शरीर ही ब्रह्माण्ड : पिता ही पुत्र बनता है

'पिता वै जायते पुत्रो।' पिता ही माता के गर्भ से पुत्र बनकर पैदा होता है। पुत्र तत्त्व रूप में पिता ही है। सात पीढ़ी के २८ सह पिण्डों में सर्वाधिक पन्द्रह सह पिण्ड पिता के होते हैं।

By: Gulab Kothari

Published: 01 May 2021, 07:16 AM IST

- गुलाब कोठारी

एकोऽहं बहुस्याम् रूप ब्रह्म की कामना ही सृष्टि निर्माण का प्रथम हेतु है। माया से घिरकर ब्रह्म भी सृष्टिकाल में मृत्युभाव से युक्त हो जाता है। प्रश्नोपनिषद् में ब्रह्म के तीनों रूप अव्यय, अक्षर और क्षर मत्र्यभाव से युक्त कहे गए हैं।

तिस्रो मात्रा मृत्युमत्य: प्रयुक्ता अन्योण्यसक्ता अनविप्रयुक्ता:। (प्रश्नोपनिषद् ५/६)

ब्रह्म का यह त्रिविध रूप ही पूरी सृष्टि में विद्यमान रहता है। अमृत लोक से आकर ब्रह्म मत्र्य विश्व में प्रविष्ट हो जाता है। जीव रूप को प्राप्त होने वाला यह 'गॉड पार्टिकल' वस्तुत: पंचाग्नियों* के माध्यम से पंचभूतात्मक (पृथ्वी, जल, तेज, वायु, आकाश से बना) देह को धारण करता है। जीव पंचाग्नियों से गुजरता हुआ स्थूल देह में प्रवेश करता है। इसी बीच प्रत्येक लोक में जीव के साथ कुछ न कुछ जुड़ता जाता है, जो जीव की प्रतिसंचर (वापसी) यात्रा में उसी लोक में छूटता जाएगा। कहीं पितरों के अंश, कहीं प्रकृति के त्रिगुण (सत-रज-तम) तो कहीं कर्म-वीर्य (वर्ण)।

अग्नि और सोम इस सृष्टि-यज्ञ का आधार हैं। स्वयंभू का अग्नि तथा परमेष्ठी के सोम से इस यज्ञ का आरंभ द्युलोक में होता है। परमेष्ठी के ब्रह्मणस्पति सोम की सावित्राग्नि (सूर्य की अग्नि) में आहुति होती है। इससे स्नेहनयुक्त सोम राजा बनते हैं। कितना महत्वपूर्ण वैज्ञानिक भाव है यह। सोम आहूत होकर मिट जाता है, शेष अग्नि रहता है। इसको ही अर्थ सृष्टि कहते हैं। महत्वपूर्ण बात यह है कि इस अग्नि के भीतर जो सोम प्रवाहित होता है, वही अर्थ पिण्ड का निर्माण करता है और वही उस पिण्ड का सोम-शुक्र भी बन जाता है। वही नई सृष्टि का बीज बनता है, क्योंकि यह सोम स्नेहन से युक्त होता है। स्नेहन भाव से ही सृष्टि होती है। हम किसी भी प्रकार के बीज की यात्रा का अध्ययन कर लें, निष्कर्ष एक ही है। उसकी उत्पत्ति अपने पिता से ही होती है। हर बीज के पिता के पीछे भी उसका पिता ही मिलेगा। अन्तिम पिता सूर्य पर प्रतिष्ठित नजर आएगा। सूर्य ही जगत् का पिता है। वही सबका आत्मा बनकर बैठा है। वही सृष्टि का प्रथम षोडशी पुरुष है। 'सूर्य आत्मा जगतस्थुषश्च।'

इसका एक अन्य अर्थ यह भी निकलता है कि 'पिता वै जायते पुत्रो।' पिता ही माता के गर्भ से पुत्र बनकर पैदा होता है। पुत्र तत्त्व रूप में पिता ही है। सात पीढ़ी के २८ सह पिण्डों में सर्वाधिक पन्द्रह सह पिण्ड पिता के होते हैं। समझ में ये आ जाना चाहिए कि न कोई पिता है, न कोई पुत्र है। एक ही आत्मा भिन्न-भिन्न शरीरों से गुजरता हुआ सृष्टि क्रम में आगे बढ़ता जाता है। माता-पिता मार्ग उपलब्ध कराते हैं। पैदा नहीं करते। ब्रह्म अपनी माया शक्ति के योग से सर्वत्र व्याप्त है। एक ही आत्मा जड़-चेतन सभी में है। भीतर सब एक ही के अंश हैं। यही वसुधैव कुटुम्बकम् की अवधारणा है।

सूर्याग्नि में आहूत यही सोम रश्मि रूप लेता है। जिसमें अग्नि है, सोम है, जल है, प्रकाश है, ताप है। यहां जल को मरीचि कहते हैं। सूर्य के प्रकाश को इन्द्र कहते हैं। इन्द्र का वाहन ऐरावत हाथी है, जिसके सात 'सूंडें' होती है। उसका प्रसार सात लोकों तक होता है। साथ ही सातों लोकों से रश्मियां जल लेकर लौटती भी हैं। सोम के सूर्य में आहूत होने के बाद जल मृत्यु लोक की ओर गमन करता है। मेघ रूप लेता है। मेघ सोम संग्राहक होता है। वर्षा सोम है। पृथ्वी की अग्नि में यह वर्षा जल आहूत होता है। इस जल में सृष्टि के शुक्र रहते हैं। परमेष्ठी लोक के पितर प्राण महद् लोक में जीव के साथ जुड़ते हैं। सूर्य में बीज रूप में प्रतिष्ठित होते जाते हैं। सूर्य, अक्षर सृष्टि का स्वामी बनता हुआ ब्रह्माण्ड का अक्षर-रूप हृदय भी है। जो सोम सूर्य का पोषण करता है, वही सूर्य का शुक्र भी बन जाता है। पर्जन्य (मेघ) का निर्माण करता है। इसी क्रम में मेघ भी आगे (पृथ्वी पर) निर्माण के लिए सोम-शुक्र (जल) उपलब्ध कराता है। हर स्तर पर देख सकते हैं कि सोम ही अग्नि में आहूत होकर अग्नि रूप सृष्टि का निर्माण करता है। सोम ही पुन: अग्नि का शुक्र (सोम) बन जाता है।

