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कैसा दामाद मिलेगा और कैसी बहू इसकी चिंता

पत्रिका समूह के संस्थापक कर्पूर चंद्र कुलिश जी के जन्मशती वर्ष के मौके पर उनके रचना संसार से जुड़ी साप्ताहिक कड़ियों की शुरुआत की गई है। इनमें उनके अग्रलेख, यात्रा वृत्तांत, वेद विज्ञान से जुड़ी जानकारी और काव्य रचनाओं के चुने हुए अंश हर सप्ताह पाठकों तक पहुंचाए जा रहे हैं।

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दरकते दाम्पत्य संबंधों के भयावह नतीजे पिछले दिनों सामने आए हैं। पति-पत्नी के पवित्र रिश्तों की डोर टूटने के अलग-अलग कारण भी रहते हैं। हमारे ऋषि-मुनियों ने सदियों पहले प्रकृति के नियमों के अनुकूल ही समाज के लिए व्यवस्थाएं दे रखी हैं। इनमें एक विवाह व्यवस्था भी है। इसे सामाजिक दायित्व या बंधन का रूप दिया गया है। श्रद्धेय कुलिश जी ने वर-वधु के चयन के नए दौर व दरकते रिश्तों से जुड़ीं परिवारों की चिंता को लेकर तीस वर्ष पहले जो लिखा उसके अंश:

सगाई-ब्याह के रिश्तों में लडक़े-लडक़ी के भीतर क्या है यह मां-बाप या नाते-रिश्ते वाले ज्यादा जानते हैं। संयुक्त परिवार प्रथा में मां-बाप को भी इन रिश्तों में बहुत गहरी रुचि होती है। कैसा दामाद मिलेगा और कैसी बहू घर में आएगी यह उनकी चिंता का भी विषय होता है। यही नहीं, हमारे अड़ोसी-पड़ोसी भी इस तरह के रिश्तों में गहरी रुचि रखते हैं।
व्यक्तिगत और सामाजिक दोनों ही तरह से लडक़े-लड़कियों का विवाह पूर्व मिलन एक रिवाज सा बन गया है और इसमें किसी को संकोच होने के बजाय प्रसन्नता होती है। परस्पर परिचय एक तरह का युगधर्म सा बन गया है। युग धर्म अर्थात समयानुसार बदलता हुआ सामाजिक व्यवहार। इनकी अपनी एक उपादेयता होती है। सगाई-ब्याह के रिश्तों में लडक़े-लड़कियों की स्वतंत्रता की भी ऐसी ही लहर है। एक मायने में हमारे युवक-युवतियों को घुटन से छुटकारा पाने का उपाय भी महसूस होने लगा है और एक सीमा तक स्वतंत्रता का यह दौर चालू भी हो गया। मैंने इस दौर को एक सीमा तक इसलिए कहा कि यह दौर सगाई-ब्याह तक ही सीमित है। तलाक का दौर अभी वैसा नहीं है जैसा यूरोप और अमरीका में है। यहां यह भी उल्लेख करना उचित होगा कि तलाक की बढ़ती मात्रा से पश्चिमी देश दूसरी दिशा में सोचने लगे हैं। शादी को पश्चिम के लोग व्यक्तिगत मामला समझते हैं वैसे ही जैसे धर्म को। भारत के लोग विवाह को सामाजिक कर्म मानते हैं। विवाह का प्रतीक ग्रन्थि बंधन है और ग्रन्थि बंधन ही सृष्टि का प्रतीक है। पानी गर्म होकर भाप बन जाता है और भाप ही ठंडी होकर पानी बन जाती है। मिट्टी को भट्टी पर चढ़ाकर कांच बना लिया जाता है और कांच ही पिघलकर पानी बन जाता है। ग्रन्थि बंधन के ही ये विभिन्न स्वरूप है। इससे अधिक साफ समझने के लिए एक पेड़ का उदाहरण देख सकते हैं। पेड़ के तने में गांठे बने बिना नई शाखा नहीं फूट सकती। यही गांठ स्त्री-पुरुष की दो धातुओं के बीच पड़ जाने से प्रजा उत्पन्न होती है। इसी प्राकृतिक नियम को हमारे यहां रिवाज या संस्कार का रूप दिया गया है। गठजोड़ा ही ग्रन्थि बंधन या पाणिग्रहण है।

परिवार ही सृष्टि की मूल इकाई

परिवार और सामाजिक व्यवहार में बहुधा हर एक को एक बंधन या मर्यादा मानकर चलना पड़ता है। हम अपनी रुचि, पसंद और रुझान, विचारधारा पर जोर दें या दूसरों पर थोपें। दूसरों की रुचि और पसंद का सम्मान न करें तो कोई सामाजिक व्यवस्था या पारिवारिक इकाई चल नहीं सकती। सौभाग्य से हमारे यहां अभी परिवार छिन्न-भिन्न नहीं हुए हैं। परिवार ही सृष्टि की मूल इकाई है। इसका माध्यम वैवाहिक संबंध है। सगाई-ब्याह से पहले लडक़े-लड़कियों का मिलना सर्वथा वैयक्तिक विषय नहीं है। यह मेल-मिलाप या परिचय भी अभिभावकों की पहल पर ही होता है। इसकी प्रेरक शक्ति व्यक्तिगत स्वतंत्रता मात्र नहीं बल्कि व्यक्तिगत स्वतंत्रता भी सामाजिक मर्यादा के भीतर ही है। समाज और विवाह के बीच एक अविनाभाव है। पश्चिम में विवाह की एक विधि जरूर है लेकिन परंतु वे लोग इसे एक व्यक्तिगत कर्म की मानते हैं।

(२४ जून १९९६ को ‘विवाह पूर्व परिचय की प्रथा’ आलेख के अंश )

…इधर तलाक का डर

त लाक प्रथा में व्यक्तिगत स्वतंत्रता तो है और जरूरी भी है। लेकिन हर छोटी-बड़ी बात पर तलाक हो जाना बुरी बात है। अमरीका में कई तलाक इस तरह के हुए हैं जिनका कोई ठोस कारण नहीं कहा जा सकता लेकिन तलाक देने वालों ने उसे बहुत तूल दिया। उदाहरण के तौर पर पत्नी इस आधार पर तलाक दे दे कि पति का व्यवहार ठण्डा-ठण्डा नजर आता है या इस बात पर कि वह शाम का समय साथ नहीं बिताता। कई युवक अपनी पत्नी के तलाक के डर से नई-नई परीक्षाएं देकर भी अपनी योग्यताएं नहीं बढ़ा पाते।

(‘अमरीका एक विहंगम दृष्टि’ पुस्तक से