
'एवर गिवन' संकट से क्या सबक लें हम
ईशान थरूर (स्तम्भकार, टुडेज वल्र्डव्यू न्यूजलेटर और स्तम्भ के लेखक)
बीते सप्ताह मंगलवार यानी 23 मार्च को स्वेज नहर में एफिल टॉवर की ऊंचाई से भी लंबे मालवाहक जहाज 'एवर गिवन' के फंसने से पैदा हुआ संकट इस सप्ताह सोमवार को भले ही खत्म हो गया हो, लेकिन पूरे एक सप्ताह चले इस प्रकरण से माल की आपूर्ति में देरी से विश्व व्यापार को हर दिन होने वाला नुकसान 9.6 बिलियन डॉलर के करीब रहा। इस प्रकरण ने एक बार फिर यह याद दिलाया कि विश्व अर्थव्यवस्था अब भी समुद्र के रास्ते ही आगे बढ़ रही है- और, यह कुल अंतरराष्ट्रीय व्यापार का करीब 70 प्रतिशत है।
जहाजों को खींचने वाले जहाजों और उपकरणों का बेड़ा और जहाज को बचाने वाला दल कई दिन की मशक्कत के बाद नहर के दो तटों के बीच फंसे जहाज को आखिरकार निकालने में कामयाब हो गया और इसे उत्तर दिशा में बिटर लेक्स (ग्रेट बिटर लेक और लिटल बिटर लेक) की ओर लेकर आगे बढ़ गया, जहां अधिकारी जहाज की व्यापक जांच कर पाएंगे और समुद्री यातायात में पैदा हुआ अवरोध भी खत्म हो जाएगा। स्वेज नहर से होकर आगे बढऩे का इंतजार कर रहे सैकड़ों जहाज और टैंकर को हरी झंडी मिलने में अभी करीब एक सप्ताह और लग सकता है। 'एवर गिवन' संकट का आपूर्ति शृंखला पर असर आने वाले कई महीनों तक देखा जा सकता है, लेकिन कई और ऐसे सबक हैं जो सालाना समुद्री यातायात के करीब दसवें हिस्से का अहम जरिया यानी स्वेज नहर में पैदा हुए इस संकट से हमें लेने चाहिए। मिस्र के राष्ट्रपति अब्दुल फतह अल-सीसी ने फंसे हुए जहाज को मुक्त कराने को राष्ट्र की कामयाबी करार दिया। तब भी इस पूरे प्रकरण के किरदार सही अर्थों में संयुक्त राष्ट्र के सक्रिय होने द्ग या इस मामले में सभवत: 'पुन: सक्रिय' होने - को दर्शाते हैं। विशालकाय मालवाहक जहाज को ही देखें तो एमवी एवर गिवन के स्वामित्व वाली कंपनी जापान की है, इसका संचालन ताइवान की कंपनी करती है, प्रबंधन जर्मनी की कंपनी करती है और इसका पंजीकरण पनामा में है। इसके चालक दल के सभी 25 सदस्य भारतीय हैं। जहाज की यात्रा एशिया से यूरोप माल ले जाने की है, स्पष्ट कहें तो नीदरलैंड्स के रोटरडैम बंदरगाह तक। यह संकट में फंसा मध्य-पूर्व के बवंडर में और इसका बचाव किया एक बहुराष्ट्रीय गठबंधन ने, जिसमें नीदरलैंड्स की जहाजों को बचाने वाली कंपनी और मिस्र के स्थानीय टगबोट संचालक शामिल रहे।
