विज्ञान वार्ता : ब्रह्म की यात्रा

गीता में सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड को एक इकाई कहा गया है। यह ब्रह्माण्ड एक वृक्ष है। प्रत्येक प्राणी इसका पत्ता है। पेड़ बीज से आता है। वह बीज ब्रह्म है। प्रत्येक बीज में, हर प्राणी में ब्रह्म ही केन्द्र में प्रतिष्ठित है।

By: Gulab Kothari

Published: 12 Dec 2020, 08:07 AM IST

- गुलाब कोठारी

गीता विश्व का एकमात्र शास्त्र है जो व्यक्ति को आधार बनाकर पूरी सृष्टि के लिए रचा गया है। इसकी मूल अवधारणा है-'वसुधैव कुटुम्बकम्' अर्थात् पूरी धरती ही एक परिवार है और इस धरती पर रहने वाले सभी मनुष्य, पशु-पक्षी, वनस्पति एक ही परिवार का हिस्सा हैं।

गीता में सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड को एक इकाई कहा गया है। यह ब्रह्माण्ड एक वृक्ष है। प्रत्येक प्राणी इसका पत्ता है। पेड़ बीज से आता है। वह बीज ब्रह्म है। प्रत्येक बीज में, हर प्राणी में ब्रह्म ही केन्द्र में प्रतिष्ठित है। कृष्ण कहते हैं-'ममैवांशो जीवलोके' सभी मेरे अंश हैं। इसलिए तुम भी ब्रह्म हो क्योंकि तुम भी मैं ही हूं। यह भी कहा जाता है-'अहं ब्रह्मास्मि'-मैं ब्रह्म हूं। 'तत्वमसि' यानी वह तुम ही हो। जैसे ही व्यक्ति को अपने स्वरूप का ज्ञान होता है, उसे सृष्टि के सभी प्राणियों का स्वरूप भी दिखाई देने लगता है। सारे प्राणी एक ही पेड़ के पत्ते नजर आते हैं। प्रत्येक पत्ता पूर्ण है। जब तक पेड़ है, पत्ता भी सुरक्षित है। कृष्ण ही सारा नाम-रूप-जगत् हैं। आप भी, मैं भी, सब कृष्ण हैं। यही पूर्णता का अर्थ है-

'पूर्णमद: पूर्णमिदं पूर्णात् पूर्ण मुद्च्यते।
पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्ण मेवा वशिष्यते॥'

गीता पूर्णता की गाथा है।

गीता में व्यष्टि और समष्टि साथ ही रहते हैं। सृष्टि में ब्रह्म से व्यक्ति का निर्माण तथा व्यक्ति का पुन: ब्रह्म में लीन हो जाना ही ब्रह्म की यात्रा है। यही पूर्णता है। इसमें माया वाहन के रूप में कार्यरत है। विज्ञान में मैटर और एनर्जी हैं, नष्ट नहीं होते हैं। एक-दूसरे में बदलते रहते हैं। वेद में इन्हीं को क्रमश: माया और ब्रह्म कहा जाता है। ब्रह्म और माया सदैव साथ रहते हैं यानी अविनाभाव हैं। ब्रह्म को रस और माया को बल भी कहा जाता है। जब हम अपनी बुद्धि से रस और बल को अलग करके केवल विशुद्ध रस को जानने का प्रयत्न करें तब वह रस निर्विशेष कहा जाता है। ब्रह्म 'एकोहं बहुस्याम' की कामना करता है तो अनन्त बल रस को आवरित कर पुर का निर्माण करते हैं। रहने के स्थान को पुर कहते हैं। इस पुर में निवास करने वाला पुरुष कहा जाता है। अत: माया द्वारा ब्रह्म को घेरने, आवरित करने से जिस प्रथम पुरुष का आविर्भाव हुआ, वही अव्यय पुरुष कहलाता है। उससे भी असीम ब्रह्म का स्वरूप परात्पर कहा जाता है।

