
दाम में फर्क से प्यारा लागे पड़ोसी
- मनोज पंत, ऊर्जा विशेषज्ञ
तेल के दाम में आग लगी है। लग रहा है कि पेट्रोल-डीजल के दामों पर किसी का कोई नियंत्रण ही नहीं है। पुराने जुमले दोहराए जा रहे हैं कि कच्चे तेल के अंतरराष्ट्रीय दाम में आए उछाल के कारण घरेलू बाजार में भी ईंधन के दाम में तेजी देखने को मिल रही है। घरेलू तेल कंपनियों के लिए जब कच्चा तेल खरीदना महंगा पड़ता है तो वे ईंधन के घरेलू दाम भी बढ़ा देती हैं। कच्चा तेल खरीदने की लागत अधिक होने का कारण इसकी बढ़ी हुई अंतरराष्ट्रीय कीमत के साथ, रुपए के मुकाबले डॉलर का मजबूत होना भी है।
पिछले एक वर्ष में यानी मई 2017 से मई 2018 तक कच्चे तेल के दाम 20 डॉलर बढक़र करीब ८० डॉलर प्रति बैरल हो गए। डॉलर भी एक वर्ष के दौरान चार रुपए तक बढक़र करीब 68.50 रुपए के स्तर को छू गया। बढ़ी हुई लागत के आधार पर घरेलू तेल कंपनियों का बढ़े हुए दाम वसूलना गलत भी तो नहीं कहा जा सकता है। पूर्व में सरकार हस्तक्षेप करके आम आदमी को ईंधन के बढ़ते दामों से राहत दिला पाने में सक्षम थी, लेकिन अब ये कंपनियां सरकारी नियंत्रण से मुक्त हैं। अब तो पेट्रोल-डीजल के दाम बदलते ही रहते हैं। आमतौर पर ये घटते कम, बल्कि बढ़ते ज्यादा हैं।
देश में पेट्रोल की कीमत को लेकर जो वर्ग रोष प्रकट करता है, उसकी खपत तो पांच फीसदी ही है। दाम बढऩे पर शोर इसलिए होता है क्योंकि यह आम आदमी को सीधे तौर पर प्रभावित करता है। पेट्रोल से अधिक खपत डीजल की होती है और इसके दाम बढऩे से आम व्यक्ति परोक्ष रूप से प्रभावित होता है। व्यक्ति प्रत्यक्ष रूप से अधिक प्रभावित होता है या परोक्ष रूप से, इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता। ईंधन चाहे कोई भी हो, महंगा होने पर व्यक्ति का बजट तो बिगाड़ता ही है।
हमे यह तो स्पष्ट रूप से समझ लेना चाहिए कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में ईंधन की कीमतों में तेजी को अपने देश की सरकार रोक नहीं सकती। यह तो अपनी ही गति से चलेगा और अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियां ही इसके दाम पर रोक लगा सकेंगी। भारत के लिए रूस अपने तेल का दाम कम क्यों करेगा? उसकी माली हालत भी तो अच्छी नहीं है। अन्य तेल उत्पादक देशों की तरह उसे भी तो कमाई करनी है। कई देशों के लिए ईंधन, कमाई का प्रमुख स्रोत है। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय दाम के कम होने का केवल इंतजार ही किया जा सकता है।
जहां तक मेरा आकलन है, पांच से छह महीनों में अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल के दाम कुछ कम और स्थिर हो सकते हैं। इसका एक संभावित कारण होगा, अमरीका की ओर से ईरान के तेल पर लगाई पाबंदियों का हटाया जाना। उम्मीद है कि आने वाले दिनों में दोनों देशों के बीच समस्याओं का निपटारा हो जाएगा। इसके अलावा पांच या छह महीनों में तेल उत्पादक अमरीकी कंपनी शैल का उत्पादन भी शुरू हो सकता है। ऐसा समझा जाता है कि कच्चे तेल की अंतरराष्ट्रीय कीमत यदि 60 डॉलर प्रति बैरल से कम हो तो उसके लिए तेल उत्पादन लाभ का सौदा नहीं रह जाता है।
इन सारी बातों का अर्थ है कि जल्द ही बाजार में कच्चे तेल की उपलब्धता बढ़ेगी और दामों में कुछ कमी देखने को मिल सकती है। प्रतिस्पर्धा और कड़ी होने के परिणामस्वरूप यदि गिरावट कुछ ज्यादा भी हो जाए तो ताज्जुब नहीं होना चाहिए। लेकिन, ये सभी परिस्थितियां सरकार के नियंत्रण में नहीं हैं।
तो क्या हमें बैठकर अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल के दाम गिरने का इंतजार करना चाहिए? देश में आमजन परेशानी में हो तो सरकार को इसके उपाय करने ही चाहिए। आमतौर पर हम पेट्रोल-डीजल के दाम बढऩे पर केंद्र सरकार को कोसने लगने हैं। ऐसा इसलिए कि केंद्र सरकार इस पर भारी उत्पाद शुल्क वसूलती है।
हम मानते हैं कि केंद्र सरकार उत्पाद शुल्क में कमी करे तो दाम घट सकते हैं। सवाल यह है कि ऐसा करना पर्याप्त होगा? देश भर के लिए केंद्रीय उत्पाद शुल्क समान है तो विभिन्न राज्यों में पेट्रोल-डीजल के दाम अलग-अलग क्यों हैं। दिल्ली और मुंबई में पेट्रोल के दाम में बड़ा अंतर क्यों है? इस अंतर का कारण समान केंद्रीय उत्पाद शुल्क नहीं, बल्कि राज्यों द्वारा पेट्रोल-डीजल पर वसूला जाने वाला बिक्री कर है।
ईंधन के दाम में कमी के लिए जरूरी है कि इसे वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) के दायरे में लाया जाए। लेकिन इस पर होने वाली मोटी कमाई के कारण राज्य इसके लिए तैयार नहीं होते। ऐसे में केंद्र और राज्य मिलकर अपने-अपने स्तर पर करों को कम करें। राज्यों को चाहिए कि वे पेट्रोल- डीजल पर प्रतिशत की बजाय रुपए प्रति लीटर के आधार पर बिक्री कर वसूलें।
आम नागरिकों की भी इस परिस्थिति से निपटने में अहम भूमिका है। उन्हें चाहिए कि वे निजी वाहनों का इस्तेमाल कम से कम करें। सार्वजनिक वाहनों का उपयोग अधिक हो। जहां मेट्रो रेल चलती हो, वहां मेट्रो रेल का और जहां सार्वजनिक परिवहन के साधन हों, वहां उनका इस्तेमाल हो। इस तरह हम ईंधन की खपत कम करके खुद पर पडऩे वाली मार कम कर सकते हैं।

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