विज्ञान वार्ता - शरीर मैं नहीं, मेरा है

धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे... गीता का यह वाक्य आध्यात्मिक भाव की व्याख्या करता है। यहां वर्णित कुरुक्षेत्रे वस्तुत: मानव देह ही है। यह धर्म का क्षेत्र है क्योंकि इसका मूल कारण ब्रह्म है। यह शरीर युद्धक्षेत्र रूप में परिणत हो जाता है।

By: Gulab Kothari

Updated: 19 Dec 2020, 08:33 AM IST

- गुलाब कोठारी

धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे समवेता युयुत्सव:
मामका: पाण्डवाश्चैव किमकुर्वत सञ्जय।

गीता के प्रथम श्लोक में धृतराष्ट्र संजय से युद्धक्षेत्र के विषय में पूछते हैं। धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे... गीता का यह वाक्य आध्यात्मिक भाव की व्याख्या करता है। यहां वर्णित कुरुक्षेत्रे वस्तुत: मानव देह ही है। यह धर्म का क्षेत्र है क्योंकि इसका मूल कारण ब्रह्म है। यह शरीर युद्धक्षेत्र रूप में परिणत हो जाता है। इसमें निरन्तर देवासुर संग्राम चलते रहते हैं-'द्वौ भूतसर्गौ लोकेऽस्मिन्दैव आसुर एव च' (गीता १६/६)। इसका कारण सत्त्व-रजस् और तमस् तीन गुण हैं। इन तीन गुणों के कारण ही सृष्टि में विविधता देखी जाती है। कृष्ण कहते हैं कि प्रकृति से उत्पन्न तीनों गुणों के वशीभूत होकर ही मनुष्य कर्म करता है। वह क्षणमात्र भी कर्म किए बिना नहीं रह सकता। इन्हीं के प्रभाव से सात्त्विक-राजसिक और तामसिक-तीन प्रकार के स्वभाव बनते हैं। यह शरीर जीवन यात्रा के लिए निमित्त मात्र हैं। शरीर के भीतर विद्यमान आत्मा शाश्वत है। कृष्ण भी कहते हैं कि-

'इदं शरीरं कौन्तेय क्षेत्रमित्यभिधीयते।
एतद्यो वेति तं प्राहु: क्षेत्रज्ञ इति तद्विद: ॥' (गीता १३/१)

हे अर्जुन! यह शरीर क्षेत्र कहा जाता है। इसको जो जानता है वह क्षेत्रज्ञ कहा जाता है।

यह क्षेत्र यानी शरीर जड़ है, स्थूल है। क्षेत्रज्ञ चेतन है, सूक्ष्म रूप है। यह शरीर नश्वर है। क्षरणशील होने से क्षर कहलाता है। गीता के प्रथम अध्याय में अर्जुन युद्ध से विमुख होने की बात कहता है। वह अपने राज्य सुखभोग के लिए कौरव पक्ष को नहीं मारना चाहता।

'न काङ् क्षे विजयं कृष्ण न च राज्य सुखानि च।
किं नो राज्येन गोविन्दं किं भोगेर्जीवितेन वा ॥' (गीता १/३२)

यहां कृष्ण अर्जुन को कहते हैं कि तू नश्वर देह के प्रति शोक कर रहा है । ऐसा नहीं है कि किसी काल में मैं नहीं था, तू नहीं था अथवा ये अन्य समस्त जन नहीं थे।

'अशोच्यानन्वशोचस्त्वं प्रज्ञावादांश्च भाषसे।
गतासूनगतासूश्च नानुशोचन्ति पण्डिता: ॥' (गीता २/११)

वस्तुत: क्षेत्र यानी प्राणधारियों की यह स्थूल देह सूक्ष्म शरीर व कारण शरीर के साथ संयुक्त होकर प्राणवान कहलाती है। प्राण नहीं होने पर यह मृत होती है। शरीर हमारे अस्तित्व का, हमारे होने का बोध कराता है। यह हमारी चेतना का वाहक है। मन का, हमारे प्राणों का वाहक है। शरीर हमारी अभिव्यक्ति का भी माध्यम है। लेकिन क्या वास्तव में यह शरीर ही 'हम' या 'मैं' है। शरीर तो हमारा है, मेरा है किन्तु 'हम' या 'मैं' कुछ और ही है। इसका प्रमाण इसी बात में मिल जाता है कि शरीर में श्वास चलता है, धड़कन चलती है, सपने आते हैं। और भी कई कार्यकलाप ऐसे चलते हैं जिस पर हमारा वश नहीं। अपने आप चल रहा है यह सब। लेकिन क्यों, इसका उत्तर हमारे पास नहीं। कब तक चलेगा, यह भी नहीं जानते। क्षेत्र की अवधारणा में स्थूल-सूक्ष्म एवं कारण इन तीन शरीरों को समझना आवश्यक है।

