैंने खरगोश पर करूणा की और मैं पैर को ऊपर रोककर खड़ा रहा उसी क्षण मैंने मनुष्य होने की क्षमता, संभावना और अधिकार अर्जित कर लिये। उस क्षण करूणा के उस आर्विभाव के कारण उस हाथी को बुद्ध के रूप में इस जन्म में मनुष्य योनि प्राप्त हुयी। उनके जीवन की यह बोधकथा दूसरे जीवों के प्रति करूणा के भाव के महत्व को रेखांकित करती है।

सप्तम्, आपके जीवन की सफलता व सार्थकता की कुंजी आपके पास ही है
एक नौजवान ने जब एक बार उनसे पूछा कि जीवन में हमारा सबसे बड़ा मित्र कौन होता है तो उन्होंने कहा हमारा अपने आप में विश्वास ही हमारा सबसे बड़ा मित्र होता है। पूछने वाले ने पूछा फिर हमारा सबसे बड़ा शत्रु कौन होता है तो बुद्ध ने जवाब दिया हमारा अपने आप में विश्वास का न होना ही हमारा सबसे बड़ा शत्रु होता है। जब बुद्ध के शरीर त्यागने का अर्थात् ‘परिनिर्वाण’ का अन्तिम समय आया तो उनके प्रिय शिष्य आनन्द बहुत विलाप करने लगे व बुद्ध से पूछा कि अब मेरा क्या होगा, मुझे कौन मार्गदर्शन देगा? तब बुद्ध ने अपना परम वचन, जो बाद में बौद्ध परम्परा का मूल व शाश्वत सिद्धान्त बना, कहा कि आनन्द ‘‘अप्प द्वीपो भव’’ अर्थात् अपने जीवन के दीपक स्वयं बनो तभी तुम्हारा जीवन आलोकित, प्रकाशित और सुगन्धित होगा। ऐसे महान, सदुपयोगी व प्रासंगिक संदेशों से भरपूर रहा बुद्ध का जीवन। आज जब इस आधुनिक युग में समाज में से करूणा विदा हो रही है, परिवारों में से संस्कार विदा हो रहे हैं, राजनीति में से नीति विदा हो रही है, शब्दों में से शालीनता विदा हो रही है, प्रेम में से पवित्रता विदा हो रही है, और जीवन में से विनम्रता विदा हो रही है ऐसे काल में बुद्ध का जीवन व संदेश हमारे लिए प्रेरक भी है और प्रासंगिक भी।