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JPNIC 30 साल की लीज पर निजी हाथों में, 831 करोड़ का सौदा, अखिलेश-योगी फिर आमने-सामने

JPNIC Project Controversy UP : लखनऊ के JPNIC को 831 करोड़ रुपये की लीज पर देने को लेकर योगी और अखिलेश यादव आमने-सामने हैं। जानिए इस अधूरे प्रोजेक्ट की पूरी कहानी और 2027 चुनाव से इसका संबंध।
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JPNIC Project Controversy UP

JPNIC Project Controversy UP : JPNIC पर क्यों हो रही राजनीति, PC- Patrika

लखनऊ का जयप्रकाश नारायण इंटरनेशनल सेंटर (JPNIC) करीब एक दशक से अधूरे निर्माण और राजनीतिक विवाद का प्रतीक बना हुआ है। अब उत्तर प्रदेश सरकार ने इसके भविष्य को लेकर बड़ा फैसला किया है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की अध्यक्षता में 25 अगस्त 2026 को हुई कैबिनेट बैठक में JPNIC को 30 साल की लीज पर निजी कंसोर्टियम को संचालन और रखरखाव के लिए देने के प्रस्ताव को मंजूरी दी गई। चयनित कंसोर्टियम में वृंदावन बॉटलर्स प्राइवेट लिमिटेड और रॉकवुड होटल्स एंड रिजॉर्ट्स प्राइवेट लिमिटेड शामिल हैं। कंसोर्टियम को अधूरे काम अपने खर्च से पूरे करने होंगे और इसके बदले LDA को करीब 831 करोड़ रुपये का भुगतान करना होगा।

पहले यह समझिए-JPNIC बिका नहीं है

इस फैसले के बाद सबसे ज्यादा चर्चा “निजी हाथों में देने” की हो रही है, लेकिन यहां एक जरूरी अंतर समझना होगा।JPNIC की जमीन और संपत्ति का स्वामित्व लखनऊ विकास प्राधिकरण (LDA) के पास ही रहेगा। सरकार ने इसे बेचा नहीं है, बल्कि 30 साल के लिए संचालन और रखरखाव की लीज दी है। चयनित निजी समूह को टेंडर की शर्तों के मुताबिक केंद्र को पूरा करके उसका संचालन करना होगा।

यानी सरकार का तर्क है कि लंबे समय से अधूरे पड़े प्रोजेक्ट को पूरा कराने के लिए निजी निवेश और प्रबंधन का इस्तेमाल किया जा रहा है।

831 करोड़ रुपये क्यों चर्चा में हैं?

लीज व्यवस्था का सबसे बड़ा वित्तीय पहलू करीब 831 करोड़ रुपये का भुगतान है। यह राशि चयनित कंसोर्टियम को LDA को देनी होगी। इसके अलावा संचालन शुरू होने के बाद करीब 6 करोड़ रुपये सालाना भुगतान का प्रावधान है, जिसमें हर साल 5 प्रतिशत की वृद्धि होगी।

कंसोर्टियम को 25 करोड़ रुपये की प्रदर्शन गारंटीभी जमा करनी होगी और Letter of Acceptance मिलने के बाद करीब 10.11 करोड़ रुपये का भुगतान करना होगा।

इसके अलावा सबसे महत्वपूर्ण जिम्मेदारी यह है कि JPNIC में बचे हुए निर्माण कार्य का खर्च भी निजी कंसोर्टियम को ही उठाना होगा।

200–250 करोड़ रुपये का काम अभी बाकी

JPNIC पर सरकार पहले ही करीब 821 करोड़ रुपये खर्च कर चुकी है। इसके बावजूद परियोजना पूरी तरह तैयार नहीं हो पाई है। अब बचे हुए कामों पर करीब 200 से 250 करोड़ रुपये खर्च होने का अनुमान है।

इनमें आंतरिक सज्जा, इलेक्ट्रिकल और फायर सेफ्टी के काम, जिम, वीवीआईपी कमरे, कैफेटेरिया, होटल ब्लॉक और अन्य अधूरे हिस्सों को पूरा करना शामिल है। समझौते के अनुसार निजी कंसोर्टियम को इन कामों को अपने खर्च से पूरा करके करीब दो साल के भीतर संचालन शुरू करना होगा।

2013 में शुरू हुई थी कहानी

JPNIC की योजना 2013 में तत्कालीन अखिलेश यादव सरकार के दौरान बनी थी। गोमती नगर में राम मनोहर लोहिया पार्क के पास करीब 18 एकड़ क्षेत्र में इसे एक बड़े सम्मेलन, सांस्कृतिक और खेल केंद्र के रूप में विकसित करने की योजना थी।

इसमें कन्वेंशन सेंटर, ऑडिटोरियम, खेल सुविधाएं, होटल, बहुस्तरीय पार्किंग और संग्रहालय जैसी सुविधाएं प्रस्तावित थीं। परियोजना का उद्घाटन 2016 में हुआ, लेकिन 2017 में सत्ता परिवर्तन के बाद इसका काम रुक गया और यह लंबे समय तक अधूरा पड़ा रहा।