हम जिस शरीर को जानते हैं। वह इन तीनों शरीरों का समन्वित रूप है। हमारा बाह्य स्वरूप स्थूल शरीर है। इसको संचालित करने वाले सूक्ष्म और कारण शरीर हैं। क्षेत्र के स्वरूप को बताते हुए कृष्ण कहते हैं-'पांच महाभूत (पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश), अहंकार, बुद्धि, (सत्त्व, रज और तम से बनी) प्रकृति, ज्ञानेन्द्रियां (आंख, नाक, कान, जिह्वा और त्वचा), कर्मेन्द्रियां (हाथ, पैर, मुख, मूत्रद्वार, मलद्वार), मन, पांच इन्द्रियों के विषय (शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गंध), इच्छा, द्वेष, सुख-दु:ख, स्थूल शरीर, चेतना और धृति यानी धैर्य-इस प्रकार विकारों सहित यह क्षेत्र का संक्षिप्त स्वरूप है।' इसमें होने वाले परिवर्तन विकार कहलाते हैं। ये सभी शरीर की बाहर-भीतर की संरचना, कार्य और विषय हैं। स्थूल शरीर के कार्यकलापों को संचालित करने वाला सूक्ष्म शरीर प्राण रूप में सर्वाधिक और सदैव कार्यशील रहता है। निद्रा के समय शरीर कार्यरत नहीं रहता। लेकिन भीतर प्राण काम करते रहते हैं। हृदय लगातार धड़कता है और शरीर में रक्त प्रवाह चलता रहता है। सांस भी निरन्तर जारी रहती है। निद्रा में सपने भी दिखते हैं। यानी मस्तिष्क नींद की अवस्था में भी कार्यशील रहता है। यह सब प्राणों का, सूक्ष्म शरीर का कार्य है। यह कार्य रुके तो कहा जाता है कि प्राण निकल गए। सौरमण्डल और आसपास के वातावरण से ऊर्जा (भोजन, जल, वायु आदि के माध्यम से) ग्रहण करना, उसे शरीर के उपयोग की विभिन्न श्रेणियों में परिवर्तित करना और शरीर में वितरण करना सूक्ष्म शरीर का कार्य है। हमारे भौतिक अथवा स्थूल कार्यों के अनुभवों को आत्मा तक पहुंचाना और आत्मा के संचित संस्कारों को शरीर के माध्यम से अभिव्यक्त करना सूक्ष्म शरीर का कार्य है। सूक्ष्म शरीर प्राणमय-मनोमय तथा विज्ञानमय कोशों से बनता है। अनुगीता में कहा गया है कि नाक, आंख, जिह्वा, त्वचा, कान, मन तथा बुद्धि-ये सात होता हैं, जो एक-दूसरे से जुड़े रहते हैं। किन्तु सूक्ष्म शरीर में रहने के कारण एक-दूसरे को नहीं देखते।

'घ्राणं चक्षुश्च जिह्वा च त्वक् श्रोत्रं चैव पञ्चमम्।
मनो बुद्धिश्च सप्तैते होतार: पृथगाश्रिता:।
सूक्ष्मेऽवकाशे तिष्ठन्तो न पश्यन्तीतरेतराम् ॥'
(अनुगीता २२/२-३)

कारण शरीर जीवात्मा को कहते हैं। यह ब्रह्म का अंश होने से आनंदमय है। इसके नवीन शरीर को धारण करने में पूर्व जन्मों के फल हैं, जिनके कारण यह सुख-दु:ख का भागी बनता है। अत: कारण शरीर हमारे अस्तित्व बोध, अहम् या मैं का आधार है। इसीलिए स्थूल देह को 'हमारा शरीर' कह देते हैं। लेकिन स्थूल शरीर को 'मैं' नहीं कहा जा सकता है। इस स्थूल तथा कारण के बीच हमारा सूक्ष्म शरीर सेतु का कार्य करता है।

कृष्ण कहते हैं-'सभी क्षेत्रों में मुझे क्षेत्रज्ञ समझो। क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ का जो ज्ञान है वह मेरा ही ज्ञान माना गया है।' इसका मतलब यह है कि क्षेत्र रूपी शरीर अनन्त हैं। उन सभी शरीरों में क्षेत्रज्ञ (अर्थात् जीवात्मा ब्रह्म) बनकर केवल एक ही ईश्वर विद्यमान है। हर देह में स्थित चैतन्य को कृष्ण ने अपना ही रूप बताया है। तब प्रत्येक प्राणी ही ईश्वर का, ब्रह्म का रूप है।

