
Indian Agricultural Export Strategy : क्या है भारत की वैश्विक नीति, PC- Gemini
भारत की कृषि नीति अब सिर्फ खाद्य सुरक्षा और घरेलू मांग तक सीमित नहीं है। उत्पादन बढ़ाने, लागत घटाने, किसानों को बेहतर मूल्य दिलाने, कृषि विविधीकरण, प्रसंस्करण और निर्यात क्षमता बढ़ाने पर भी जोर दिया जा रहा है। इसका उद्देश्य भारतीय कृषि को बदलते वैश्विक बाजार, जलवायु जोखिम और अंतरराष्ट्रीय प्रतिस्पर्धा के लिए तैयार करना है।
हालांकि, इसे एक नई अलग “राष्ट्रीय कृषि नीति” के रूप में देखना सही नहीं होगा। अगस्त 2025 में केंद्र सरकार ने राज्यसभा में कृषि क्षेत्र के लिए अपनी समेकित रणनीति और मौजूदा नीति ढांचे की जानकारी दी थी। इसमें उत्पादन और उत्पादकता बढ़ाने, लागत कम करने, लाभकारी मूल्य, विविधीकरण, फसल कटाई के बाद मूल्य संवर्धन और जलवायु-अनुकूल खेती को प्रमुख लक्ष्य बताया गया।
कृषि और संबद्ध क्षेत्र की वास्तविक जीवीए वृद्धि 2024-25 में 4.6 प्रतिशत रही, जबकि 2023-24 में यह 2.7 प्रतिशत थी। यह कृषि क्षेत्र की आर्थिक गतिविधि में सुधार का संकेत है, हालांकि इसे अकेले किसी एक नीति का परिणाम मानना उचित नहीं होगा।
सरकार की रणनीति में अब उत्पादन के साथ-साथ भंडारण, प्रसंस्करण, बाजार संपर्क और निर्यात को भी महत्वपूर्ण स्थान दिया जा रहा है। यानी लक्ष्य सिर्फ ज्यादा फसल पैदा करना नहीं, बल्कि उसका बेहतर मूल्य हासिल करना भी है।
भारत के कृषि निर्यात में पिछले दशक में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार, कृषि निर्यात का मूल्य 2014-15 के 32.08 अरब डॉलर से बढ़कर 2025-26 में 54.70 अरब डॉलर हो गया। यह करीब 70.5 प्रतिशत की वृद्धि है।
इसी अवधि में प्रसंस्कृत खाद्य निर्यात की हिस्सेदारी भी बढ़ी। 2014-15 में यह 13.7 प्रतिशत थी, जो 2024-25 में बढ़कर 20.4 प्रतिशत हो गई। इससे संकेत मिलता है कि कृषि व्यापार में केवल कच्चे उत्पादों के बजाय प्रसंस्कृत और मूल्य-वर्धित उत्पादों की भूमिका बढ़ रही है।
भारत चावल, दूध, मसाले, फल, सब्जियां और समुद्री उत्पादों जैसे कई कृषि क्षेत्रों में बड़ी उत्पादन क्षमता रखता है। लेकिन उत्पादन में मजबूत स्थिति अपने आप बड़े निर्यात में नहीं बदलती।
वैश्विक बाजार में पहुंच बनाने के लिए गुणवत्ता, खाद्य सुरक्षा मानक, निरंतर आपूर्ति, पैकेजिंग, कोल्ड-चेन और समय पर डिलीवरी जरूरी हैं। इसलिए भारत के सामने अगली चुनौती “ज्यादा उत्पादन” से आगे बढ़कर “वैश्विक मानकों के अनुरूप उत्पादन” की है।
कृषि में डिजिटल तकनीक और कृत्रिम बुद्धिमत्ता का इस्तेमाल इस बदलाव का नया हिस्सा है। फरवरी 2026 में AI4Agri सम्मेलन में केंद्रीय विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्री ने कहा कि कृषि में AI के इस्तेमाल से बड़े पैमाने पर आर्थिक मूल्य पैदा किया जा सकता है। उन्होंने ₹70,000 करोड़ सालाना तक संभावित मूल्य-सृजन की बात कही थी। यह एक संभावित अनुमान है, हासिल हो चुका लाभ नहीं।
