
Election Expenditure in India : चुनाव में सबसे ज्यादा खर्च कहां?, PC- Chatgpt
भारत में चुनाव सिर्फ लोकतंत्र का सबसे बड़ा पर्व नहीं हैं, बल्कि यह देश की एक बहुत बड़ी आर्थिक गतिविधि भी हैं। चुनाव आते ही प्रचार कंपनियों, विज्ञापन एजेंसियों, प्रिंटिंग प्रेस, वाहन मालिकों, होटल, टेंट, इवेंट मैनेजमेंट, सोशल मीडिया टीमों से लेकर हजारों कार्यकर्ताओं तक के लिए काम बढ़ जाता है।
लेकिन सवाल है- भारत में सबसे ज्यादा पैसा किस चुनाव में खर्च होता है? लोकसभा, विधानसभा या स्थानीय चुनाव में? और यह पैसा आखिर जाता कहां है?
सीधी बात करें तो एक चुनाव के तौर पर लोकसभा चुनाव सबसे महंगे होते हैं। 2024 के लोकसभा चुनाव को लेकर Centre for Media Studies से जुड़े अनुमान करीब ₹1.35 लाख करोड़ के कुल चुनावी खर्च की बात करते हैं। यह सिर्फ उम्मीदवारों के घोषित खर्च का आंकड़ा नहीं है, बल्कि चुनाव के पूरे आर्थिक प्रभाव का अनुमान है।
हालांकि स्थानीय चुनावों को कम खर्चीला समझना भी सही नहीं है। इन चुनावों में एक सीट का खर्च कम हो सकता है, लेकिन हजारों नगर निकायों, पंचायतों और वार्डों में एक साथ चुनाव होने के कारण कुल आर्थिक गतिविधि बहुत बड़ी हो जाती है।
| चुनाव | खर्च का स्तर | सबसे बड़ा खर्च |
|---|---|---|
| लोकसभा | सबसे ज्यादा | प्रचार, मीडिया, यात्रा और रैलियां |
| विधानसभा | बहुत ज्यादा | स्थानीय प्रचार, कार्यकर्ता, वाहन और विज्ञापन |
| नगर निकाय | प्रति सीट कम, लेकिन कुल मिलाकर बड़ा | स्थानीय नेटवर्क, प्रचार और कार्यकर्ता |
| पंचायत | प्रति उम्मीदवार अपेक्षाकृत कम | कार्यकर्ता, स्थानीय संपर्क और छोटी सभाएं |
लोकसभा चुनाव में पूरा देश एक साथ चुनावी बाजार बन जाता है। राष्ट्रीय दलों को सैकड़ों सीटों पर प्रचार करना होता है। इसके उलट विधानसभा चुनाव राज्य-केंद्रित होते हैं और स्थानीय चुनावों में पूरा खेल छोटे इलाके और व्यक्तिगत संपर्क पर आ जाता है।
चुनाव में पैसा सबसे पहले मतदाता तक अपनी बात पहुंचाने पर खर्च होता है। पोस्टर, बैनर, होर्डिंग, अखबार, टीवी विज्ञापन, रेडियो, डिजिटल विज्ञापन, वेबसाइट, वीडियो, डिजाइन, सोशल मीडिया कंटेंट और प्रचार सामग्री—इन सब पर बड़ी रकम जाती है।
2024 के लोकसभा और चार विधानसभा चुनावों के लिए 32 राजनीतिक दलों द्वारा जमा किए गए खर्च के विश्लेषण में ₹3,352.81 करोड़ खर्च दर्ज हुआ। इसमें अकेले प्रचार पर ₹2,008.30 करोड़ यानी 53.32% खर्च दिखाया गया। यानी पार्टी के घोषित खर्च में सबसे बड़ा हिस्सा प्रचार का है।
पहले चुनावी प्रचार का मतलब पोस्टर, पर्चे और रैलियां था। अब इसके साथ एक पूरा डिजिटल तंत्र जुड़ गया है। इसमें शामिल हैं-
दिलचस्प बात यह है कि 2024 के संबंधित चुनावों में राजनीतिक दलों ने ₹132 करोड़ से ज्यादा वर्चुअल कैंपेन पर खर्च दिखाया था।यानी चुनावी अर्थव्यवस्था अब सिर्फ मैदान में नहीं, मोबाइल स्क्रीन के अंदर भी चलती है।
एक बड़ी रैली देखने में कुछ घंटे की होती है, लेकिन उसके पीछे कई तरह के खर्च होते हैं। मंच, साउंड सिस्टम, एलईडी स्क्रीन, कुर्सियां, टेंट, बिजली, वाहन, प्रचार सामग्री, सुरक्षा व्यवस्था और लोगों की आवाजाही-सबका पैसा लगता है।
राष्ट्रीय स्तर के चुनाव में यह खर्च कई गुना बढ़ जाता है क्योंकि बड़े नेताओं की एक रैली के साथ आसपास के कई जिलों में भी प्रचार अभियान चलाया जाता है।
प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री और बड़े नेताओं की सभाएं चुनाव अभियान का सबसे दिखाई देने वाला हिस्सा हैं। 2024 के लोकसभा और चार विधानसभा चुनावों के लिए राजनीतिक दलों के घोषित खर्च में ₹795.41 करोड़ यात्रा पर खर्च हुए। इसमें करीब 96.22% यात्रा खर्च स्टार प्रचारकों पर था।
इसमें विमान, हेलिकॉप्टर, कार, होटल और दूसरे यात्रा खर्च शामिल हो सकते हैं। यानी एक बड़ा नेता जितने ज्यादा इलाकों में पहुंचता है, चुनावी अर्थव्यवस्था उतनी ही तेजी से फैलती है।