सृष्टि रचना की प्रक्रिया में अव्यय पुरुष से ही अक्षर पुरुष और क्षर पुरुष यानी स्थूल रूप बनते हैं। यह सृष्टि सप्तलोकों में क्रमश: सूक्ष्म अवस्था से स्थूल अवस्था में निर्मित हो जाती है। हमारे जीवन में नर-नारी ब्रह्म और माया का विवर्त रूप, यानी रूपान्तरण है। इसका अर्थ यह हुआ कि माया ही ब्रह्म के मन में एकोहम् बहुस्याम रूपी सृष्टि की कामना पैदा करती है। सृष्टि का विस्तार करती है। शरीर पैदा करती है। बाल-युवा-वृद्ध रूप के बाद मृत्यु का चक्र चलाती है। मनुष्य और सृष्टि का यह चक्र समान ही है। माया ही मन में पुन: मोक्षभाव पैदा करती है। अन्त में वह स्वयं ही अव्यय पुरुष का अन्तिम आवरण हटाकर 'परात्पर' को मुक्त करके ब्रह्म में प्रतिष्ठित कर देती है। जो जहां से निकलता है, वहीं जाकर मिलता है।

कृष्ण और अर्जुन के संवाद रूप में गीता ब्रह्म और माया की विवेचना है। माया ही मन में कामना पैदा करती है। कामना ही कर्म का आधार है। माया ने ब्रह्म की कामना को देवता, असुर, गन्धर्व, मनुष्य, पशु-पक्षी-वनस्पति आदि जीवों के विभिन्न स्वरूपों में बिखेर दिया। ८४ लाख योनियों की सृष्टि कर दी। देवताओं से तीन गुणा असुर बना दिए। असुरों को देवों से बलवान बना दिया। जब देवता तैंतीस और असुर निन्यानवे होते हैं। इस अवस्था में धर्म पर संकट तो सदा ही बने रहेंगे। कोई क्षण इस स्थिति से बाहर नहीं होता। वैसे भी कलियुग की तो दिशा भी सतयुग से विपरीत होती है। आसुरी प्रवृत्तियां चरम पर होती हैं। चारों ओर तामसी गतिविधियां, अधर्म और अहंकार का ताण्डव दिखाई देता है। दिव्यता का तो चतुर्मास ही कहना चाहिए, कलियुग में देव स्वयं सो जाते हैं। सत्कार्य भी परम्परा रूप में, मिथ्याभाव में ही रहते हैं। लक्ष्मी जीवन में जड़ता को व्याप्त कर देती है। हर मनुष्य कभी मानव, कभी दानव बन जाता है। वह सब कर्मों में अपना ही स्वार्थ देखता है। ज्ञान का आकर्षण बहुत ही कम हो जाता है। जानने वाला ज्ञाता लुप्त हो जाता है। बाहरी चकाचौंध के आगे आभ्यन्तर की, अपने भीतर की चर्चा ही छूट गई है। वर्तमान परिदृश्य में कर्म और कामना का ज्ञान से सम्बन्ध ही नहीं रहा। कर्म दिशाहीन होने लगा। चारों ओर अभावग्रस्त मानसिकता का ही साम्राज्य दिखाई पड़ता है। ऐसी अवस्था में 'यदा यदा हि धर्मस्य' अपने वचन के अनुसार कृष्ण अवतरित होने चाहिए।

कृष्ण यह कह भी रहे हैं कि साधुजनों के उद्धार और पापियों के विनाश के लिए मैं हर युग में आता हूं। गीता का लक्ष्य यही है। मानव जीवन की सार्थकता भी यही है। व्यक्ति अपने कर्म को, अपने उत्तरदायित्व को भली प्रकार करने योग्य बने। माया ने ही ब्रह्म को आवरित किया हुआ है। कृष्ण बता रहे हैं कि 'नाहं प्रकाश: सर्वस्य योगमाया समावृत:।' मैं तो योगमाया के आवरण में कैद हूं। आवरण का हटना ही मुक्ति है। यही मेरा परित्राण होगा। यही तुम्हारा भी शाश्वत स्वरूप होगा। 'ईश्वर: सर्वभूतानां हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति'।

