
India FDI Policy Press Note 3 Relaxation : क्या भारत-चीन की निवेश नीति, PC- Chatgpt
भारत और चीन के बीच सीमा विवाद और रणनीतिक तनाव के बाद 2020 में भारत ने चीन समेत उन सभी देशों से आने वाले विदेशी निवेश पर सख्ती बढ़ा दी थी, जिनकी भारत के साथ जमीनी सीमा लगती है। मकसद था कि कोई विदेशी कंपनी भारतीय कंपनियों में छोटी हिस्सेदारी लेकर भी अप्रत्यक्ष रूप से नियंत्रण हासिल न कर सके।
लेकिन छह साल बाद भारत ने इस नीति में सीमित ढील दी है। 1 मई 2026 से लागू नए नियमों के तहत किसी विदेशी निवेशक इकाई में जमीनी सीमा वाले देश की गैर-नियंत्रणकारी हिस्सेदारी 10% तक है, तो वह कुछ शर्तों के साथ भारत में स्वचालित मार्ग से निवेश कर सकती है। इसका सबसे बड़ा असर चीन से जुड़े निवेश पर पड़ता है।
20 अगस्त 2026 तक इस नए ढांचे के तहत 29 एफडीआई प्रस्तावों में ₹4,895.65 करोड़ के निवेश की जानकारी सरकार को मिल चुकी है। ये प्रस्ताव आईटी, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, विनिर्माण, फार्मास्यूटिकल्स, डेटा सेंटर और परिवहन जैसे क्षेत्रों से जुड़े हैं।
अप्रैल 2020 में भारत ने Press Note 3 जारी किया था। इसके तहत भारत के साथ जमीनी सीमा साझा करने वाले देशों से आने वाले निवेश के लिए सरकारी मंजूरी अनिवार्य कर दी गई। खास बात यह थी कि सिर्फ सीधे निवेशक का देश देखना पर्याप्त नहीं था, बल्कि निवेश के beneficial ownership यानी वास्तविक लाभकारी स्वामित्व को भी देखा जाता था।
यह फैसला ऐसे समय आया था जब कोविड-19 महामारी के कारण दुनिया भर की कंपनियों के शेयर मूल्य तेजी से गिर रहे थे। भारत की चिंता थी कि विदेशी कंपनियां इस स्थिति का फायदा उठाकर भारतीय कंपनियों में सस्ती हिस्सेदारी न खरीद लें।
इसके कुछ ही समय बाद गलवान घाटी में भारत और चीन के सैनिकों के बीच हिंसक झड़प हुई। इसके बाद दोनों देशों के रिश्तों में तनाव और बढ़ा। इसलिए चीन से आने वाले निवेश को सिर्फ आर्थिक नहीं, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा के नजरिए से भी देखा जाने लगा।
नतीजा यह हुआ कि चीन से जुड़ी कंपनियों और ऐसे विदेशी निवेशकों के लिए भी मंजूरी जरूरी हो गई, जिनमें चीन या किसी दूसरे भूमि-सीमा वाले देश की बहुत छोटी हिस्सेदारी थी।
सरकार के मुताबिक यह व्यवस्था निवेशकों के लिए लंबे समय से चिंता का विषय थी, क्योंकि बहुत छोटी हिस्सेदारी होने पर भी सरकारी मंजूरी की जरूरत पड़ सकती थी।
2026 में सरकार ने एक साथ दो तरह के बदलाव किए हैं। पहला बदलाव मार्च में आया। केंद्र सरकार ने कुछ महत्वपूर्ण विनिर्माण क्षेत्रों में भूमि-सीमा वाले देशों से आने वाले निवेश प्रस्तावों के लिए 60 दिन की निर्णय समय-सीमा तय की। इनमें इलेक्ट्रॉनिक घटक, पूंजीगत सामान, पॉलीसिलिकॉन और इनगॉट-वेफर जैसे क्षेत्र शामिल हैं।
दूसरा और ज्यादा महत्वपूर्ण बदलाव 1 मई 2026 से लागू हुआ। इसमें यह व्यवस्था की गई कि अगर किसी विदेशी निवेशक इकाई में भूमि-सीमा वाले देश की हिस्सेदारी 10% तक है और वह गैर-नियंत्रणकारी है, तो संबंधित निवेशक उन क्षेत्रों में स्वचालित मार्ग से भारत में निवेश कर सकता है जहां स्वचालित मार्ग से एफडीआई की अनुमति है।
यानी सरकार ने चीन के लिए दरवाजा पूरी तरह नहीं खोला है, बल्कि छोटी और गैर-नियंत्रणकारी हिस्सेदारी वाले निवेश के लिए रास्ता आसान किया है।
