
मकान खरीदने से पहले मालिकाना हक और सभी जरूरी दस्तावेजों की जांच जरूर करें। ( फोटो: AI)
Property खरीदते समय सबसे पहले मौजूदा मालिक के रजिस्टर्ड दस्तावेज और उससे जुड़े पुराने दस्तावेज देखें। केवल रजिस्टर्ड सेल डीड देख कर यह मान लेना सही नहीं है कि संपत्ति का मालिकाना हक हर विवाद से मुक्त है। सुप्रीम कोर्ट ने नवंबर 2025 के एक फैसले में कहा है कि भारत में दस्तावेज का रजिस्ट्रेशन मुख्य रूप से लेनदेन का सार्वजनिक रिकॉर्ड बनाता है, यह अपने-आप निर्णायक मालिकाना हक की गारंटी नहीं देता है।
जानकारी के अनुसार दस्तावेज में संपत्ति का विवरण, पक्षकारों के नाम, तारीख, दस्तावेज संख्या, क्षेत्रफल और रजिस्ट्रेशन से जुड़ी जानकारी का मिलान करें। विक्रेता यदि केवल फोटोकॉपी दिखा रहा है और मूल या प्रमाणित प्रति उपलब्ध नहीं करा रहा, तो आगे बढ़ने से पहले संबंधित पंजीयन कार्यालय से रिकॉर्ड का सत्यापन कराना बेहतर है।
मालिकाना हक केवल मौजूदा मालिक के नाम से तय नहीं होता, बल्कि यह देखना जरूरी है कि संपत्ति उसके पास किस तरह पहुंची। इसलिए पिछली बिक्री, विरासत, वसीयत, उपहार, विभाजन या अन्य हस्तांतरण से जुड़े दस्तावेजों की कड़ी की जांच करें। सुप्रीम कोर्ट ने भी टाइटल सर्च के दौरान पिछले दस्तावेजों की श्रृंखला की जांच को महत्वपूर्ण बताया है।
यह जरूरी नहीं कि हर संपत्ति के लिए कानूनन केवल 13 या 30 साल का रिकॉर्ड ही पर्याप्त हो। संपत्ति की प्रकृति और स्थानीय नियमों के अनुसार वकील आवश्यक अवधि तय कर सकता है; कई मामलों में 30 साल या उससे अधिक पुराने दस्तावेज भी देखे जा सकते हैं। इसलिए किसी तय अवधि को सार्वभौमिक नियम मानना सही नहीं है।
Encumbrance Certificate (EC) से संबंधित अवधि में दर्ज लेनदेन और उपलब्ध पंजीकृत भार की जानकारी मिल सकती है। सरकारी सेवाओं के अनुसार EC का उपयोग संपत्ति पर वित्तीय या कानूनी देनदारियों की स्थिति जानने के लिए किया जाता है।
दरअसल EC को अकेले ही संपत्ति के पूरी तरह विवाद-मुक्त होने का अंतिम प्रमाण नहीं मानना चाहिए। EC में दिखाई देने वाली अवधि, रिकॉर्ड और राज्य की व्यवस्था के अनुसार जांच की सीमा अलग हो सकती है, इसलिए जरूरत पड़ने पर वकील से विस्तृत टाइटल सर्च भी कराएं।
राज्य के अनुसार जमीन और संपत्ति के रिकॉर्ड का नाम अलग हो सकता है, जैसे खसरा, खतौनी, जमाबंदी, पट्टा, 7/12 या RTC। इन रिकॉर्ड में दर्ज नाम, खसरा/सर्वे नंबर, क्षेत्रफल और संपत्ति की पहचान को रजिस्टर्ड दस्तावेजों से मिलाना उपयोगी है।
हालांकि राजस्व रिकॉर्ड या Mutation को मालिकाना हक का अंतिम प्रमाण नहीं माना जा सकता। सुप्रीम कोर्ट ने बार-बार कहा है कि म्यूटेशन मुख्य रूप से राजस्व संबंधी उद्देश्य के लिए होता है और इससे अपने-आप मालिकाना हक पैदा नहीं होता।
ePanjiyan पोर्टल पर पंजीकृत दस्तावेजों की खोज से संबंधित सेवाएं उपलब्ध
अगर आप राजस्थान में संपत्ति की जांच कर रहे हैं, तो राज्य के ePanjiyan पोर्टल पर पंजीकृत दस्तावेजों की खोज और भूमि विवाद से संबंधित सेवाएं उपलब्ध हैं। पोर्टल पर दस्तावेज खोज, भूमि विवाद विवरण और ऑटो म्यूटेशन जैसी सुविधाओं का उल्लेख है।