इसके अलावा बजट 2026-27 में Bharat-VISTAAR नाम का बहुभाषी AI टूल प्रस्तावित किया गया। मार्च 2026 में इसके पहले चरण को शुरू किए जाने की जानकारी सरकार ने दी। इसका उद्देश्य कृषि संबंधी डिजिटल प्रणालियों और ICAR की वैज्ञानिक कृषि सलाह को जोड़कर किसानों को मौसम, बाजार, फसल प्रबंधन, कीट और रोग तथा मिट्टी से संबंधित व्यक्तिगत सलाह उपलब्ध कराना है।
कृषि को अधिक लाभकारी बनाने के लिए सिर्फ गेहूं और धान जैसी प्रमुख फसलों पर निर्भरता कम करना जरूरी है। बजट 2026-27 में नारियल, काजू, कोको, चंदन और अन्य उच्च मूल्य वाली कृषि गतिविधियों के उत्पादन, प्रसंस्करण और निर्यात प्रतिस्पर्धा को बढ़ाने के लिए कार्यक्रमों का प्रस्ताव किया गया है।
यह बदलाव किसानों को ऐसे उत्पादों की ओर बढ़ने का अवसर दे सकता है जिनमें बाजार मूल्य और प्रसंस्करण की संभावनाएं अधिक हैं। लेकिन फसल विविधीकरण स्थानीय जलवायु, पानी की उपलब्धता और बाजार की मांग को ध्यान में रखकर ही होना चाहिए।
भारत की कृषि व्यवस्था में बड़ी संख्या छोटे और सीमांत किसानों की है। उपलब्ध कृषि आंकड़ों के अनुसार 2015-16 में करीब 68.45 प्रतिशत परिचालन जोतें एक हेक्टेयर तक थीं। ऐसे में अकेले छोटे किसान के लिए निर्यात बाजार, आधुनिक भंडारण या अंतरराष्ट्रीय गुणवत्ता मानकों तक पहुंच बनाना मुश्किल हो सकता है।
यहीं किसान उत्पादक संगठन (FPO), सहकारी संस्थाएं और सामूहिक विपणन महत्वपूर्ण हो जाते हैं। इनके जरिए किसान उत्पादन, प्रसंस्करण, पैकेजिंग और बिक्री को बड़े स्तर पर संगठित कर सकते हैं।
भारत को वैश्विक कृषि बाजार में आगे बढ़ने के लिए कई चुनौतियों का सामना करना पड़ेगा। इनमें छोटे और बिखरे खेत, गुणवत्ता में असमानता, कोल्ड-चेन की कमी, अंतरराष्ट्रीय मानकों का पालन, लॉजिस्टिक्स की लागत और वैश्विक कीमतों में उतार-चढ़ाव शामिल हैं।
इसके अलावा कृषि निर्यात नीति को घरेलू खाद्य सुरक्षा के साथ संतुलित करना भी जरूरी है। किसी फसल की घरेलू उपलब्धता कम होने पर निर्यात प्रतिबंध या नीतिगत बदलाव किसानों और विदेशी खरीदारों दोनों के लिए अनिश्चितता पैदा कर सकते हैं।
भारत को अब कृषि में तीन स्तरों पर एक साथ काम करना होगा-उत्पादन, मूल्य संवर्धन और बाजार। पहला, छोटे किसानों तक बेहतर बीज, सिंचाई, तकनीक और AI आधारित सलाह पहुंचानी होगी। दूसरा, भंडारण, प्रसंस्करण और कोल्ड-चेन का विस्तार करना होगा। तीसरा, FPO और सहकारी संस्थाओं के जरिए किसानों को बड़े बाजारों और निर्यातकों से जोड़ना होगा।
साथ ही भारतीय कृषि उत्पादों की ब्रांडिंग, गुणवत्ता प्रमाणन और अंतरराष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा मानकों पर विशेष ध्यान देना होगा।
भारत की कृषि रणनीति धीरे-धीरे “खेत से मंडी” से “खेत से बाजार और वैश्विक बाजार” की ओर बढ़ रही है। कृषि निर्यात में बढ़ोतरी, प्रसंस्करण पर जोर, उच्च मूल्य वाली फसलों और AI जैसी तकनीकों का इस्तेमाल इस बदलाव के संकेत हैं।
लेकिन वैश्विक कृषि शक्ति बनने के लिए केवल उत्पादन बढ़ाना पर्याप्त नहीं होगा। असली सफलता तब होगी जब छोटे किसान भी तकनीक, प्रसंस्करण, गुणवत्ता और बाजार से जुड़कर अपनी उपज का बेहतर मूल्य हासिल कर सकें।
Updated on:
29 Aug 2026 04:08 pm
Published on:
29 Aug 2026 04:04 pm
