अनेक पाठकों ने प्रतिक्रया व्यक्त की है, प्रस्तुत हैं चुनिंदा प्रतिक्रियाएं -
सशक्तीकरण के दावे थोथे
मणिपुर की महिलाओं के साथ जो जघन्य कृत्य किया, वह निंदनीय है। कानून अपना काम करेगा लेकिन गरिमामय जीवन जीने के अधिकार का जो हनन हुआ और प्रतिष्ठा को ठेस पहुंची उसका क्या? महिलाओं को लेकर प्रत्येक सरकार सशक्तीकरण का दावा करती है लेकिन जमीनी स्तर पर वही ढाक के तीन पात नजर आता है।
-पारसमल बोस, गुड़ामालानी, बाड़मेर
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ठोस कार्रवाई हो
मणिपुर सरकार के ढीले रवैये से मैतेई और कुकी समुदाय के बीच करीब तीन माह से जारी हिंसा की परिणति महिलाओं के साथ घिनौनी हरकतों के रूप में हुई। प्रधानमंत्री, राज्यपाल व गृहमंत्री के प्रयास और सर्वदलीय बैठक होने के बाद भी हिंसा रोकने के प्रयासों को सफलता नहीं मिलना आश्चर्यजनक है। देर आए, दुरुस्त आए, तो ठीक दिशा में कार्रवाई भी हो, वरना ये लपटें अन्य प्रदेशों में भी फैल सकती हैं।
-बीएल शर्मा, उज्जैन
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हैवानियत की पराकाष्ठा
जातीय हिंसा से जूझ रहे मणिपुर में दो महिलाओं को निर्वस्त्र कर सडक़ों पर घुमाने तथा उनके साथ सामूहिक दुष्कर्म की घटना हैवानियत की पराकाष्ठा है। पिछले करीब तीन महीने से जल रहे मणिपुर की स्थिति को नियंत्रित न कर पाना दर्शाता है कि मणिपुर सरकार राजधर्म का पालन करने में पूरी तरह से विफल रही है। मणिपुर में शांति स्थापित करने के लिए केंद्र तथा राज्य सरकार को ठोस कार्रवाई करनी चाहिए।
-वसंत बापट, भोपाल
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हिंसा रोकने में सरकार विफल
मणिपुर के मौजूदा हालात के लिए मुख्यमंत्री बीरेन सिंह की निष्क्रियता पर विपक्ष द्वारा सवाल उठाना लाजिमी है। राज्य सरकार हिंसा रोकने में पूरी तरह विफल रही है। घुसपैठ, अफीम का अवैध कारोबार व अलगाववादी ताकतों ने कोढ़ में खाज का काम किया है। दोनों पक्षों में सद्भाव कायम करने के लिए उन्हें एक जाजम पर बिठा कर संवाद करने की जरूरत लगती है।
-शिवजी लाल मीना, जयपुर
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बड़े फैसले लेने होंगे
दीर्घकालीन उपाय करने के लिए बड़े फैसले लेने पड़ेंगे। यह समस्या भी 1949 से है जब मणिपुर के राजा ने भारत में विलय संधि की और मणिपुर की ढेर-सी जमीन भारत सरकार द्वारा म्यांमार को दे दी गई। रिजर्वेशन भी बहुत बड़ा कारण है।
-विवेक रंजन श्रीवास्तव, भोपाल
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हम सब जिम्मेदार
देखा जाए तो इसके लिए कहीं न कहीं हम ही जिम्मेदार हैं क्योंकि आए दिन हम जाति और धर्म के नाम पर जातीय व धार्मिक सौहार्द को ठेस पहुंचाते हैं। आज इसके दूरगामी परिणाम हमें मणिपुर में देखने को मिल रहे हैं। स्थानीय सरकार भी इसके लिए बड़ी जिम्मेदार है क्योंकि महिलाओं के अपमान की घटना की जानकारी होने पर भी कोई कार्रवाई नहीं की गई।
-अमनदीप बिश्नोई, सूरतगढ़ (राज.)
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हिंसा का समाधान निकालें
मणिपुर की हिंसा अब एक चुनौती बन चुकी है। देश की एकता और अखंडता को अक्षुण्ण रखने के लिए इसका तत्काल हल निकालना जरूरी है। सेना की मौजूदगी में भी हिंसा का होना इस बात को बताता है कि अब भी हिंसा फैलाने वाले तत्व सक्रिय हैं। यदि समय रहते मणिपुर हिंसा की गंभीरता नहीं समझी गई तो सचमुच हालात और खतरनाक हो सकते हैं।
-सतीश उपाध्याय, मनेंद्रगढ़, छत्तीसगढ़
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साझा प्रयास करने होंगे
यदि सरकार दो समुदायों के बीच उपजे मतभेद को समाप्त करने का प्रयास करती तो नि:संदेह समस्या हल हो सकती थी पर ऐसा नहीं हुआ। डबल इंजन की सरकार होते हुए भी। इस प्रकार घटनाओं को काबू में लाने के लिए केंद्र सरकार और राज्य सरकार दोनों को मिलकर इसका हल ढूंढना होगा।
-नरेन्द्र गौड़, बाड़मेर (राजस्थान)
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वोटों की राजनीति जिम्मेदार
वोटों की खातिर आरक्षण और गैर-आरक्षण में देश को बांट दिया गया है। मणिपुर हिंसा में असामाजिक तत्व भी जिम्मेदार हैं। चिंता इस बात की कि महिलाओं के साथ हुए अपमानजनक बर्ताव के बाद भी स्थानीय सरकार हाथ पर हाथ धरे देखती रही। मणिपुर की घृणित घटनाओं से पक्ष-विपक्ष को सबक लेकर संसद में बैठकर भविष्य में और हिंसक घटनाओं की आशंकाओं को निर्मूल करने की ठोस नीति बनाने की आवश्यकता है।
-हरिप्रसाद चौरसिया, देवास, मध्यप्रदेश