संपत्ति खरीदने से पहले यह पता करना जरूरी है कि मालिक या संपत्ति से संबंधित कोई मुकदमा लंबित तो नहीं है। eCourts पर पार्टी के नाम, केस नंबर, CNR नंबर और अन्य विकल्पों के जरिए मामलों की स्थिति खोजी जा सकती है।
आप ऑनलाइन अदालत रिकॉर्ड को भी अंतिम कानूनी निष्कर्ष न मानें। eCourts स्वयं उपयोगकर्ताओं को संबंधित प्राधिकरण से रिकॉर्ड की शुद्धता की पुष्टि करने की सलाह देता है और वेबसाइट पर उपलब्ध जानकारी को कानूनी साक्ष्य नहीं मानता।
Caveat को लेकर भी सावधानी जरूरी है। इसे सामान्य रूप से रजिस्ट्रार कार्यालय में दर्ज संपत्ति संबंधित आपत्ति कहना सही नहीं है; अदालतों में caveat की अलग कानूनी प्रक्रिया होती है। इसलिए संपत्ति विवाद की जांच करते समय संबंधित अदालत के रिकॉर्ड और अन्य कानूनी दस्तावेज भी देखें। सुप्रीम कोर्ट की वेबसाइट पर भी caveat मामलों के लिए अलग खोज सुविधा उपलब्ध है।
मकान का संपत्ति कर, बिजली, पानी और अन्य स्थानीय शुल्क समय पर जमा हुए हैं या नहीं, यह देखना व्यावहारिक रूप से जरूरी है। बकाया राशि आगे चलकर भुगतान संबंधी परेशानी पैदा कर सकती है, इसलिए विक्रेता से हालिया भुगतान रसीदें और संबंधित विभाग का रिकॉर्ड मांगना बेहतर है।
बिजली का बिल, पानी का कनेक्शन या संपत्ति कर की रसीद अपने-आप मालिकाना हक साबित नहीं करती। इसी तरह किसी व्यक्ति का नाम राजस्व रिकॉर्ड में दर्ज होना भी अकेले निर्णायक टाइटल नहीं बनाता; मालिकाना हक की जांच में मूल दस्तावेज और पूरी टाइटल चेन महत्वपूर्ण रहती है।
नया मकान, फ्लैट या निर्माणाधीन प्रॉपर्टी खरीदते समय स्वीकृत बिल्डिंग प्लान, निर्माण से जुड़े अनुमोदन और जहां लागू हो वहां Occupancy Certificate (OC) या Completion Certificate की जांच करें। इन दस्तावेजों से यह समझने में मदद मिलती है कि निर्माण संबंधित स्थानीय नियमों और स्वीकृत योजना के अनुरूप है या नहीं।
हालांकि यह कहना सही नहीं है कि हर मकान में OC न होने का मतलब वह हर स्थिति में अवैध है। इसकी आवश्यकता और कानूनी स्थिति स्थानीय भवन नियमों तथा संबंधित प्राधिकरण पर निर्भर करती है। राजस्थान में भी भवन नियमों और Completion/Occupancy Certificate से संबंधित अलग प्रक्रियाएं लागू हैं।
मकान का मालिकाना हक जांचना केवल एक दस्तावेज देखने का काम नहीं है। Registered documents, title chain, EC, revenue records, litigation और लागू निर्माण अनुमोदनों को आपस में मिलाकर देखना ज्यादा सुरक्षित तरीका है। सुप्रीम कोर्ट के अनुसार भारत की मौजूदा व्यवस्था में रजिस्टर्ड दस्तावेज अपने-आप निर्विवाद मालिकाना हक की गारंटी नहीं देता, इसलिए खरीदार की due diligence बेहद महत्वपूर्ण है।
अगर दस्तावेज में नाम, क्षेत्रफल, सर्वे नंबर, सीमाएं या पिछले लेनदेन में कोई अंतर दिखे, तो टोकन या पूरी रकम देने से पहले रुकना बेहतर है। जटिल मामलों में संपत्ति कानून के अनुभवी वकील से title search और document verification कराना भविष्य के बड़े विवाद से बचाने में मदद कर सकता है।
(नोट: यह खबर सामान्य जानकारी के उद्देश्य से दी गई है। संपत्ति कानून और रिकॉर्ड की प्रक्रिया राज्य और संपत्ति की प्रकृति के अनुसार अलग हो सकती है। अंतिम निर्णय से पहले संबंधित विभाग के रिकॉर्ड और योग्य कानूनी विशेषज्ञ की सलाह जरूर लें।)
Updated on:
17 Aug 2026 03:48 pm
Published on:
17 Aug 2026 03:48 pm