नहीं। यही सबसे महत्वपूर्ण बात है। नए नियम का मतलब यह नहीं है कि चीन में पंजीकृत कोई भी कंपनी भारत में सीधे आकर बिना सरकारी मंजूरी निवेश कर सकती है।
सरकार की नई व्यवस्था में निवेशक इकाई के स्तर पर लाभकारी स्वामित्व देखा जाएगा। यदि उस विदेशी निवेशक इकाई में चीन या किसी अन्य भूमि-सीमा वाले देश की हिस्सेदारी 10% से अधिक नहीं है और वह नियंत्रणकारी हिस्सेदारी नहीं है, तो कुछ शर्तों के तहत स्वचालित मार्ग उपलब्ध हो सकता है।
इसके अलावा चीन, हांगकांग या अन्य भूमि-सीमा वाले देशों में पंजीकृत संस्थाओं पर यह 10% वाली स्वचालित छूट लागू नहीं होती। यानी सिर्फ किसी तीसरे देश में कंपनी रजिस्टर करा लेने से चीन की कंपनी को स्वतः छूट नहीं मिल जाती।
भारत के साथ जमीनी सीमा साझा करने वाले देशों में चीन के अलावा पाकिस्तान, बांग्लादेश, नेपाल, भूटान, म्यांमार और अफगानिस्तान शामिल हैं।
सबसे बड़ी वजह है भारत को पूंजी और तकनीक दोनों की जरूरत। भारत मोबाइल फोन, इलेक्ट्रॉनिक्स, बैटरी, सौर उपकरण, ऑटोमोबाइल, एआई और दूसरी उच्च तकनीक वाली विनिर्माण गतिविधियों में तेजी से विस्तार करना चाहता है। लेकिन कई क्षेत्रों में वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला चीन से गहराई से जुड़ी हुई है।
अगर चीन से जुड़ी छोटी हिस्सेदारी वाला हर निवेश भी लंबी मंजूरी प्रक्रिया में फंसता है, तो इसका असर सिर्फ चीनी कंपनियों पर नहीं बल्कि उन वैश्विक कंपनियों पर भी पड़ सकता है जिनके निवेशकों में चीन से जुड़ी मामूली हिस्सेदारी है।
सरकार का कहना है कि नई व्यवस्था से निवेश में निश्चितता बढ़ेगी, लेनदेन का समय घटेगा और भारत में वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला से जुड़ी परियोजनाओं को बढ़ावा मिलेगा।
20 अगस्त 2026 तक नए नियमों के तहत 29 निवेश प्रस्ताव सामने आए, जिनकी कुल प्रस्तावित एफडीआई राशि ₹4,895.65 करोड़ है। खास बात यह है कि ये प्रस्ताव सीधे चीन में पंजीकृत कंपनियों के नाम से नहीं हैं।
सरकार के मुताबिक निवेशक या संबंधित संस्थाएं मॉरीशस, अमेरिका, दक्षिण कोरिया, जापान, सिंगापुर, लक्जमबर्ग और केमैन आइलैंड्स जैसे अधिकार क्षेत्रों में स्थित हैं। इन प्रस्तावों में प्रमुख क्षेत्र हैं:
| क्षेत्र | संभावित असर |
|---|---|
| आईटी | नई कंपनियों और तकनीकी निवेश को बढ़ावा |
| एआई | पूंजी और तकनीकी साझेदारी |
| इलेक्ट्रॉनिक्स | आपूर्ति श्रृंखला मजबूत |
| विनिर्माण | उत्पादन क्षमता बढ़ने की संभावना |
| फार्मा | उत्पादन और तकनीकी सहयोग |
| डेटा सेंटर | डिजिटल ढांचे में निवेश |
| परिवहन | लॉजिस्टिक्स और बुनियादी ढांचा विकास |
इससे साफ है कि बदलाव का उद्देश्य सिर्फ चीन से पैसा लाना नहीं, बल्कि वैश्विक पूंजी और तकनीक को भारत तक पहुंचाना भी है।
यह सबसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों में से एक है। भारत आज दुनिया के बड़े मोबाइल विनिर्माण केंद्रों में शामिल हो चुका है, लेकिन इलेक्ट्रॉनिक्स की पूरी आपूर्ति श्रृंखला अभी भारत में नहीं बनी है। कई महत्वपूर्ण घटक और कच्चा माल अब भी आयात करना पड़ता है।
मार्च 2026 में सरकार ने भूमि-सीमा वाले देशों से जुड़े निवेश के लिए जिन क्षेत्रों में तेज मंजूरी की व्यवस्था की, उनमें इलेक्ट्रॉनिक घटक और पूंजीगत सामान प्रमुख हैं।