इस विवेचना में एक प्रश्न मन में उठना स्वाभाविक है कि यदि मैंने अपने स्वरूप को जान भी लिया तो जीवन में मेरे लिए इसका उपयोग क्या? क्या शान्ति से जीना मानव का जीवन प्राप्त करने का उद्देश्य है? क्या कामना मुक्त हो जाना ही मोक्ष है? नहीं! सृष्टि का अर्थ इतना संकुचित नहीं है। कृष्ण के जीवन को उदाहरण रूप में देखें, राम को देखें।

कभी-कभी रोग अवयवों की क्षमता से अधिक शक्तिशाली होता है, आसुरी शक्तियों जैसे। तब डॉक्टर की आवश्यकता पड़ती है। 'यदा यदा हि धर्मस्यग्लानिर्भवति भारत:' का भी मन्तव्य यही है। कृष्ण ही डॉक्टर बनकर अवतरित होते हैं। साधुओं की रक्षा और असुरों का विनाश करते हैं। राम और लक्ष्मण को महर्षि वशिष्ठ ने दशरथ से क्यों मांगा था? साधुओं और ऋषियों की रक्षा के लिए। असुर उनके यज्ञ कर्मों में विघ्न डालते थे। अन्त में राक्षसराज रावण को समूल नष्ट किया। कृष्ण ने तो बालपन से ही असुरों का वध करना शुरू कर दिया था। कंस, जरासंध और शिशुपाल जैसे आततायियों से पृथ्वी को मुक्त किया। सत्य के संघर्ष में धर्म का साथ ही नहीं दिया, वरन् स्वयं सारथी बनकर मार्गदर्शन किया। धर्म की विजय के सूत्रधार बने।

कृष्ण गीता में कह रहे हैं-'परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम'। राम और कृष्ण ने अवतार रूप में ये दोनों कार्य नहीं किए? गीता को भीतर झांककर पढ़ें। 'मैं ही ब्रह्म हूं, सबके हृदय में बैठा हूं'। इसको जानने के लिए प्रयास की क्या आवश्यकता है, बस बोध होना चाहिए। कृष्ण के शब्दों में श्रद्धा होनी चाहिए। आपको ज्ञान हो जाएगा कि आप भी ब्रह्म का अंश हैं-ममैवांशो जीवलोके। माया के इस बन्धन से छूटना है, तो अपने शक्तिमान स्वरूप को समझना पड़ेगा। तभी शक्ति पर नियंत्रण करना संभव होगा। इसके अभाव में पुन: विष्णु की नाभि तक पहुंचना संभव कैसे होगा!

इसका एक सीधा सा अर्थ यह भी है कि व्यक्ति जैसे ही भीतर के पुरुष को पहचान ले, उसे अवतार की भूमिका में आ जाना चाहिए। कृष्ण की उद्घोषणा पर अमल शुरू कर देना चाहिए। प्रत्येक प्राणी में अब उसे वही प्राण स्वरूप आत्मा दिखाई देना चाहिए, जो स्वयं के भीतर देख रहा है। दुष्टता के प्रति संघर्ष शुरू हो जाना चाहिए। उन पर विजय प्राप्त कर उन्हें भी सन्मार्ग पर लाने का प्रयास करना चाहिए। भीतर ब्रह्म रूप और बाहर अपने मानव स्वरूप में स्थिर रहकर 'ऊँ तत् सत्' के स्वरूप को प्रतिष्ठित करना चाहिए। अर्थात् जो परम सत्य है, जो आत्मा है, ब्रह्म है, वह मैं हूं।

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