200 करोड़ से 800 करोड़ से ज्यादा तक पहुंची लागत

JPNIC की लागत को लेकर भी राजनीतिक विवाद लगातार रहा है। राज्य सरकार का कहना है कि परियोजना की शुरुआती अनुमानित लागत करीब 200–265 करोड़ रुपये थी, लेकिन बाद में इस पर 800 करोड़ रुपये से ज्यादा खर्च हो गए और फिर भी यह पूरी तरह तैयार नहीं हुआ।

योगी सरकार इसे पिछली सपा सरकार के कार्यकाल में हुई कथित वित्तीय अनियमितताओं और प्रशासनिक लापरवाही से जोड़ती रही है। हालांकि किसी राजनीतिक आरोप को अंतिम निष्कर्ष के रूप में प्रस्तुत करने के बजाय उसे संबंधित जांच या आधिकारिक रिकॉर्ड के संदर्भ में ही देखना उचित है।

2025 में LDA को मिली पूरी जिम्मेदारी

JPNIC के प्रबंधन के लिए बनाई गई सोसाइटी को जुलाई 2025 में भंग कर दिया गया था और परियोजना की जिम्मेदारी LDA को सौंप दी गई। उस समय सरकार ने करीब 821.74 करोड़ रुपये की जारी राशि को LDA के लिए ऋण के रूप में माना था, जिसे 30 वर्षों में सरकार को वापस करना था।

इसके बाद LDA ने परियोजना को पूरा करने और संचालन के लिए निजी भागीदार तलाशने की प्रक्रिया शुरू की। मार्च 2026 में वैश्विक निविदा जारी की गई और प्रक्रिया के बाद वृंदावन बॉटलर्स-रॉकवुड होटल्स कंसोर्टियम को चुना गया।

अखिलेश ने बताया निजीकरण, सरकार का अलग तर्क

फैसले के बाद सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव ने सरकार पर सार्वजनिक संपत्ति को निजी हाथों में देने का आरोप लगाया। उन्होंने JPNIC को अपनी सरकार की प्रमुख परियोजनाओं में से एक बताते हुए लीज व्यवस्था पर सवाल उठाए और भाजपा सरकार की नीतियों पर हमला बोला।

वहीं, भाजपा सरकार का तर्क है कि वर्षों से अधूरे पड़े JPNIC को पूरा करने और उसका प्रभावी संचालन सुनिश्चित करने के लिए निजी भागीदारी जरूरी है। सरकार के अनुसार इससे LDA को बचे हुए 200–250 करोड़ रुपये का अतिरिक्त निर्माण खर्च खुद नहीं उठाना पड़ेगा।

JPNIC में जनता को क्या मिलेगा?

परियोजना का मूल उद्देश्य इसे सम्मेलन, संस्कृति और खेल गतिविधियों के बड़े केंद्र के रूप में विकसित करना था। निजी कंसोर्टियम को कन्वेंशन सेंटर, ऑडिटोरियम, होटल, खेल सुविधाओं और करीब 750 वाहनों की क्षमता वाली बहुस्तरीय पार्किंग समेत अधिकांश सुविधाओं का संचालन करना होगा।

JPNIC में जयप्रकाश नारायण के जीवन और विचारधारा से जुड़ा संग्रहालय भी है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार संग्रहालय पर LDA का नियंत्रण बना रहेगा।

2027 से पहले क्यों अहम है यह फैसला?

JPNIC केवल एक निर्माण परियोजना नहीं है। यह अखिलेश यादव सरकार की राजनीतिक विरासत से जुड़ा प्रोजेक्ट है और पिछले कई वर्षों से भाजपा-सपा के बीच आरोप-प्रत्यारोप का केंद्र रहा है।

अब 2027 के विधानसभा चुनाव से कुछ महीने पहले 30 साल की लीज का फैसला राजनीतिक रूप से और महत्वपूर्ण हो गया है। सपा इसे सार्वजनिक संपत्ति के निजीकरण के मुद्दे के रूप में उठा सकती है, जबकि भाजपा इसे अधूरे और महंगे पड़े प्रोजेक्ट को दोबारा उपयोग में लाने के समाधान के तौर पर पेश कर सकती है।

अब असली सवाल-जनता को क्या मिलेगा?

JPNIC विवाद का अंतिम मूल्यांकन केवल इस आधार पर नहीं होगा कि इसे लीज पर दिया गया या नहीं। असली सवाल यह होगा कि क्या निजी कंसोर्टियम दो साल में अधूरे काम पूरे करता है, क्या केंद्र तय मानकों के मुताबिक संचालित होता है और क्या इसकी सुविधाओं का वास्तविक लाभ आम जनता को मिलता है।

दूसरा सवाल वित्तीय है-क्या 831 करोड़ रुपये के भुगतान और भविष्य के वार्षिक भुगतान से LDA पर पड़ा वित्तीय बोझ कम होगा और क्या इतने वर्षों से अटकी परियोजना आखिरकार उपयोग में आ पाएगी?