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कला माध्यमों की सामर्थ्य का नकारात्मक उपयोग क्यों?

हिंदी कवि सम्मेलनों के मंचों पर कुछ कवि द्विअर्थी तुकबंदियां और चुटकुले सुनाने लगे थे। लेकिन तब से समय की नदी में बहुत सारा पानी बह गया है। तब भौण्डी प्रस्तुतियों के शिकार वो ही लोग होते थे, जो उन्हें देखने या सुनने के लिए प्रस्तुति स्थल पर जाया करते थे। जबकि अब सोशल मीडिया ने हालात बदल दिए हैं।

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जयपुर

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Opinion Desk

Mar 27, 2026

सिद्धायनी जैन, स्वतंत्र लेखिका एवं स्तंभकार

सोशल मीडिया पर इन दिनों बॉलीवुड की एक फिल्म का गाना चर्चा में है। इस गाने पर सहायक कलाकारों के साथ संजय दत्त और नोरा फतेही ने डांस किया है। गाना चूनर सरकने के बोल से शुरू होता है और बाद में इस हद तक द्विअर्थी बंदिशों तक चला जाता है कि मर्यादा शर्मसार होने लगती है। लोग जहां इस गीत के रचनाकार और फिल्म निर्माता को इस मर्यादाहीन प्रस्तुति के लिए कोस रहे हैं, वहीं इस गीत को लेकर तरह-तरह के मीम भी बन रहे हैं। सरकार ने भी इस गाने को इंटरनेट पर प्रतिबंधित करने के लिए कुछ कदम उठाए हैं, लेकिन क्या ऐसे कानून नहीं बनने चाहिए जो ऐसे लोगों के मंसूबों पर नियंत्रण स्थापित करे, जो अपने व्यावसायिक लाभ के लिए लोगों की कुंठित आकांक्षाओं को उकसाते हैं और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का दुरुपयोग करते हैं।

कला जीवन में सौंदर्य का सृजन करती है। कला के मुखर होने में रचनाकार की जीवनदृष्टि और उसकी कल्पना भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। पांच दशक पहले तो इस बात पर बड़ी बहस हुआ करती थी कि 'कला, कला के लिए' नारा देने वाले लोग क्या कला के जन सरोकारों को मुखर करने की सामथ्र्य से खिलवाड़ नहीं कर रहे हैं? यह वो दौर था, जब आपातकाल के कटु अनुभवों की टीस लोगों के मन को अब भी बेकल कर रही थी, नुक्कड़ नाटकों के माध्यम से कलाकारों का एक बड़ा समूह आम आदमी के सुख-दुख की बातें करता था और नागार्जुन जैसे कवियों की प्रतिभा लोगों को सुखद आश्चर्य से भर देती थी। ऐसा नहीं है कि उस दौर में भी रचनात्मक प्रस्तुतियों की धार को भौण्डा करने के कुत्सित प्रयास नहीं हुए। उस दौर में भी ऐसे फिल्म निर्माता हुए, जो अपनी फिल्मों के नाम द्विअर्थी रखते थे। हिंदी कवि सम्मेलनों के मंचों पर कुछ कवि द्विअर्थी तुकबंदियां और चुटकुले सुनाने लगे थे। लेकिन तब से समय की नदी में बहुत सारा पानी बह गया है। तब भौण्डी प्रस्तुतियों के शिकार वो ही लोग होते थे, जो उन्हें देखने या सुनने के लिए प्रस्तुति स्थल पर जाया करते थे। जबकि अब सोशल मीडिया ने हालात बदल दिए हैं।

विसंगति यह है कि इस दौर में अश्लीलता और नकारात्मकता के भी पैरोकार मुखर हो गए हैं। अश्लील प्रस्तुतियों का विरोध करने वालों से ये कथित प्रबुद्ध जन यह कहते हुए मिल जाएंगे कि अश्लीलता गाने की प्रस्तुति में नहीं है, तुम्हारे दिमाग में है। ये लोग संस्कारों के निर्वहन को 'पिछड़ापन' और परिवार के लिए समर्पण की आवश्यकता को 'बंधन' बताते हैं। नोरा फतेही पर फिल्माए गए इस गीत जैसी प्रस्तुतियों ने एक बार फिर यह सवाल मुखर कर दिया है कि कला का दुरुपयोग लोगों की कुंठित और अतृप्त कामनाओं को भड़काने के लिए क्यों किया जाता है? बेशक, समय ऐसी प्रस्तुतियों को स्मृतियों के कूड़ेदान में फेंक देगा, लेकिन देखने वालों की मानसिकता को ऐसी प्रस्तुतियां प्रभावित तो करती हैं।