न्यूयार्क टाइम्स के पीटर गुडमैन के मुताबिक, एवर गिवन संकट ने वैश्विक अर्थव्यवस्था की क्षणभंगुरता को उजागर किया है। करीब डेढ़ सदी पहले जब स्वेज नहर को समुद्री यातायात के लिए खोला गया था, तो वैश्विक तीव्र शिपिंग के युग की शुरुआत हुई थी जो आने वाले दशकों में और तीव्र होती गई। बीते 50 सालों में जहाजों की माल ले जाने की क्षमता 1500 प्रतिशत तक बढ़ी, उपभोक्ता वस्तुओं की किस्मों का विस्तार हुआ और दुनिया भर में कीमतें कम हुईं। लेकिन जहाजों का आकार बढऩे से अब स्वेज नहर जैसे संकरे और बहुत अधिक यातायात वाले समुद्री मार्गों में परेशानियां पैदा होने लगी हैं। स्वेज नहर प्राधिकरण के एक पायलट के अनुसार, 'पहले की तुलना में आज जहाज आकार में बहुत बड़े हो चुके हैं और एवर गिवन जैसे जहाजों को नहर से निकालना बहुत मुश्किल हो गया है। ऐसी मुश्किलों का सामना हमने पहले कभी नहीं किया।' हाल ही 'द पोस्ट' के आउटलुक सेक्शन के लिए पूर्व मर्चेंट मरीनर साल्वाटोर मर्कोगलियानो ने लिखा, 'स्वेज से होकर न गुजरने वाले माल पर भी इसका असर पड़ेगा, क्योंकि माल बनाने के लिए दूसरे मार्गों से आने वाले जरूरी कलपुर्जों के लिए फैक्ट्रियों को इंतजार करना ही होगा।... गैस और तेल की कीमतों में उछाल देखने को मिलेगा।'
एवर गिवन संकट ने वैकल्पिक मार्गों पर चर्चा को पुनर्जीवित कर दिया है - अफ्रीका के दक्षिणी छोर के लंबे और काफी महंगे रास्ते से लेकर आर्कटिक में उत्तरी मार्ग की संभावना तक, क्योंकि दुनिया की छत की पिघलती बर्फ नए रास्ते खोलती नजर आ रही है। इसी संबंध में आर्कटिक में अंतरराष्ट्रीय सहयोग के लिए रूसी राजनयिक निकोलाई कोर्चुनोव कहते हैं, 'स्वेज नहर की घटना के बाद हर किसी को रणनीतिक समुद्री रास्तों की विविधता पर विचार करना चाहिए।' स्वेज नहर मार्ग में पैदा हुए अवरोध ने याद दिलाया है कि गिनती के महत्त्वपूर्ण समुद्री मार्ग पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था के साथ क्षेत्रीय ताकतों के रणनीतिक आकलन में कितनी अहम भूमिका निभाते हैं। स्वेज हो, पनामा हो, या मलक्का या होरमुज के जलडमरूमध्य हों, एक संकट वैश्विक बाजारों को हिला कर रख सकता है - और संदर्भ कुछ और हो तो प्रतिद्वंद्वी नौसेनाओं के बीच बड़े संघर्ष की भी वजह हो सकता है। ब्लूमबर्ग ओपिनियन के डेविड फिकलिंग और अंजनि त्रिवेदी लिखते हैं, 'पूर्वी एशिया का भूगोल देखें तो दक्षिण चीन सागर समेत वे तमाम समुद्री रास्ते जो ताइवान को फिलीपींस, जापान के ओकिनामा द्वीप समूह और चीन के मुख्य भूभाग से अलग करते हैं और जो मलक्का और सिंगापुर के जलडमरूमध्य व अन्य जलसंधि-सरीखे रास्तों से जुड़ते हैं, टकराव की स्थिति पैदा होने पर बड़े संकट का सबब बन सकते हैं।' सेवानिवृत्त यूएस एडमिरल और नाटो के पूर्व सुप्रीम एलाइड कमांडर जेम्स स्टावरिडिस तर्क देते हैं कि ये तमाम सबक दुनिया को पर्याप्त वजह देते हैं कि वैश्विक ताकतें वैश्विक समुद्री व्यापार के संभावित अवरोध बिंदुओं के संचालन के लिए सामूहिक प्रणाली विकसित करने का रास्ता निकालें।
द वॉशिंगटन पोस्ट
Published on:
31 Mar 2021 08:09 am
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