वर्षा का जल कहने को तो ऊपर, मिट्टी पर आहूत होता है, किन्तु वास्तव में पृथ्वी की भी मूल योनि महद् लोक (आभ्यान्तर) ही है। बीज को भी हम गड्ढा खोदकर भीतर प्रतिष्ठित करते हैं। पृथ्वी पर वर्षा से गर्भधारण होता है। यही जल शनै: शनै: सातों लोकों तक पहुंचता है। मह:लोक में प्राणियों-वनस्पति-औषधियों के तन की नींव पड़ती है। बिना जल के सृष्टि नहीं होती। पृथ्वी का जनक जल ही है। पृथ्वी प्रसव करती है। जब ये सब वनस्पति-औषधि पकने की स्थिति में आते हैं-इनमें जीव पड़ता है। हमारा किसान 'जीव पडऩे' से पहले फसल को नहीं काटेगा। शुरू के तीन माह में स्त्री का भी गर्भपात होता है तो उसे अपूर्ण जीव शून्य मानकर जलाया नहीं जाता। जमीन में गाड़ दिया जाता है।

जल वर्षा से अन्न पैदा हुआ। छोटे-छोटे प्राणी भी पैदा होते हैं। अन्न अनेक प्रकार का होता है। अनेक पशु घास ही खाते हैं। कुछ मांसाहारी होते हैं। पक्षी (तिर्यक) तथा मनुष्य अनाज खाते हैं। कुछ पक्षी और मनुष्य भी मांसाहारी होते हैं। शास्त्र कहते हैं-'जीवो जीवस्य भोजनम्।' मुंह में अन्न का अरणी-मन्थन होता है। रसना (जीभ) के जल तत्त्व (लार) के साथ अन्न आगे गति करता है। जठराग्नि में पहुंचने पर अन्न में अन्त:स्रावी ग्रन्थियों के रस मिलते हैं, जो व्यक्ति के तीनों गुणों (स्वभाव) पर आधारित होते हैं। यही मह:लोक है। अन्न से रस बनता है। शेष अन्न मल रूप में शरीर छोड़ देता है। अन्न के रस से शरीर के अन्य धातु-रक्त, मांस, वसा, अस्थि, मज्जा और शुक्र बनते हैं। शरीर निर्माण में पृथ्वी का अंश जो अन्न का मुख्य भाग है, उपयोगी होता है। जल से (गर्भस्थ) शरीर (पृथ्वी) का निर्माण होता है। अत: शरीर की एक संज्ञा पृथ्वी (मिट्टी) है।

अन्न शरीर के सातों लोकों का निर्माण करता हुआ अन्त में अगली पीढ़ी के बीज शुक्र में एकत्रित करता रहता है। अन्न रूप सोम ही अग्नि रूप शरीर का निर्माण करता हुआ पुन: सोम रूप शुक्र बन जाता है। जीव इसी शुक्र में शुक्राणु के रूप में संग्रहित भी होता है और सुरक्षित भी रहता है (फ्रिज जैसे)। शुक्र का स्वरूप ही बीज के अनेक तथ्य स्पष्ट करता है। शुक्र सोम है, किन्तु शुक्राणुओं का शरीर अग्नि रूप है। अत: शुक्र एक शुद्ध द्रव्य रूप है, जो जीव का संरक्षक भी है और आवश्यकता पडऩे पर जीव को स्त्री के मह:लोक तक पहुंचाने का माध्यम भी बनेगा। प्रत्येक स्तर पर सोम रूप जीव महत् लोक में ही बीज रूप में आहूत होता है। बीज ही ब्रह्म है।

मम योनिर्महद् ब्रह्म तस्मिन्गर्भं दधाम्यहम् ।
सम्भव:सर्वभूतानां ततो भवति भारत।। गीता १४.३

शुक्राणु में पूर्वजों के अंश, पिता के वीर्य (ब्रह्म-क्षत्र-विट्) भी जुड़ते हैं। मातरिश्वा वायु इसे स्त्री भ्रूण (डिम्ब) तक ले जाता है। शुक्र वहां स्त्रीभ्रण में आहूत हो जाता है। यही मह:लोक है। शुक्राणु को पुंभ्रूण भी कहते हैं। डिम्ब में बुद्बुद् रूप में निर्माण आगे बढ़ता है। जैसा कि जल में होता है। जल भी सात स्तरों तक जाकर मिट्टी (शरीर) बनता हुआ स्वर्ण बन जाता है। उसी प्रकार गर्भस्थ यह बुद्बुद् सात स्तर पर (मिट्टी) शरीर बन जाता है।

एक महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि शुक्राणु का शुक्र क्या वह 'गॉड पार्टिकल' नहीं है, जिसको आज का वैज्ञानिक ढूंढ रहा है? ब्रह्म उसी अणु का नाम है। प्रत्येक शुक्र में वही प्रतिष्ठित रहता है। पेड़ के बीज का शुक्र भी वही होगा। जलचर, थलचर, नभचर सभी के केन्द्र-मूल में यही ब्रह्म (बीज) है।

क्रमश:

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