इसका फायदा यह हो सकता है कि भारतीय कंपनियां विदेशी तकनीक और पूंजी के साथ मिलकर यहां ज्यादा घटक बनाएं। इससे सिर्फ मोबाइल असेंबली नहीं, बल्कि चिप पैकेजिंग, इलेक्ट्रॉनिक घटक, बैटरी और अन्य औद्योगिक सामान के उत्पादन को बढ़ावा मिल सकता है।
एआई क्षेत्र में निवेश सिर्फ सॉफ्टवेयर कंपनियों तक सीमित नहीं है। इसके लिए डेटा सेंटर, सर्वर, नेटवर्किंग उपकरण, बिजली, चिप्स और कई तरह के हार्डवेयर की जरूरत होती है। सरकार द्वारा जारी आंकड़ों में नए 29 प्रस्तावों में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और डेटा सेंटर भी शामिल हैं।
लेकिन यहां राष्ट्रीय सुरक्षा की चिंता और भी ज्यादा महत्वपूर्ण हो जाती है। एआई और डेटा से जुड़े निवेश में केवल पैसा नहीं, बल्कि डेटा, तकनीक और डिजिटल ढांचे तक पहुंच का सवाल भी जुड़ा है। इसलिए 10% की सीमा का मतलब यह नहीं है कि सुरक्षा जांच खत्म हो गई है।
भारत के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही है कि आर्थिक फायदा और राष्ट्रीय सुरक्षा के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए। चीन कई महत्वपूर्ण वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं में बहुत मजबूत स्थिति रखता है। अगर भारतीय उद्योग जरूरत से ज्यादा चीनी पूंजी, तकनीक या आपूर्ति पर निर्भर हो गया, तो भविष्य में किसी राजनीतिक या सैन्य तनाव के समय इसका असर भारतीय कंपनियों पर पड़ सकता है।
दूसरी चिंता है डेटा और रणनीतिक तकनीक। दूरसंचार, एआई, इलेक्ट्रॉनिक्स, डेटा सेंटर और महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचे में विदेशी निवेश को सिर्फ रोजगार और पूंजी के नजरिए से नहीं देखा जा सकता।
इसीलिए सरकार ने नियमों में ढील देने के बावजूद राष्ट्रीय सुरक्षा संबंधी जांच को खत्म नहीं किया है। मार्च में सरकार ने भी स्पष्ट किया था कि जरूरी सुरक्षा मंजूरियां अपनी जगह बनी रहेंगी।
नहीं, बल्कि दरवाजा थोड़ा खोला है। 2020 में जहां छोटी से छोटी चीनी हिस्सेदारी भी सरकारी मंजूरी की प्रक्रिया में जा सकती थी, वहीं अब 10% तक की गैर-नियंत्रणकारी हिस्सेदारी वाले निवेशक को निर्धारित शर्तों के तहत स्वचालित मार्ग मिल सकता है।
इसका लक्ष्य है- पूंजी आए, तकनीक आए, भारत में उत्पादन बढ़े और वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में भारत की हिस्सेदारी बढ़े, लेकिन साथ ही यह सुनिश्चित किया जाए कि किसी विदेशी निवेशक को भारतीय कंपनी पर नियंत्रण न मिल जाए।
अभी मिले ₹4,895.65 करोड़ के 29 प्रस्ताव इस बदलाव का शुरुआती असर दिखाते हैं। असली परीक्षा आने वाले वर्षों में होगी—क्या इससे भारत में सिर्फ विदेशी निवेश बढ़ता है या मोबाइल, इलेक्ट्रॉनिक्स, एआई, बैटरी और उच्च तकनीक वाले विनिर्माण में वास्तविक घरेलू क्षमता भी तैयार होती है।
यानी 2026 का बदलाव चीन पर निर्भरता बढ़ाने की नीति नहीं, बल्कि नियंत्रित तरीके से पूंजी और तकनीक लेने की कोशिश है। भारत के लिए चुनौती यही होगी कि विदेशी निवेश का फायदा उठाते हुए ऐसी घरेलू आपूर्ति श्रृंखला तैयार की जाए, जिसमें किसी एक देश पर निर्भरता कम से कम हो।
Updated on:
24 Aug 2026 11:08 am
Published on:
24 Aug 2026 10:52 am