हमारा शरीर पार्थिव है, पृथ्वी से जुड़ा है। पंचपाश या पंचक्लेश में बंधा होने से पशु कहलाता है। ये पांच पाश या बन्धन हैं-अज्ञान, अस्मिता, राग, द्वेष और अभिनिवेश। ये अविद्या कहे जाते हैं। यही अज्ञान है। अज्ञान से घिरे जीव अपने ईश्वरत्व को भूल जाते हैं। सभी प्राणी अपने शरीर को ही आत्मा समझते हैं। प्रत्येक कार्य का कर्ता भी शरीर को मानते हैं। वास्तव में सभी क्रियाओं का कर्ता और उसका फल भोगने वाला भोक्ता शरीर नहीं बल्कि चेतन अथवा चिदाभास आत्मा है। स्थूल शरीर कर्मफल भोगने का साधन मात्र है। अस्तित्त्व तो सूक्ष्म और कारण शरीर ही है।

'कार्यकरणकर्तृत्वे हेतु: प्रकृतिरुच्यते।
पुरुष: सुखदु:खानां भोक्तृत्वे हेतुरुच्यते ॥' (गीता १३/२०)

स्थूल शरीर जीवन यात्रा का वाहन है। यह शरीर 'मैं' नहीं हूं जबकि सारी दुनिया इस शरीर में ही उलझी हुई है। कबीर की परम्परा का यह भजन इस बात को बखूबी कहता है-'मत कर काया को गुमान-झूठी माया को गुमान, काया थारी गार सूं काची।' अर्थात् इस देह का अहंकार मत कर क्योंकि देह तो मिट्टी से अधिक अस्थिर यानी मरणशील है।

अध्यात्म की दृष्टि से हमारे चार धरातल हैं-शरीर, मन, बुद्धि और आत्मा। इन चारों के सम्मिश्रण से ही हमारा व्यक्तित्व बनता है। इनमें शरीर ही मन, बुद्धि और आत्मा का आयतन अर्थात् घर है। इन्द्रियों के माध्यम से किसी विषय का स्पर्श होता है। ये विषय इन्द्रियों द्वारा मन तक पहुंचते हैं। मन के द्वारा बुद्धि तक और बुद्धि के द्वारा आत्मा तक पहुंचते हैं। विषयों को ग्रहण करके आत्मा जो भी निर्णय देता है, शरीर उसी के अनुरूप क्रिया करता है, कर्म करता है। यह सारी जीवन संचालन प्रक्रिया त्रिगुणात्मक प्रकृति यानी सत्व, रज और तम पर आधारित होती है। जन्म-मृत्यु और फिर पुनर्जन्म का आधार भी यही है। प्रकृति को ही स्वभाव कहते हैं। इसी आधार पर इन्द्रियों द्वारा विषय का चयन और फिर तदनुरूप क्रिया भी होती है। कर्म के फल भी सतोगुणी, रजोगुणी अथवा तमोगुणी रूप में होते हैं। ये संस्कार बनकर आत्मा पर भी अपना प्रभाव छोड़ते हैं। कारण शरीर में ये ही अविद्या या विद्या (धर्म-ज्ञान-वैराग्य-ऐश्वर्य) के रूप में संचित होते हैं। अविद्या के ये आवरण क्षेत्रज्ञ स्वरूप को, आत्मा को, ईश्वरत्व को, ब्रह्म रूप को आवरित करते हैं। इसीलिए हम अपने मूल स्वरूप को भूल बैठते हैं।

हमारे जीवन दर्शन का लक्ष्य है-आत्मा की अनुभूति करना। स्थूल और सूक्ष्म शरीर का उपयोग आत्मदर्शन में करना। जो व्यक्ति शरीर को ही आत्मा समझ बैठता है उसे काम-क्रोध, राग-द्वेष, जन्म-मृत्यु जैसे विषयों के हर्ष और शोक आदि अवश्य होते हैं। किन्तु जो देह से आत्मा की भिन्नता अनुभव कर लेता है, उसे इन बातों का अनुभव नहीं होता। अविद्या से उत्पादित बुढ़ापे-मृत्यु आदि का आत्मा से कोई सम्बन्ध नहीं। उसी प्रकार सुख-दु:ख आदि का भी आत्मा से कोई सम्बन्ध नहीं है। क्योंकि दोनों ही अविद्या कृत हैं। आत्मा की यथार्थता का ज्ञान हो जाने पर भेद बुद्धि समाप्त हो जाती है। जब भेद बुद्धि ही नहीं रहे तो कृष्ण से अर्जुन अलग ही नहीं है।

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