चुनाव का सबसे बड़ा लेकिन अक्सर कम दिखाई देने वाला खर्च कार्यकर्ताओं का नेटवर्क है। हर बूथ पर लोगों की जरूरत होती है। मतदाता सूची, बूथ प्रबंधन, प्रचार सामग्री पहुंचाना, घर-घर संपर्क, सोशल मीडिया और मतदान के दिन की व्यवस्था-इन सबके लिए बड़ी संख्या में लोग काम करते हैं। यहां पैसा भोजन, यात्रा, प्रचार सामग्री, स्थानीय कार्यालय, छोटे कार्यक्रम और दूसरे लॉजिस्टिक खर्चों में जाता है।
स्थानीय चुनावों में यह खर्च और महत्वपूर्ण हो जाता है क्योंकि वहां उम्मीदवार की व्यक्तिगत पहुंच और स्थानीय नेटवर्क ज्यादा मायने रखता है।
यहां चुनावी खर्च का सबसे महत्वपूर्ण अंतर समझना जरूरी है। चुनाव आयोग उम्मीदवार के खर्च पर सीमा लगाता है, लेकिन राजनीतिक दलों के कुल चुनावी खर्च पर ऐसी समान सीमा नहीं है। बड़े राज्यों में लोकसभा उम्मीदवार के लिए मौजूदा सीमा ₹95 लाख और विधानसभा उम्मीदवार के लिए ₹40 लाख है। छोटे राज्यों में यह सीमा अलग है।
उम्मीदवार को अपने चुनावी खर्च का हिसाब भी रखना होता है और परिणाम घोषित होने के बाद निर्धारित समय में जमा करना होता है। लेकिन यहां एक अहम बात है-उम्मीदवार की सीमा और पूरे चुनाव का वास्तविक खर्च एक ही चीज नहीं हैं।
पार्टी का राष्ट्रीय प्रचार, किसी बड़े नेता की सामान्य पार्टी रैली या ऐसा प्रचार जिसमें किसी खास उम्मीदवार का नाम नहीं है, हमेशा उम्मीदवार के खाते में उसी तरह नहीं जुड़ता। यही वजह है कि चुनाव में दिखाई देने वाला कुल पैसा उम्मीदवार की घोषित खर्च सीमा से बहुत ज्यादा हो सकता है।
विधानसभा चुनाव का दायरा लोकसभा से छोटा होता है, लेकिन मुकाबला ज्यादा स्थानीय होता है। उम्मीदवार को अपने क्षेत्र के गांवों, कस्बों और बूथों तक पहुंचना पड़ता है। इसलिए वाहन, स्थानीय कार्यकर्ता, छोटी सभाएं, घर-घर संपर्क और स्थानीय विज्ञापन महत्वपूर्ण हो जाते हैं।
एक सीट का खर्च लोकसभा सीट से कम हो सकता है, लेकिन पूरे राज्य की सभी विधानसभा सीटों को जोड़ दें तो रकम बहुत बड़ी हो जाती है।
नगर निगम, नगर पालिका, नगर पंचायत, जिला परिषद, पंचायत समिति और ग्राम पंचायत चुनावों में खर्च का पैटर्न बदल जाता है।यहां टीवी और राष्ट्रीय मीडिया का महत्व कम हो सकता है, लेकिन व्यक्तिगत संपर्क, स्थानीय कार्यकर्ता और क्षेत्रीय नेटवर्क ज्यादा महत्वपूर्ण होते हैं। यही कारण है कि स्थानीय चुनाव को केवल उम्मीदवार की घोषित खर्च सीमा देखकर सस्ता समझना ठीक नहीं होगा।
राज्य निर्वाचन आयोग अलग-अलग स्थानीय निकाय चुनावों के लिए खर्च की सीमा और हिसाब-किताब के नियम तय करते हैं। महाराष्ट्र जैसे राज्यों में नगर निकाय और पंचायत चुनावों के लिए अलग-अलग खर्च संबंधी आदेश जारी किए जाते हैं।
चुनाव सिर्फ राजनीति नहीं, एक बड़ा बाजार भी है : अगर चुनाव को आर्थिक गतिविधि की तरह देखें तो इसका असर राजनीति से बहुत आगे जाता है।
यानी चुनाव के दौरान राजनीतिक पैसा बाजार में घूमकर कई दूसरे क्षेत्रों में पहुंचता है।
अगर सवाल है कि एक राष्ट्रीय चुनाव की कुल आर्थिक गतिविधि किसमें सबसे ज्यादा होती है, तो जवाब है- लोकसभा चुनाव। अगर सवाल है कि पूरे देश में अलग-अलग स्तरों पर पांच साल के चक्र में कुल कितना पैसा घूमता है, तो तस्वीर ज्यादा जटिल है। विधानसभा और स्थानीय चुनावों की संख्या बहुत अधिक है और इनके खर्च का कोई एक राष्ट्रीय, समान और पूरी तरह तुलनीय डेटाबेस उपलब्ध नहीं है।
इसलिए लोकसभा के लिए ₹1.35 लाख करोड़ जैसे अनुमानों की तुलना सीधे किसी एक पंचायत या विधानसभा चुनाव से करना सही नहीं होगा।
असल तस्वीर यह है कि लोकसभा चुनाव का पैसा राष्ट्रीय स्तर पर बड़े पैमाने पर मीडिया, यात्रा और प्रचार में जाता है; विधानसभा चुनाव में राज्य और क्षेत्रीय नेटवर्क महत्वपूर्ण होते हैं; जबकि स्थानीय चुनावों में पैसा जमीन पर उतरकर कार्यकर्ताओं, वाहनों और व्यक्तिगत संपर्क में ज्यादा दिखाई देता है।
Updated on:
23 Aug 2026 10:18 am
Published on:
23 Aug 2026 10:18 am
